Monday, 29 October 2018

पौड़ी गढ़वाल: अद्भुत सौन्दर्य

    पौड़ी गढ़वाल की सुन्दरता का कहीं कोई जोड़ नहीं। जी हां, पौड़ी गढ़वाल में पर्वतीय सुन्दरता का हर आयाम रूपांकित है। शायद इसीलिए देश दुनिया के पर्यटक पौड़ी गढ़वाल के आकर्षण में खिंचे चले आते हैं।

    समुद्र तल से करीब 1814 मीटर ऊंचाई पर स्थित पौड़ी गढ़वाल हिमालय की गोद में रचा-बसा एक समृद्ध शहर है। यहां की अपनी एक अलग सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक परम्परा है। चौतरफा खूबसूरत वादियां-घाटियां पौड़ी गढ़वाल की सुन्दरता में चार चांद लगा देती हैं। 

    ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति की गोद में प्रवास हो। पौड़ी गढ़वाल में कहीं नदियों का प्रवाहमान रोमांचित करता है तो कहीं हिम शिखर सौन्दर्य बोध कराते हैं। वन श्रंखला भी बेहद दर्शनीय है। 
    पौड़ी गढ़वाल में जैसे फेफड़ों को आक्सीजन के पंख लग जाते हैं। शांत एवं शीतल हवा का प्रवाहमान मन मस्तिष्क को रोमांचित कर देता है। बर्फ की चादर से आच्छादित पौड़ी गढ़वाल के हिम शिखर एक स्वप्नीली दुनिया का एहसास कराते हैं। 

    पहाड़ियों के मध्य बसा यह सुन्दर शहर उत्तराखण्ड का एक जिला है। वस्तुत: पौड़ी गढ़वाल हिमालय की कंडोलिया पहाड़ी पर स्थित है। 
   पौड़ी गढ़वाल प्राचीनता के साथ ही हिल स्टेशन की सुरम्यता भी रखता है। ऊंचाई पर होने के कारण पौड़ी गढ़वाल का मौसम वर्ष पर्यन्त अति सुहाना रहता है। 

    लिहाजा पर्यटक कभी भी इस प्राचीनतम शहर एवं हिल स्टेशन की यात्रा कर सकते हैं। खास तौर से देखें तो पौड़ी गढ़वाल में शानदार नदियों की श्रंखला है। यहां प्रवांिहत नदियों में अलकनंदा, हेंवल एवं नायर हैं। पौड़ी की मुख्य भाषा गढ़वाली है। हालांकि यहां हिन्दी एवं अंग्रेजी भी बोली जाती है।

    गढ़वाल के लोक गीत-संगीत, नृत्य एवं संस्कृति की अपनी एक अलग परम्परा एवं आकर्षण है। पौड़ी गढ़वाल की भौगोलिक दशा-दिशा देखें तो यह पर्वतीय शहर गोलाकार बसा है। 
  उत्तर दिशा में चमोली, रुद्रप्रयाग एवं टेहरी गढ़वाल हैं। दक्षिण में उधम सिंह नगर, पूर्व में अल्मोड़ा, नैनीताल, पश्चिम में देहरादून एवं हरिद्वार शहर हैं। 

    करीब 5440 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बसा यह सुन्दर शहर उत्तराखण्ड का विशेष आकर्षण है। चौतरफा पर्वत श्रंखला के शिखर एक अद्भुत रोमांच पैदा करते हैं तो वहीं हरी-भरी वादियां-घाटियां मखमली स्पर्श का एहसास कराती हैं। सघन वन क्षेत्र शांत शीतलता प्रदान करते हैं। 

   पौड़ी गढ़वाल में पर्यटक बर्फबारी का भरपूर लुफ्त ले सकते हैं। इस शीतलता के मध्य पर्यटक बादलों का स्पर्श महसूस कर सकते हैं। कारण ऊंचाई पर होने के कारण बादलों का खिलंदड़पन अनवरत चलता रहता है। पौड़ी गढ़वाल एवं उसके आसपास आकर्षक एवं सुन्दर स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है। 

   इनमें खास तौर से कंडोलिया शिव मंदिर, बिंसर महादेव, ताराकुण्ड, कण्वाश्रम, दूधातोली, ज्वालपा देवी मंदिर आदि इत्यादि बहुत कुछ है।
    कंडोलिया: कंडोलिया वस्तुत: भूमि देवता का स्थान माना जाता है। पौड़ी गढ़वाल से कंडोलिया करीब दो किलोमीटर दूर है। कंडोलिया देवता को समर्पित यह मंदिर वस्तुत: शिव मंदिर है। यहां मुख्यत: भूमि देवता का पूजन होता है।

     खूबसूरत उद्यान एवं विशाल मैदान कंडोलिया का मुख्य आकर्षण है। इसके निकट ही एशिया का सबसे बड़ा माना जाने वाला स्टेडियम रांसी है। कंडोलिया को एक आदर्श पिकनिक स्पॉट कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। निकट ही गंगवारेशियन घाटी भी है।

    बिंसर महादेव: बिंसर महादेव समुद्र तल से करीब 2480 मीटर ऊंचाई पर स्थित हैं। बिंसर महादेव वस्तुत: पौड़ी गढ़वाल से करीब 115 किलोमीटर दूर पर्वत चोटी पर विद्यमान हैं। बिंसर प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए खास तौर से जाना पहचाना जाता है।
    बिंसर महादेव मंदिर में भगवान शिव-हरगौरी, गणेश जी एवं महिसासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित हैं। मान्यता है कि बिंसर महादेव की स्थापना महाराजा पृथ्वी सिंह ने पिता बिंदु की स्मृति में कराया था। इस दिव्य-भव्य मंदिर को बिंदेश्वर मंदिर भी कहा जाता है।

   ताराकुण्ड: ताराकुण्ड समुद्र तल से करीब 2200 मीटर ऊंचाई पर स्थित एक सुन्दर स्थान है। ताराकुण्ड का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। यहां से आसपास का दृश्य मुग्ध करने वाला होता है।
    ऐसा प्रतीत होता कि जैसे प्रकृति में खो जायें। सुन्दर झील एवं प्राचीन मंदिर यहां के सौन्दर्य को चार चांद लगा देता है। बताया जाता है कि स्वर्गारोहण के समय पाण्डव यहां आये थे। पाण्डव ने ही मंदिर का निर्माण किया था। यह स्थान भी भूमि देवता को समर्पित है। 
   कण्वाश्रम: कण्वाश्रम मालिनी नदी के किनारे स्थित है। कण्वाश्रम कोटद्वार से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित है। यह आश्रम ऋषि कण्व का है। आश्रम का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व है। मान्यता है कि महर्षि विश्वमित्र ने यहां तप किया था।
    मेनका ने यहीं विश्वमित्र का तप भंग किया था। इसके बाद मेनका ने कन्या रूप में जन्म लिया आैर स्वर्ग वापस लौट गयी थी। बाद में इसी कन्या को शकुंतला के नाम से जाना गया। शकुंतला का विवाह हस्तिनापुर के महाराजा से हुआ था। शकुंतला के पुत्र का नाम भारत रखा गया। भारत के राजा बनने के बाद देश का नाम भारत रखा गया। इस दृष्टि से इस स्थान का विशेष महत्व माना जाता है।
    दूधतोली: दूधतोली सबसे ऊंचाई वाला इलाका माना जाता है। समुद्र तल से दूधतोली की ऊंचाई 3100 मीटर है। वन क्षेत्र से आच्छादित यह इलाका प्राकृतिक सौन्दर्य का एक शानदार आयाम है। खास यह कि दूधतोली चौतरफा हिमालय से घिरा हुआ है। आसपास का विहंगम दृश्य यहां से दिखता है।
    ज्वालपा देवी मंदिर: ज्वालपा देवी मंदिर माता दुर्गा जी को समर्पित है। इस स्थान की मान्यता शक्तिपीठ की है। पौड़ी गढ़वाल-कोटद्वार मार्ग पर करीब 33 किलोमीटर दूर यह मंदिर स्थित है।
    पौड़ी गढ़वाल की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून से पौड़ी गढ़वाल की दूरी करीब 155 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोटद्वार है। कोटद्वार से पौड़ी गढ़वाल की दूरी करीब 108 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी पौड़ी गढ़वाल की यात्रा कर सकते हैं।
30.148500,78.774500

Friday, 26 October 2018

नरेन्द्र नगर: खूबसूरती का हर रंग

    नरेन्द्र नगर को विलक्षण शहर कहें तो शायद कोई बड़ी बात न होगी। यहां प्रकृति का हर रंग नरेन्द्र नगर को इन्द्रधनुषी बनाता है।

    उत्तराखण्ड का यह शहर पौराणिकता के साथ पर्यटन की भी खासियत रखता है। नरेन्द्र नगर उत्तराखण्ड का भले ही एक छोटा शहर हो लेकिन इसका इतिहास अति समृद्धशाली है। 

   ऋषिकेश से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित यह पर्वतीय शहर वर्ष 1903 में खास हो गया। कारण उस वक्त टिहरी रियासत के राजा नरेन्द्र शाह ने राज्य की राजधानी प्रताप नगर से हटा कर नरेन्द्र नगर बनाने का फैसला किया था।

  खास तौर से टिहरी रियासत के कार्मिकों के लिए खूबसूरत भवनों की एक लम्बी श्रंखला विकसित की गयी थी। अल्पाइन के सुन्दर पेड़ों से घिरा नरेन्द्र नगर समुद्र तल से करीब 1322 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। पौराणिक शहर होने के साथ ही नरेन्द्र नगर का दिव्य-भव्य स्वरूप पर्यटन गंतव्य के रूप में दिखता हैं। 

   नरेन्द्र नगर से हिमालय का सुन्दर एवं दिव्य-भव्य स्वरूप दिखता है तो वहीं सुन्दर एवं शानदार परिदृश्य पर्यटकों को रोमांचित करता है। वस्तुत: देखें तो नरेन्द्र नगर पर्यटन क्षेत्र में अपना एक अलग एवं विशिष्ट स्थान रखता है। नरेन्द्र नगर वस्तुत: ऋषिकेश का पीक प्वाइंट है।

   नरेन्द्र नगर से दून घाटी, यमुनोत्री एवं गंगोत्री के भव्य-दिव्य दर्शन होते हैं। रॉयल पैलेस अपनी खास खूबसूरती एवं स्थापत्य कला के लिए विशेष तौर से जाना पहचाना जाता है।
   खास यह कि नरेन्द्र नगर की आबोहवा एवं प्राकृतिक परिवेश मन-मस्तिष्क को एक रोमांच से झंकृत कर देता है।

    बर्फ की चादर से आच्छादित पर्वत चोटियां सुन्दरता को खुद-ब-खुद बयां करती हैं। नरेन्द्र नगर में गंगा किनारे योग-ध्यान का अपना एक अलग ही आनन्द एवं सुखानुभूति होती है। योगासन के अलावा साहसिक खेलों के लिए भी यह सर्वाधिक उपयुक्त भूमि है।

    नरेन्द्र नगर का आयुर्वेदिक उपचार विशेष तौर पर ख्याति रखता है। यहां का आयुर्वेदिक उपचार शारीरिक कायाकल्प प्रदान करता है। जिससे पर्यटक स्वयं को अति ऊर्जावान होने का एहसास करते है। निकट ही आगरखल गांव है। 

    लोक संस्कृति का आनन्द लेने के लिए पर्यटक यहां भी भ्रमण कर सकते हैं। यहां का शांतिपूर्ण परिवेश एक सुखद अनुभूति प्रदान करता है। नरेन्द्र नगर का टेरा मंजिल मंदिर उत्तराखण्ड सहित देश भर में खास प्रसिद्ध है। टेरा मंजिल मंदिर हिन्दुओं के सभी देवी-देवताओं को समर्पित है। देवी देवताओं की आकर्षक एवं सुन्दर प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित हैं।

    अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण सूर्योदय एवं सूर्यास्त का विलक्षण दृश्य यहां से अवलोकित होता है। यहां से आसपास का विहंगम दृश्य दिखता है। नरेन्द्र नगर का कामाक्षी देवी मंदिर भी अपनी सुन्दरता एवं विलक्षण स्थापत्य कला के लिए विशेष जाना पहचाना जाता है।
    कामाक्षी देवी के दर्शन से श्रद्धालुओं-पर्यटकों को एक सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। मान्यता है कि यहां दर्शन करने से शक्ति, प्रसन्नता एवं समृद्धि हासिल होती है। 
   नरेन्द्र नगर में प्रवेश करते ही एहसास होता है कि प्रकृति की गोद में विचरण कर रहे हों। ऊंचाई पर होने के कारण बर्फबारी एवं बादलों का स्वच्छंद विचरण रोमांचित करता है। नरेन्द्र नगर प्रकृति, स्थापत्य कला एवं सौन्दर्य शास्त्र का एक सुन्दर आयाम है।
    नरेन्द्र नगर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। देहरादून से नरेन्द्र नगर की दूरी करीब 33 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। ऋषिकेश से नरेन्द्र नगर की दूरी करीब 15 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी नरेन्द्र नगर की यात्रा कर सकते हैं।
30.121280,78.293940

Wednesday, 17 October 2018

बेकल किला: विलक्षण सुन्दर संरचना

   बेकल किला को स्थापत्य कला एवं शिल्प सौन्दर्य का एक बेहतरीन आयाम कहें तो शायद कुछ गलत न होगा। 

  केरल के कासारगोड स्थित यह दिव्य-भव्य किला बेहद दर्शनीय है। शायद इसी लिए इसे पर्यटन स्थल घोषित किया गया है। खास यह कि बेकल किला केरल के मुख्य पर्यटन स्थलों में एक है। देखें तो बेकल किला तटीय किला की श्रेणी में आता है।

   कासारगोड के दक्षिण-पूर्व में करीब 15 किलोमीटर दूर पल्लीक्करे गांव के अरब सागर तट पर यह सुन्दर किला स्थित है।
   विशेषज्ञों की मानें तो बेकल किला की संचरना एवं निर्माण शिवप्पा नायक ने किया था। कर्नाटक से निकटता होने के कारण बेकल किला का सामरिक महत्व विजयनगर से खास तौर से रहा। 

   मान्यता यह भी है कि बेकल किला कोलाथिरी राजाओं के शासनकाल में मौजूद था। बेकल किला की दिव्यता-भव्यता बेहद विहंगम है। करीब चालीस एकड़ क्षेत्रफल में फैले बेकल किला की सुन्दर संरचना पर्यटकों को मुग्ध कर लेती है।

   लैटेराइट पत्थरों से संरचित किला की दीवारें 12 मीटर ऊंची हैं। किला का ताल्लुक समुद्र से भी है। किला के लिए स्थल का चयन बेहद सूूझबूझ के साथ किया गया।
  कारण किला से क्षेत्र का पूरा परिदृश्य दिखता है। समुद्र की दिशा में प्राचीर एवं परकोटे हैं। बीच-बीच में तोपों के लिए बुर्ज बने हैं।

   मुख्य द्वार सहित पूर्ण किला बुर्ज से सुरक्षित है। महत्वपूर्ण यह है कि किला में सीढ़ीदार टैंक भी है। सुरंग किला की गोपनीयता को बयां करती है तो गोला बारुद रखने के लिए बारुदखाना भी है। निगरानी मंच तक जाने के लिए चौड़ा रास्ता है।

   विशेषज्ञों की मानें तो उत्खनन में धर्म निरपेक्ष एवं धार्मिक ढ़ांचे भी मिले हैं। उत्खनन में टकसाल की भी महत्वपूर्ण खोज हो सकी। इसी में मध्ययुगीन महल परिसर भी शामिल हैं। समुद्र तल से करीब 130 फुट ऊंचाई पर बना यह किला सुन्दर संरचना का विहंगम आयाम है।


   बेकल किला से सूर्योदय एवं सूर्यास्त का लालित्य पूर्ण दृश्य बेहद लुभावना प्रतीत होता है। बेकल किला प्राकृतिक सुषमा के साथ ही एक खूबसूरत धरोहर भी है। प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर बेकल किला अपनी विशिष्टताओं के कारण देश दुनिया में एक अलग ही स्थान रखता है। 

   यह स्थान साम्प्रदायिक सौहाद्र्र को भी प्रदर्शित करता है। हनुमान जी का मुखप्रणाणा मंदिर एवं प्राचीन मस्जिद यहां की शोभा हैं। वस्तुत: देखें तो बेकल किला भूमि एवं समुद्र का संगम स्थल है।  
   विशेषज्ञों की मानें तो बेकल किला केरल का सबसे बड़ा एवं सुन्दर किला है। हालांकि इसका अपना एक लम्बा इतिहास है। फिर भी यह किला करीब 500 वर्ष पुराना है। 

   भारतीय पुरातात्विक विभाग ने इसे विशेष पर्यटन क्षेत्र घोषित किया है। यहां की विशिष्टताएं ही पर्यटकों, इतिहासकारों एवं प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करती हैं।
    मखमली घास के हरे-भरे मैदान पर्यटकों को न केवल लुभाते हैं बल्कि खिलंदड़पन का मन होता है। समुद्र की लहरें रोमांचित करती हैं। इसे एक आदर्श पिकनिक स्पॉट भी कह सकते हैं। पर्यटक बेकल किला में सैरसपाटा या घूमना फिरना सुबह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक कर सकते हैं।

   बेकल किला की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट मंगलोर है। निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा कालीकट में स्थित है।
   कालीकट एयरपोर्ट से बेकल किला की दूरी करीब 200 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कासरगोड जंक्शन है। यहां से बेकल किला की दूरी करीब 12 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी बेकल किला की यात्रा कर सकते हैं।
12.394680,75.034410

Tuesday, 16 October 2018

कटारमल सूर्य मंदिर: विशिष्ट स्थापत्य कला

   कटारमल सूर्य मंदिर की स्थापत्य कला एवं शिल्प कला की विशिष्टता खास तौर से देश दुनिया के पर्यटकों को आकर्षित करती है।

   कटारमल सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड की आगोश में रचे-बसे अल्मोड़ा में स्थित है। समुद्र तल से करीब 2116 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह सूर्य मंदिर देश दुनिया के आकर्षण का केन्द्र है। अधेली गांव स्थित कटारमल सूर्य मंदिर की स्थापत्य कला विलक्षण है। इसकी संरचना में कलात्मकता के विविध पहलुओं का दिग्दर्शन होता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो कटारमल सूर्य मंदिर की संरचना कत्यूरी राजवंश के शासनकाल में हुई थी। कुमाऊं के ऊंचे इलाके में कटारमल सूर्य मंदिर की पौराणिकता एवं ऐतिहासिकता का अपना एक अलग आयाम है।
   विशेषज्ञों की मानें तो अल्मोड़ा का यह सूर्य मंदिर देश के प्राचीनतम सूर्य मंदिरों में से एक है। विशेषज्ञों की मानें तो कटारमल सूर्य मंदिर का निर्माण 6 वीं से 9 वीं शताब्दी के मध्य किया गया।

   सुन्दर पत्थरों की यह संरचना श्रंखला अति दर्शनीय है। बताते हैं कि कटारमल सूर्य मंदिर की संरचना कत्यूरी राजवंश के शासक कटारमल के शासनकाल में किया गया था। 
  सूर्य देव को समर्पित कटारमल सूर्य मंदिर के शिखर भले ही खण्डित हो चुके हों, लेकिन विशालता, दिव्यता, भव्यता एवं वैभव आज भी रोमांचित करता है।

    मुख्य कटारमल सूर्य मंदिर के आसपास 45 से अधिक छोटे-छोटे मंदिरों की एक शानदार श्रंखला है। मुख्य मंदिर की संरचना त्रिरथ आधारित है। वर्गाकार गर्भगृह के साथ चक्ररेखी शिखर सहित निर्मित है। गर्भगृह का प्रवेश द्वार काष्ठ कला का बेजोड उत्कीर्ण है। 

   हालांकि इसके कुछ अवशेष नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। कटारमल सूर्य मंदिर का पौराणिक महत्व भी कम नहीं है। 
   विशेषज्ञों की मानें तो उत्तराखण्ड की कंदराओं में ऋषियों मुनियों की तपस्या में असुरों ने विघ्न डाले। असुरों ने अत्याचार किया। अत्याचार से परेशान ऋषियों मुनियों ने कंजार पर्वत पर सूर्य देव की स्तुति एवं आराधना की।

   सूर्य देव ने प्रसन्न होकर अपने दिव्य तेज को वटशिला में स्थापित कर दिया था। इसी वटशिला पर कत्यूरी राजवंश के शासक कटारमल ने बड़ादित्य नामक तीर्थ स्थान के रूप में सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था। बाद में यह सूर्य मंदिर कटारमल सूर्य मंदिर के नाम से विख्यात हुआ। 

   अब इस स्थान को कटारमल के नाम से जाना पहचाना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो सूर्य मंदिर कुमाऊं मण्डल में सबसे ऊंचा, विशाल एवं अनूठा मंदिर माना जाता है। 
  उडीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर के बाद कटारमल सूर्य मंदिर को सबसे प्राचीन सूर्य मंदिर के तौर पर माना जाता है।

   इसकी भव्यता-दिव्यता एवं विशिष्टता देख कर भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है। सूर्य देव प्रधान देवताओं की श्रेणी में आते हैं। सूर्य देव समस्त सृष्टि के आधार स्वरूप माने जाते हैं। सम्पूर्ण भारत में सूर्य देव की उपासना श्रद्धा एवं समर्पण के साथ की जाती है। 

  विशेषज्ञों की मानें तो समय-समय पर कटारमल सूर्य मंदिर का जीर्णोद्धार किया जाता है। इसे बड़ा आदित्य सूर्य मंदिर भी कहा जाता है। 
   खास यह कि सूर्य देव के इस मंदिर में भगवान आदित्य की प्रतिमा किसी धातु या पत्थर की न होकर लकड़ी की है। पूूर्व दिशा की ओर मुख वाले इस मंदिर को विलक्षण माना जाता है। मंदिर की संरचना नागर शैली पर आधारित है।

   कटारमल सूर्य मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पंतनगर है। पंतनगर एयरपोर्ट से कटारमल सूर्य मंदिर की दूरी करीब 135 किलोमीटर है।
   निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम है। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से कटारमल सूर्य मंदिर की दूरी करीब 130 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी कटारमल सूर्य मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
29.843050,79.337480

Monday, 15 October 2018

द्वाराहाट: मंदिरों का प्राचीन सौन्दर्य

   द्वाराहाट का सौन्दर्य शिल्प देख कर कोई भी मुग्ध हो सकता है। इसे पौराणिक एवं ऐतिहासिक लघु शहर कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   उत्तराखण्ड का द्वाराहाट वस्तुत: पर्वतीय क्षेत्र का एक सुन्दर आबाद क्षेत्र है। अल्मोड़ा जिला का द्वाराहाट अपनी विशिष्टता के कारण विश्व में एक खास स्थान रखता है। रानीखेत से करीब 21 किलोमीटर दूर स्थित द्वाराहाट मंदिरों के लिए विशेष तौर पर प्रसिद्ध है। 
   खास यह कि कई मंदिर तो प्रतिमा विहीन हैं लेकिन मंदिरों का सौन्दर्य शिल्प देखते ही बनता है। पर्वतीय क्षेत्र का यह सुन्दर इलाका अपनी आगोश में मंदिरों की विशिष्टता रखता है। 
   विशेषज्ञों की मानें तो द्वाराहाट में मंदिरों की 3 श्रेणियां हैं। इनको कचहरी, मनिया एवं रत्नदेव कहा जाता है। द्वाराहाट के मंदिर पौराणिकता एवं ऐतिहासिकता को खुद-ब-खुद बयां करते हैं। 
   ऐतिहासिक दृष्टि से द्वाराहाट का विशेष महत्व है। यहां गूजरदेव का मंदिर सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका शिल्प सौन्दर्य एवं इसकी प्राचीनता विशिष्ट है। कलात्मकता की दृष्टि से इस मंदिर को उत्कृष्ट कहा जा सकता है। मंदिर को चारों ओरसे भित्ति अंकन एवं कला पूर्ण शिलापट्ट श्रंखला से अलंकृत किया गया है। 

    द्वाराहाट का माता शीतला देवी का मंदिर भी दिव्य-भव्य है। द्वाराहाट को वैराटपट्टन तथा लखनपुर सहित कई अन्य नामों से भी जाना पहचाना जाता है। कुमाऊं की प्रचलित लोककथाओं में द्वाराहाट को देवताओं की राजधानी भी कहा गया है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि द्वाराहाट उत्तराखण्ड के भौगोलिक क्षेत्र के मध्य में स्थित है।

   कहावत है कि देवताओं ने द्वाराहाट को राजधानी के तौर पर चुना था। इसकी सुन्दरता एवं भव्यता दक्षिण भारत के कृष्ण की द्वारका के समानान्तर है। मान्यता है कि इस नगर की योजना प्रारम्भ हुई तो निर्णय लिया गया कि यहां रामगंगा एवं कोसी नदियों का संगम बनाया जाये। 

   देवताओं ने तत्काल गगास नदी से रामगंगा एवं कोसी को सूचना देने को कहा। हालात यह रहे कि विघ्न बाधाओं के कारण द्वाराहाट देव राजधानी नहीं बन सका। फिर भी द्वाराहाट की पौराणिकता, ऐतिहासिकता एवं सौन्दर्य शिल्प अतुलनीय है। उत्तराखण्ड के इस इलाके पर खास तौर से कत्यूरी एवं चन्द शासकों का शासन रहा। 

    कत्यूरी शासकों ने गढ़वाल जोशीमठ से चलकर गोमती नदी के किनारे बैजनाथ गांव के निकट शिव पुत्र स्वामी कार्तिकेय के नाम से कर्तिकेयपुर नगर की स्थापना की थी। यह सभी इलाके द्वाराहाट के अधीन आते हैं।
    विशेषज्ञों की मानें तो 12 वीं शताब्दी से लेकर 14 वीं शताब्दी तक कत्यूरी वंश की शाखायें द्वाराहाट से लेकर आसपास के इलाके में फैली हुर्इं थीं। समुद्र तल से करीब 1510 मीटर ऊंचाई पर स्थित द्वाराहाट शीतलता एवं सुन्दरता के लिए विशेष पहचान रखता है। 
   खूबसूरती एवं मंदिरों के लिए प्रसिद्ध द्वाराहाट को मंदिरों का गांव भी कहा जाता है। दूनागिरी एवं नयना देवी मंदिर को शक्ति स्थल के तौर पर मान्यता है। 

   मान्यता है कि दुर्लभ जड़ी बूटियां संजीवनी शक्ति मंदिर के आंतरिक क्षेत्र में पैदा होती हैं। द्वाराहाट में मंदिरों की लम्बी श्रंखला होने के कारण इसे कुमाऊं का खजुराहो भी कहते हैं। द्वाराहाट पर्यटकों को स्वर्णिम एवं देव लोक की यात्रा का एहसास कराता है। 

   द्वाराहाट का महामृत्युंजय मंदिर विशेष है। यह मंदिर भगवान शिव-मृत्युंजय अर्थात मृत्यु पर विजय पाने वालों को समर्पित है। यह मंदिर नागर शिखर शैली में निर्मित है। इसमें गर्भगृह, अंतराल एवं मण्डप आदि बहुत कुछ है।

    द्वाराहाट के मंदिरों का शिल्प विशिष्ट है। पत्थरों को तराश कर कहीं देवी देवताओं का अंकन किया गया है तो कहीं सुन्दर आयामों को गढ़ा गया है। द्वाराहाट की पौराणिकता, ऐतिहासिकता एवं खूबसूरती को पर्यटन ने विकास के पंख लगा दिये।

    लिहाजा इस पौराणिक नगर की ओर देश-विदेश के पर्यटकों का आकर्षण बना रहता है। समुद्र तल से 1510 मीटर ऊंचाई पर स्थित होने के कारण द्वाराहाट ने हिल स्टेशन का भी स्वरूप धारण कर लिया है। शांत वातावरण एवं शीतलता एक सुखद एहसास कराती है। प्राचीन मैथाडिस्ट चर्च भी यहां के सौन्दर्य शास्त्र का एक सुन्दर नगीना है।
    द्वाराहाट की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पंतनगर है। पंतनगर एयरपोर्ट से द्वाराहाट की दूरी करीब 112 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम जंक्शन है। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से द्वाराहाट की दूरी करीब 88 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी द्वाराहाट की यात्रा कर सकते हैं।
29.774800,79.427300

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