पौड़ी गढ़वाल: अद्भुत सौन्दर्य
पौड़ी गढ़वाल की सुन्दरता का कहीं कोई जोड़ नहीं। जी हां, पौड़ी गढ़वाल में पर्वतीय सुन्दरता का हर आयाम रूपांकित है। शायद इसीलिए देश दुनिया के पर्यटक पौड़ी गढ़वाल के आकर्षण में खिंचे चले आते हैं।
समुद्र तल से करीब 1814 मीटर ऊंचाई पर स्थित पौड़ी गढ़वाल हिमालय की गोद में रचा-बसा एक समृद्ध शहर है। यहां की अपनी एक अलग सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक परम्परा है। चौतरफा खूबसूरत वादियां-घाटियां पौड़ी गढ़वाल की सुन्दरता में चार चांद लगा देती हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति की गोद में प्रवास हो। पौड़ी गढ़वाल में कहीं नदियों का प्रवाहमान रोमांचित करता है तो कहीं हिम शिखर सौन्दर्य बोध कराते हैं। वन श्रंखला भी बेहद दर्शनीय है।
पौड़ी गढ़वाल में जैसे फेफड़ों को आक्सीजन के पंख लग जाते हैं। शांत एवं शीतल हवा का प्रवाहमान मन मस्तिष्क को रोमांचित कर देता है। बर्फ की चादर से आच्छादित पौड़ी गढ़वाल के हिम शिखर एक स्वप्नीली दुनिया का एहसास कराते हैं।
पहाड़ियों के मध्य बसा यह सुन्दर शहर उत्तराखण्ड का एक जिला है। वस्तुत: पौड़ी गढ़वाल हिमालय की कंडोलिया पहाड़ी पर स्थित है।
पौड़ी गढ़वाल प्राचीनता के साथ ही हिल स्टेशन की सुरम्यता भी रखता है। ऊंचाई पर होने के कारण पौड़ी गढ़वाल का मौसम वर्ष पर्यन्त अति सुहाना रहता है।
लिहाजा पर्यटक कभी भी इस प्राचीनतम शहर एवं हिल स्टेशन की यात्रा कर सकते हैं। खास तौर से देखें तो पौड़ी गढ़वाल में शानदार नदियों की श्रंखला है। यहां प्रवांिहत नदियों में अलकनंदा, हेंवल एवं नायर हैं। पौड़ी की मुख्य भाषा गढ़वाली है। हालांकि यहां हिन्दी एवं अंग्रेजी भी बोली जाती है।
गढ़वाल के लोक गीत-संगीत, नृत्य एवं संस्कृति की अपनी एक अलग परम्परा एवं आकर्षण है। पौड़ी गढ़वाल की भौगोलिक दशा-दिशा देखें तो यह पर्वतीय शहर गोलाकार बसा है।
उत्तर दिशा में चमोली, रुद्रप्रयाग एवं टेहरी गढ़वाल हैं। दक्षिण में उधम सिंह नगर, पूर्व में अल्मोड़ा, नैनीताल, पश्चिम में देहरादून एवं हरिद्वार शहर हैं।
करीब 5440 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बसा यह सुन्दर शहर उत्तराखण्ड का विशेष आकर्षण है। चौतरफा पर्वत श्रंखला के शिखर एक अद्भुत रोमांच पैदा करते हैं तो वहीं हरी-भरी वादियां-घाटियां मखमली स्पर्श का एहसास कराती हैं। सघन वन क्षेत्र शांत शीतलता प्रदान करते हैं।
पौड़ी गढ़वाल में पर्यटक बर्फबारी का भरपूर लुफ्त ले सकते हैं। इस शीतलता के मध्य पर्यटक बादलों का स्पर्श महसूस कर सकते हैं। कारण ऊंचाई पर होने के कारण बादलों का खिलंदड़पन अनवरत चलता रहता है। पौड़ी गढ़वाल एवं उसके आसपास आकर्षक एवं सुन्दर स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है।
इनमें खास तौर से कंडोलिया शिव मंदिर, बिंसर महादेव, ताराकुण्ड, कण्वाश्रम, दूधातोली, ज्वालपा देवी मंदिर आदि इत्यादि बहुत कुछ है।
कंडोलिया: कंडोलिया वस्तुत: भूमि देवता का स्थान माना जाता है। पौड़ी गढ़वाल से कंडोलिया करीब दो किलोमीटर दूर है। कंडोलिया देवता को समर्पित यह मंदिर वस्तुत: शिव मंदिर है। यहां मुख्यत: भूमि देवता का पूजन होता है।
कंडोलिया: कंडोलिया वस्तुत: भूमि देवता का स्थान माना जाता है। पौड़ी गढ़वाल से कंडोलिया करीब दो किलोमीटर दूर है। कंडोलिया देवता को समर्पित यह मंदिर वस्तुत: शिव मंदिर है। यहां मुख्यत: भूमि देवता का पूजन होता है।
खूबसूरत उद्यान एवं विशाल मैदान कंडोलिया का मुख्य आकर्षण है। इसके निकट ही एशिया का सबसे बड़ा माना जाने वाला स्टेडियम रांसी है। कंडोलिया को एक आदर्श पिकनिक स्पॉट कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। निकट ही गंगवारेशियन घाटी भी है।
बिंसर महादेव: बिंसर महादेव समुद्र तल से करीब 2480 मीटर ऊंचाई पर स्थित हैं। बिंसर महादेव वस्तुत: पौड़ी गढ़वाल से करीब 115 किलोमीटर दूर पर्वत चोटी पर विद्यमान हैं। बिंसर प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए खास तौर से जाना पहचाना जाता है।
बिंसर महादेव मंदिर में भगवान शिव-हरगौरी, गणेश जी एवं महिसासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित हैं। मान्यता है कि बिंसर महादेव की स्थापना महाराजा पृथ्वी सिंह ने पिता बिंदु की स्मृति में कराया था। इस दिव्य-भव्य मंदिर को बिंदेश्वर मंदिर भी कहा जाता है।
ताराकुण्ड: ताराकुण्ड समुद्र तल से करीब 2200 मीटर ऊंचाई पर स्थित एक सुन्दर स्थान है। ताराकुण्ड का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। यहां से आसपास का दृश्य मुग्ध करने वाला होता है।
ऐसा प्रतीत होता कि जैसे प्रकृति में खो जायें। सुन्दर झील एवं प्राचीन मंदिर यहां के सौन्दर्य को चार चांद लगा देता है। बताया जाता है कि स्वर्गारोहण के समय पाण्डव यहां आये थे। पाण्डव ने ही मंदिर का निर्माण किया था। यह स्थान भी भूमि देवता को समर्पित है।
कण्वाश्रम: कण्वाश्रम मालिनी नदी के किनारे स्थित है। कण्वाश्रम कोटद्वार से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित है। यह आश्रम ऋषि कण्व का है। आश्रम का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व है। मान्यता है कि महर्षि विश्वमित्र ने यहां तप किया था।
मेनका ने यहीं विश्वमित्र का तप भंग किया था। इसके बाद मेनका ने कन्या रूप में जन्म लिया आैर स्वर्ग वापस लौट गयी थी। बाद में इसी कन्या को शकुंतला के नाम से जाना गया। शकुंतला का विवाह हस्तिनापुर के महाराजा से हुआ था। शकुंतला के पुत्र का नाम भारत रखा गया। भारत के राजा बनने के बाद देश का नाम भारत रखा गया। इस दृष्टि से इस स्थान का विशेष महत्व माना जाता है।
दूधतोली: दूधतोली सबसे ऊंचाई वाला इलाका माना जाता है। समुद्र तल से दूधतोली की ऊंचाई 3100 मीटर है। वन क्षेत्र से आच्छादित यह इलाका प्राकृतिक सौन्दर्य का एक शानदार आयाम है। खास यह कि दूधतोली चौतरफा हिमालय से घिरा हुआ है। आसपास का विहंगम दृश्य यहां से दिखता है।
ज्वालपा देवी मंदिर: ज्वालपा देवी मंदिर माता दुर्गा जी को समर्पित है। इस स्थान की मान्यता शक्तिपीठ की है। पौड़ी गढ़वाल-कोटद्वार मार्ग पर करीब 33 किलोमीटर दूर यह मंदिर स्थित है।
दूधतोली: दूधतोली सबसे ऊंचाई वाला इलाका माना जाता है। समुद्र तल से दूधतोली की ऊंचाई 3100 मीटर है। वन क्षेत्र से आच्छादित यह इलाका प्राकृतिक सौन्दर्य का एक शानदार आयाम है। खास यह कि दूधतोली चौतरफा हिमालय से घिरा हुआ है। आसपास का विहंगम दृश्य यहां से दिखता है।
ज्वालपा देवी मंदिर: ज्वालपा देवी मंदिर माता दुर्गा जी को समर्पित है। इस स्थान की मान्यता शक्तिपीठ की है। पौड़ी गढ़वाल-कोटद्वार मार्ग पर करीब 33 किलोमीटर दूर यह मंदिर स्थित है।
पौड़ी गढ़वाल की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून से पौड़ी गढ़वाल की दूरी करीब 155 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोटद्वार है। कोटद्वार से पौड़ी गढ़वाल की दूरी करीब 108 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी पौड़ी गढ़वाल की यात्रा कर सकते हैं।
30.148500,78.774500
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