Wednesday, 21 August 2019

ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान: वनस्पतियों का खजाना

    ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान की प्राकृतिक सुन्दरता का कोई जोड़ नहीं। जी हां, ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान वन्य जीव प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।

   सैर सपाटा के लिए यह राष्ट्रीय उद्यान एक शानदार पिकनिक स्पॉट भी है। भारत के महाराष्ट्र के चन्द्रपुर जिला का यह शानदार राष्ट्रीय उद्यान वस्तुत: बाघ संरक्षित क्षेत्र है। बाघ संरक्षित क्षेत्र को ताडोबा अंघारी बाघ संरक्षित क्षेत्र के नाम से जाना पहचाना जाता है। नागपुर से करीब 150 किलोमीटर दूर स्थित ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान खास तौर से सुरम्यता के लिए जाना पहचाना जाता है। 

   ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान हमेशा वन्य जीवों से गुलजार रहता है। ताडोबा आैषधीय वनस्पतियों की प्रचुरता के लिए भी जाना पहचाना जाता है। कोल्सा इस राष्ट्रीय उद्यान का विशिष्ट क्षेत्र है। वस्तुत: यह सघन वन क्षेत्र है। इस सघन वन क्षेत्र में आैषधीय वनस्पतियों का खास तौर से भण्डारण परिलक्षित होता है।

    खास यह कि इस सघन वन क्षेत्र में दुर्लभ एवं विलुप्त आैषधीय वनस्पतियां भी दर्शनीय हैं। कोल्सा में वन्य जीवों की दर्शनीयता अति दुर्लभ होती है। कारण यह सघन वन क्षेत्र है। उद्यान की उत्तरी दिशा में आैषधीय वनस्पतियों से आच्छादित पर्वतमालाएं ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान की शान एवं शोभा हैं। 

   इन पर्वत मालाओं के शिखर से ताडोबा की दर्शनीय अति सुन्दर प्रतीत होती है। उद्यान की पश्चिमी दिशा भी पर्वतीय शोभा से आलोकित है। करीब 200 से 350 मीटर की ऊंचाई वाली यह पर्वत श्रंखलाएं ताडोबा का मुख्य आकर्षण है। वन्य जीवों की समृद्धता ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान का मुख्य आकर्षण है। 

   ताडोबा का बाघ संरक्षित क्षेत्र का अपना एक अलग ही आकर्षण है। करीब 1727 वर्ग किलोमीटर के दायरेे में फैले बाघ संरक्षित क्षेत्र में बाघ वंश के क्रियाकलाप पर्यटकों में एक खास रोमांच पैदा करते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इस विशाल बाघ संरक्षित क्षेत्र में चार दर्जन से अधिक बाघ वंंश हैं। 

   इस विशाल राष्ट्रीय उद्यान में झीलों एवं नदियों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। इनमें खास तौर से ताडोबा नदी, ताडोबा झील एवं कोल्सा झील ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान की शान एवं शोभा हैं। ताडोबा झील करीब 300 एकड़ लम्बे चौड़े क्षेत्र में है। बारिश के मौसम में उद्यान प्रवासी पक्षियों से गुलजार हो उठता है। इस अवधि में बड़ी तादाद में प्रवासी पक्षी यहां प्रवास करते हैं। 

   वस्तुत: यह जल क्षेत्र मगरमच्छ एवं घड़ियालों का शानदार आशियाना माना जाता है। मोहरली इस शानदार उद्यान का विशिष्ट क्षेत्र है। कारण इस वन्य क्षेत्र में वन्य जीवों की दर्शनीयता अति सुलभ होती है। सफारी के लिहाज से भी यह इलाका खास है। 

   पर्यटक मोहरली में सफारी का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। सफारी का आनन्द बेहद रोमांचक होता है। कारण सफारी यात्रा के दौरान पर्यटक निकट से वन्य जीव को देख सकते हैं। ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा का बेहतरीन समय अक्टूबर से जून की अवधि रहता है।
   बारिश के मौसम में ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा से बचना चाहिए। खास यह कि इस उद्यान में फूलों की विभिन्न प्रजातियां पुष्पित-पल्लवित हैं। लिहाजा ताडोेबा राष्ट्रीय उद्यान सुगंध से परिपूरित रहता है।

   ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट नागपुर एयरपोर्ट हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन चन्द्रपुर रेलवेे स्टेशन है। रेलवे स्टेशन से ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान की दूरी करीब 45 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
19.960300,79.300400

Wednesday, 14 August 2019

भद्रा वन्य जीव अभयारण्य: वनस्पतियों की सुगंध

   भद्रा वन्य जीव अभयारण्य को वस्तुत: आैषधीय वनस्पतियों का भण्डारण कहा जाना चाहिए। जी हां, भद्रा वन्य जीव अभयारण्य में दुर्लभ आैषधीय वनस्पतियां भी खास तौर से पुष्पित एवं पल्लवित हैं। 

   लिहाजा वनस्पतियों की सुगंध से परिवेश महकता रहता है। शायद इसी लिए इस वन्य जीव अभयारण्य को विशेष माना जाता है। भारत के कर्नाटक प्रांत के जिला चिकमंगलूर का यह शानदार अभयारण्य वस्तुत: बाघ संरक्षित क्षेत्र है।

   मैसूर की तत्कालीन सरकार ने वर्ष 1951 में जगार घाटी वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया था। वर्ष 1974 में जगार घाटी वन्य जीव अभयारण्य का नाम बदल कर भद्रा वन्य जीव अभयारण्य कर दिया गया। यह अभयारण्य भद्रावती से करीब 23 किलोेमीटर दक्षिण एवं चिकमंगलूर से पश्चिम दिशा में करीब 38 किलोमीटर तक विस्तारित है। 

   भद्रा वन्य जीव अभयारण्य की खासियत है कि वन्य जीवों के साथ ही आैषधीय वनस्पतियों का संरक्षण क्षेत्र भी है। विशेषज्ञों की मानें तो 120 से अधिक आैषधीय प्रजातियों की वनस्पतियां इस अभयारण्य में सुरक्षित एवं पल्लवित हैं।

  भौगोलिक दृष्टि से देखें तो भद्रा वन्य जीव अभयारण्य पश्चिमी घाट का हिस्सा है। भद्रा वन्य जीव अभयारण्य बेहद दर्शनीय एवं प्रकृति का एक शानदार उपहार है। इस शानदार अभयारण्य का मुख्य आकर्षण भद्रा नदी है।

   फोटोग्राफर्स, प्रकृति एवं वन्य जीव प्रेेमियों के लिए भद्रा वन्य जीव अभयारण्य किसी स्वर्ग से कम नहीं है। समुद्र तल से करीब 1875 मीटर ऊंचाई पर स्थित भद्रा वन्य जीव अभयारण्य साहसी गतिविधियों के लिए भी जाना पहचाना जाता है। 

   इस शानदार अभयारण्य में हाथियों के झुण्ड स्वच्छंद विचरण करते देखे जा सकते हैं। एशियाई हाथियों के अलावा इस अभयारण्य में तेंदुआ, बाघ, सांभर, जंगली सुअर, चीतल, हिरन, साही आदि इत्यादि हैं। पक्षियों की तो असंख्य प्रजातियां इस अभयारण्य में पल्लवित हैं।

    विशेषज्ञों की मानें तो इस अभयारण्य मेें 300 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां हैं। इनमें खास तौर से पन्ना कबूतर, दक्षिण हरा शाही कबूतर, काला कठफोड़वा, मालाबार परकेट एवं पहाड़ी मैना आदि इत्यादि हैं। पक्षियों के इन्द्रधनुषी रंग देख कर पर्यटक मुग्ध हो जाते हैं। 

    बारिश के मौसम में भद्रा वन्य जीव अभयारण्य का मिजाज ही बदला दिखता है। चौतरफा प्रवासी पक्षियों का बसेरा दिखता है। पक्षियों का कोलाहल, कोकिल कलरव संगीत की एक मीठी तान सुनाता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस शानदार अभयारण्य में तीन दर्जन से अधिक बाघ वंश हैं। 

   वन्य जीवों की विलुप्त प्रजातियां भी इस अभयारण्य में खास तौर से संरक्षित हैं। उड़ने वाली गिलहरी भी इस अभयारण्य का खास आकर्षण है। खास यह कि भद्रा वन्य जीव अभयारण्य में कई ऊंची पर्वत चोटियां हैं।

    लिहाजा पर्यटक यहां पर्वतारोहण का भी आनन्द ले सकते हैं। इस इलाके की सबसे अधिक ऊंची पर्वत चोटी हेब्बे गिरी शिखर है। भद्रा वन्य जीव अभयारण्य के मखमली घास के मैदान बेहद दर्शनीय है। 
   सफारी का आनन्द: भद्रा वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा के दौरान पर्यटक सफारी का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। हालांकि सफारी का आनन्द पर्यटक भद्रा वन्य जीव अभयारण्य के एक निर्धारित सीमा क्षेत्र में ही ले सकते हैं। सफारी भ्रमण के दौरान पर्यटक वन्य जीवों को निकटता से देख सकते हैं।

    भद्रा वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट मंगलूर एयरपोर्ट है। मंगलूर एयरपोर्ट से भद्रा वन्य जीव अभयारण्य की दूरी करीब 180 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कदूर हासन जंक्शन है। कदूर हासन जंक्शन से भद्रा वन्य जीव अभयारण्य की दूरी करीब 83 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी भद्रा वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा कर सकते हैं।
13.314380,75.775467

Tuesday, 13 August 2019

नागरहोल अभयारण्य : एशियाई हाथियों का आशियाना

   नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य को एशियाई हाथियों का आशियाना कहा जाना चाहिए। जी हां, इस शानदार एवं प्राकृतिक सम्पदा समृद्ध अभयारण्य में एशियाई हाथियों की चिंघाड़ वैश्विक पर्यटकों को खास तौर से आकर्षित करती है।

   शायद इसीलिए नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य अपनी खासियत के लिए वैश्विक ख्याति रखता है। भारत के कर्नाटक के मैसूर एवं कोडागू सीमा क्षेत्र में आने वाला यह विहंगम अभयारण्य में एशियाई हाथियों के झुण्ड स्वच्छंद विचरण करते दिखते हैं। 

   बारिश में इस अभयारण्य में रंगों की इन्द्रधनुषी दुनियां खास तौर से दर्शित होती है। कारण प्रवासी पक्षियों के रंग-विरंगे स्वरूप अभयारण्य को इन्द्रधनुषी बना देते हैं। यह दृश्य अति दर्शनीय होता है। पक्षियों का कलरव एवं कोलाहल से अभयारण्य का परिवेश एक सुमधुर संगीत से अनुगूंजित हो उठता है। 

  खास तौर से एक अनोखा वातावरण सृजित होता है। पशु एवं पक्षी प्रेमियों के लिए यह किसी स्वर्ग से कम नहीं होता। इस शानदार एवं सुन्दर नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। खास यह कि इसे राजीव गांधी राष्ट्रीय उद्यान के रूप में भी जाना पहचाना जाता है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो राजा रजवाड़ों के शासनकाल में नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य मैसूर राजघराने का शिकारगाह था। बाद में इसे शासकीय अभयारण्य में तब्दील कर दिया गया। करीब 640 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला यह शानदार अभयारण्य वस्तुत: दक्कन पठार का हिस्सा है।

   नागरहोल नदी इस अभयारण्य का मुख्य आकर्षण है। इसे अभयारण्य के वन्य जीवों की लाइफ लाइन भी कह सकते हैं। नागरहोल नदी आगे चल कर कबीनी नदी में समाहित हो जाती है। 
  इस नदी पर बने बांध के कारण नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य के एक हिस्से में एक विशाल झील ने आकार ले लिया है। इस झील की एक दिशा में बांदीपुर टाइगर रिजर्व है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो राजसी काल के बाद वर्ष 1955 में इसे शासकीय अभयारण्य का स्वरूप दिया गया। खास यह कि इसे वर्ष 1999 में देश के 37 वें टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित किया गया।

   नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य में एशियाई हाथियों के अलावा भालू, तेंदुए, बाघ, जंगली कुत्ते, जंगली सुअर, सांभर, चार सींग वाले हिरन, चित्तीदार हिरन, बार्किंग हिरन आदि इत्यादि शान एवं शोेभा हैं। इस अभयारण्य में शेर एवं काले हिरन भी हैं।  
   सफारी का आनन्द: पर्यटक नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य में सफारी का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। सफारी से जंगली पशु पक्षियों कोे निकट से देखने का बेहद रोमांचक अनुभव होता है। खास यह कि सफारी में पर्यटक एक निश्चित सीमा क्षेत्र में ही भ्रमण कर सकते हैं।
   ब्रह्मगिरी अभयारण्य: पर्यटक नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा करें तो निकट ही ब्रह्मगिरी अभयारण्य का रोमांचक अनुभव भी अवश्य हासिल करें। करीब 181 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले ब्राह्मगिरी अभयारण्य कुट्टा एवं माकुट्टा के मध्य स्थित है। 
   इपरु वॉटर फॉल्स : इपरु वॉटर फॉल्स वस्तुत: ब्राह्मगिरी पर्वत की तराई पर स्थित एक शानदार झरना है। वस्तुत: यह इलाका अभयारण्य एवं पर्वतों का प्रवेश द्वार माना जाता है। 
  बारिश के मौसम में यहां का परिवेश अत्यंत सुहावना हो जाता है। निकट ही ईश्वर मंदिर है। मान्यता है कि इस स्थान पर भगवान श्रीराम ने शिवलिंग की पूजा अर्चना की थी।

   कुट्टा : कुट्टा इस इलाके का अत्यंत मनोरम एवं धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि देवी काली ने यहां पर निम जाति के कुरुबस से विवाह किया था। उनके पुत्र का नाम कुट्टा था। लिहाजा इस स्थान को कुट्टा के नाम से जाना पहचाना जाता है।

    नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट मैसूर है। मैसूर एयरपोर्ट से नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य की दूरी करीब 96 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मैसूर जंक्शन है। रेलवे स्टेशन से नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य की दूरी करीब 80 किलोमीटर है। पर्यटक सड़़क मार्ग से भी नागरहोल वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा कर सकते हैं।
12.301770,76.664124

Thursday, 8 August 2019

बाहु किला : अद्भुत स्थापत्य कला

   बाहु किला की स्थापत्य कला का कोई जोड़ नहीं। चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य की इन्द्रधनुषी आभा बाहु किला को आैर भी अधिक सुन्दर बना देती है। 

  बाहु किला का बाहु ए बाग भी अति दर्शनीय है। भारत के जम्मू एवं कश्मीर के शहर जम्मू का यह अति प्राचीन एवं सुन्दर किला पर्यटन की दृष्टि से बेहद खास माना जाता है।

   गढ़वाली स्थापत्य शैली पर आधारित बाहु किला की संरचना अति दर्शनीय है। चूना एवं र्इंट पत्थर की यह संरचना अति प्राचीन है। समुद्र तल से करीब 325 मीटर ऊंचाई पर स्थित बाहु किला सैंड स्टोन की मोटी दीवारों पर आधारित है। विशाल पत्थरों की इन मोटी दीवारों पर अष्टकोणीय टॉवर एवं बुर्ज स्थापित हैं। किला के मुख्य द्वार की विशालता देखते ही बनती है। 

  किला की पिरामिड संरचना भी इसे अद्भुत एवं विलक्षण बनाती है। खास यह कि इस दिव्य-भव्य किला में कारागार भी है। गुप्त निकास के तौर पर यहां सुरंग का भी प्रावधान है। बाहु किला का मुख्य आकर्षण राजमहल एवं बारादरी है। 

  चौतरफा खूबसूरत बाग बगीचों से सजा धजा राजमहल एवं बारादरी की दर्शनीयता खास है। बाहु किला का मुख्य आकर्षण महाकाली मंदिर एवं बाग-ए-बाहु है। जम्मू एवं कश्मीर सरकार ने बाहु किला को धरोहर घोषित किया था। 

   धरोहर घोषित होने के उपरांत बाहु किला का पर्यटन की दृष्टि से विकास किया गया। इसमें शानदार फव्वारा एवं नौकायन की व्यवस्थाएं की गयीं। जिससे पर्यटकों का आकर्षण तेजी से बढ़ा। 
  बाग ए बाहु को एक छोटी झील के साथ ही पार्क का विकास किया गया है। खूबसूरत झरनों, हरे-भरे बाग बगीचों एवं फूलों से भरे लॉन-मैदान इस किला की शान एवं शोभा हैं। 


   सीढ़ीनुमा संरचना पर्यटकों को खास लुभाती है। जम्मू एवं कश्मीर की यात्रा करने वाले पर्यटक बाहु किला घूमना नहीं भूलते हैं। शहर के मध्य से करीब 5 किलोमीटर दूर तवी नदी के तट पर स्थित बाहु किला करीब 3000 वर्ष प्राचीन है।

   विशेषज्ञों की मानें तो इस किला का दिव्यता-भव्यता में कोेई जोड़ नहीं है। इस किला का निर्माण राजा बाहु लोचन ने कराया था। बाद में डोगरा शासकों ने इसका नवनिर्माण कराया था। प्राकृतिक सौन्दर्य से लबरेज बाहु किला पर्यटकों को जादुई सा प्रतीत होता है।

   बाहु किला के निर्माण से ताल्लुक रखने वाली एक कहावत है। राजा लोचन एक बार शिकार खेलते हुए तवी नदी के इलाके में पहुंच गये। राजा ने देखा कि बाघ एवं बकरी नदी के एक ही घाट पर पानी पी रहे हैं। 

  यह देख कर राजा को आश्चर्य हुआ। इसके बाद राजा ने इस क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाने पर विचार किया। इसके बाद इस भव्य दिव्य बाहु किला का निर्माण किया गया।

  महाकाली मंदिर: महाकाली मंदिर बाहु किला के आंतरिक क्षेत्र का एक प्रसिद्ध स्थान है। इसकी शक्ति पीठ की मान्यता है। करीब 1.2 मीटर ऊंचाई वाले प्लेटफार्म पर बने इस मंदिर का वास्तुशिल्प अति दर्शनीय है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण 8वीं एवं 9वीं शताब्दी के मध्य किया गया था। अतीत में इस मंदिर पशु बलि का प्रचलन था।

  हालांकि इसे बाद में बंद कर दिया गया था। प्रसाद में यहां कड़ा (हलवा) दिया जाता है। इस मंदिर को भावे वाली माता भी कहा जाता है। इस मंदिर की महत्ता वैष्णो देवी के बाद दूसरे स्थान पर है। महाकाली का यह मंदिर भारत के प्रसिद्ध काली मंदिरों में एक है।

   बाहु किला की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जम्मू एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू तवी जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी बाहु किला की यात्रा कर सकते है।
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Sunday, 4 August 2019

मैसूर : महलों का इन्द्रधनुषी सौन्दर्य

   पौराणिक शहर मैसूर के इन्द्रधनुषी सौन्दर्य का कोई मुकाबला नहीं। जी हां, ऐतिहासिक, पौराणिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से मैसूर अति समृद्धशाली है। 

   भारत के कर्नाटक का यह शानदार एवं जानदार शहर पर्यटन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। कारण चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य की निराली छटा पर्यटकों को मुग्ध करती है। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से करीब 150 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में तमिलनाडु की सीमा से सटा मैसूर उत्सव एवं उल्लास के लिए बेहद प्रसिद्ध है। 

  खास तौर मैसूर का दशहरा देश दुनिया में विशेष ख्याति रखता है। मैसूर की स्थापत्य कला पर्यटकों को खास तौर सेे मुग्ध करती है। मैसूर की खासियत यह है कि मैसूर में राजमहलों की एक शानदार श्रंृखला विद्यमान है। इन राजमहलों का सौन्दर्य देश विदेश के पर्यटकों को स्वत: आकर्षित करता है। 

  मैसूर महल, जगन मोहन पैलेस, जयलक्ष्मी पैलेस, ललिता पैलेस आदि इत्यादि मैसूर की शान एवं शोभा हैं। कर्ण झील चिड़ियाखाना मैसूर का मुख्य आकर्षण है। मैसूर रेल संग्रहालय ज्ञानवर्धक एवं अति दर्शनीय है। 
  वृंदावन गार्डेन में पर्यटक एक मखमली एहसास में खो जाते हैं। वृंदावन गार्डेन का म्युजिकल फाउण्टेन पर्यटकों पर एक जादूू सा कर देता है। संगीतमय फव्वारा की जलीय हलचल देख कर पर्यटक रोमांचित हो जातेे हैं।
   खास यह कि मैसूर में रंग बिरंगे फूलों से सजे-धजे बाग-बगीचोें की एक लम्बी श्रंृखला विद्यमान है। जिससे मैसूर की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। मैसूर शहर से कुछ दूर स्थित कृष्ण राज सागर बांध एक आदर्श पर्यटन क्षेत्र है। इसे आदर्श पिकनिक स्पॉट भी कह सकते हैं। 

  इतना ही नहीं, मैसूर चिड़ियाघर की यात्रा करना तो पर्यटक भूल ही नहीं सकते। चामुंडी पहाड़ी एवं सोमनाथपुर का प्राकृतिक सौन्दर्य यात्रा का एक शानदार एवं न भूलने वाला संस्मरण बन जाता है। आकर्षण से लबरेज मैसूर को शायद इसी लिए धरती पर स्वर्ग कहा जाता है। खास यह कि मैसूर कलात्मकता का इन्द्रधनुषी रंग है। 
   मैसूर महल: मैसूर महल इस शहर का मुख्य आकर्षण है। शहर के मिर्जा रोड स्थित यह शानदार महल भारत के सबसे बड़े महलों में से एक है। विशेषज्ञों की मानें तो महाराजा वुडेयार का यह निवास था। बताते हैं कि मैसूर महल पहले लकड़ी का था लेकिन लकड़ी का महल जल जाने के कारण इस शानदार महल का निर्माण कराया गया था।

   इसकी दर्शनीयता अति सुन्दर है। वर्ष 1912 में बने इस शानदार महल को ब्रिाटिश शिल्पकार हैनरी इर्विन ने डिजाइन किया था। कल्याण मण्डपम की कांच से बनी छत की इन्द्रधनुषी छटा पर्यटकों को मुग्ध करती है। स्वर्ण सिहांसन इस महल का खास आकर्षण है। बेशकीमती रत्नों से सुसज्जित इस सिंहासन को आम जनता को देखने के लिए दशहरा पर्व पर सार्वजनिक किया जाता है। इस महल का रखरखाव पुरातत्व विभाग के सुपुर्द है। 
   जगनमोहन महल: जगनमोहन महल वस्तुत: मैसूर की प्राचीन इमारतों में से एक है। तीन मंजिला इस इमारत को वर्ष 1915 में जयचमा राजेन्द्र आर्ट गैलरी का स्वरूप दे दिया गया था। खास यह कि इस शानदार कलादीर्घा में तंजौर एवं मैसूूर शैली की पेंटिंग्स, मूर्तियां एवं दुर्लभ वाद्ययंत्र संग्रहित हैं।

   चामुंडी पहाड़ी: चामुंडी पहाडी मैसूर का मुख्य पर्यटन स्थल है। शहर से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित चामुंडी पहाडी एक धार्मिक स्थल भी है। पर्वत की चोटी पर देेवी चामुंडेश्वरी का मंदिर है। मंदिर द्रविड वास्तुकला की सुन्दर संरचना है। 
   सेंट फिलोमेना चर्च: सेंट फिलोमेना चर्च भारत के सबसे बड़े चर्च में एक है। इसका निर्माण 1933 में किया गया था। नियो गौथिक शैली का यह चर्च अति सुन्दर एवं दर्शनीय है। इसकी 175 फुुट ऊंची मीनारें दूर से दिखायी देती हैं। इसे सेंट जोसेफ चर्च के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। 
  कृष्णा राज सागर बांध: कृष्णा राज सागर बांध शहर से उत्तर-पश्चिम दिशा में करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित है। इस बांध की लम्बाई 8600 फुट एवं ऊंचाई 130 फुट है। करीब 130 वर्ग किलोमीटर दायरे में फैला यह बांध अति दर्शनीय है। इसी के एक कोने में वृंदावन गार्डेन है। 
  मैसूर चिड़ियाघर: मैसूर चिड़ियाघर विश्व के प्राचीन चिड़ियाघरों में से एक है। इसका निर्माण 1892 में शाही संरक्षण में हुआ था। शेर, हाथी, सफेद मोर, दरियाई घोड़ा, गैंडा, गोरिल्ला आदि इत्यादि चिड़ियाघर के मुख्य आकर्षण हैंं। यहां एक जैविक उद्यान भी है।
   रेल संग्रहालय: रेेल संग्रहालय में रेलवे उपकरणों सहित प्राचीनकाल की रेेल गाड़ियों को दर्शनीयता के लिए रखा गया है। संग्रहालय में भाप से चलने वाले इंजन, सिगनल एवं 1899 में बना सभी सुविधाओं वाला महारानी का सैलून खास है। यहां का मुख्य आकर्षण चामुंडी गैलरी है। इसमें रेल के विकास क्रम को दर्शाया गया है। संग्रहालय खास तौर से बच्चों के ज्ञान को बढ़ाता है।
   मैसूर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बेंंगलुरु एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से मैसूर की दूरी करीब 139 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मैसूर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी मैसूर की यात्रा कर सकते हैं।
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शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...