Friday, 28 June 2019

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय उद्यान: आैषधीय वनस्पतियों का भण्डारण

   इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य को आैषधीय वनस्पतियों खजाना कहा जाना चाहिए। जी हां, इस राष्ट्रीय उद्यान में विलुप्त प्रजाति की आैषधीय वनस्पतियों को खास संरक्षण हासिल है। 

    इस राष्ट्रीय उद्यान को टॉपस्लिप के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। वस्तुत: इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य वन्य जीव संरक्षण क्षेत्र है। भारत के तमिलनाडु के कोयम्बटूर का यह राष्ट्रीय उद्यान बेहद रोमांचक है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो 19 वीं सदी में एक स्थानीय प्रथा से इस शानदार अभयारण्य का उदय हुआ। पोलाची, वेलपराई एवं उदुमलपेट आदि इलाके में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान अन्नामलाई पहाड़ियों का एक बड़ा हिस्सा है। करीब 958 वर्ग किलोमीटर दायरे में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान वस्तुत: प्रकृति का शानदार एवं नायाब तोहफा है।

   खास यह कि इस विहंगम राष्ट्रीय उद्यान को पूर्व में अनाईमलाई वन्य जीव अभयारण्य के नाम से जाना जाता था। इसे विधिवत वर्ष 1974 में एक भव्य-दिव्य अभयारण्य के तौर पर स्थापित किया गया। देश की पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने वर्ष 1961 में इस राष्ट्रीय उद्यान का भ्रमण किया था। 

   लिहाजा बाद में इसे इन्दिरा गांधी के नाम से जाना पहचाना जाने लगा। खास यह कि इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य पश्चिमी घाट इलाके का एक बड़ा हिस्सा है।
  खास यह कि इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य का इलाका बेहद ऊंचा-नीचा है। समुद्र तल से कहीं 340 मीटर ऊंचाई है तो कहीं ऊंचाई 2513 मीटर है। 

   खास यह कि एक दर्जन से अधिक पर्वत चोटियां इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य की शान एवं शोभा हैं। इन पर्वत चोटियों की छटा निराली एवं अद्भुत हैं। इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य में खास तौर से वन्य जीव की विभिन्न प्रजातियां संरक्षित हैं।

   बंगाल के शेर, भारतीय हाथी, एशियाई जंगली कुत्ता, शेर की पूंछ वाला मकाक आदि इत्यादि हैं। इनके अलावा गोल्डन सियार, तेंदुआ बिल्ली, जंगली बिल्ली, चीतल, काकड़, हिरन, जंगली सुअर, लंगूर, बोनट मकाक, नेवला, भारतीय साही, धारीदार पाम गिलहरी, उड़ने वाली छिपकली, गिरगिट आदि इत्यादि हैं। बाघ, शेर, चीता, हिरन, हाथी आदि विशिष्ट जीव-जन्तु इस शानदार एवं सुन्दर इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य की शान एवं शोभा हैं। 

   वर्ष 2008 में इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य के एक हिस्से को टाइगर रिजर्व के तौर पर घोषित किया गया। जिससे बाघ वंश को विधिवत संरक्षण मिल सके।
  यूं कहा जाये कि इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य वनस्पतियों एवं जीव-जन्तुओं की व्यापक विविधिता का संरक्षित केन्द्र है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   खास यह कि विलुप्त एवं प्रचलित 2000 से अधिक आैषधीय एवं सामान्य वनस्पतियां इस राष्ट्रीय उद्यान में पुष्पित एवं पल्लवित हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इनमें 400 से अधिक आैषधीय वनस्पतियां विशेष महत्व वाली हैं। 

    स्थलाकृति एवं जलवायु आैषधीय वनस्पतियों के लिए बेहद अनुकूल होने के कारण इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य का परिवेश अति दर्शनीय एवं स्वास्थ्य की गुणवत्ता वाला है। लिहाजा पर्यटक इस अभयारण्य में प्रफुल्लता का एहसास करते हैं। 

   शुद्ध जलवायु एवं भरपूर ताजगी वाली आक्सीजन पर्यटकों को एक विशेष ऊर्जा प्रदान करती है। सदाबहार वन, अर्ध सदाबहार वन, मोंटेन शोला-चारागाह, कांटेदार वन एवं दलदली क्षेत्र इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य की विशिष्टता है। 
    सदाबहार वन क्षेत्र मुख्यत: समुद्र तल से 600 मीटर ऊंचाई से लेकर 1600 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं। पर्वतीय चारागाह इस राष्ट्रीय उद्यान की विशिष्ट शोभा हैं।

    सागौन का सघन वन क्षेत्र इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य के वन क्षेत्र की शोभा को आैर भी बढ़ा देता है। बांस के प्राकृतिक वन क्षेत्र भी यहां खास हैं। इन सघन वन क्षेत्र में वन्य जीवों का कोलाहल पर्यटकों को बेहद रोमांचक प्रतीत होता है। 
  आदिवासियों का यह इलाका एक अलग ही लोक संस्कृति को बयां करता है। आदिवासियोें में कदार, मालासर, मलयमालासार, पुलैयर, मुदुवर एवं एरावलर आदि इत्यादि हैं।

   इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संंसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट कोयम्बटूर इण्टरनेशनल एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोयम्बटूर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी इन्दिरा गांधी वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा कर सकते हैं।
11.016010,76.970310

Monday, 24 June 2019

मानस राष्ट्रीय उद्यान: विश्व धरोहर

   मानस राष्ट्रीय उद्यान को जीव जन्तुओं के लिए अति संरक्षित क्षेत्र कहा जाना चाहिए। जी हां, मानस राष्ट्रीय उद्यान का प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भुत एवं विलक्षण है। 

   खास यह कि मानस राष्ट्रीय उद्यान को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है। इसे वर्ष 1985 में विश्व धरोहर घोषित किया गया था। 
  हिमालय की तलहटी में स्थित यह सुन्दर एवं शानदार अभयारण्य वैश्विक ख्याति रखता है। भारत के असम का यह वन्य जीव अभयारण्य भूटान के रॉयल मानस राष्ट्रीय उद्यान तक फैला है।

   खास यह कि बाघ एवं हाथियों के लिए संरक्षित क्षेत्र है। विशेषज्ञों की मानेें तो मानस राष्ट्रीय उद्यान दुर्लभ एवं लुप्त प्राय वन्य जीवों का संरक्षित क्षेत्र है। इनमें खास तौर से असम छत वाले कछुये, हेपीड खरगोश, सुनहरे लंगूर आदि इत्यादि हैं। गैंडा एवं बाराहसिंगा यहां खास तौर से पाये जाते हैं। 

   करीब 950 वर्ग किलोमीटर दायरे में फैला मानस राष्ट्रीय उद्यान का प्राकृतिक सौन्दर्य भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। सामान्यत: मानस राष्ट्रीय उद्यान जंगली भैंसों के लिए जाना पहचाना जाता है। इस शानदार एवं सुन्दर उद्यान का नाम मानस नदी के नाम पर रखा गया है।

   मनसा वस्तुत: सर्पों की देवी की मान्यता रखती हैं। लिहाजा नदी एवं यह राष्ट्रीय उद्यान मनसा देवी के नाम पर हैं। मानस को वन्य जीव अभयारण्य घोषित किये जाने के बाद वर्ष 1973 में मानस बायो रिजर्व की गयी थी।

   विशेषज्ञों की मानें तो वन्य जीव अभयारण्य घोषित किये जाने से पहले मानस आरक्षित सघन वन क्षेत्र था। राजसी शासनकाल में इसे राजसी शिकारगाह का दर्जा हासिल था। कूच बिहार का शाही परिवार एवं गौरीपुर का राजघराना इस शिकारगाह में शिकार करते थे।

   विशेषज्ञों की मानें तो यह उद्यान 56 से अधिक गांवों से घिरा है। इसकी पश्चिमी सीमा पनबारी से ताल्लुक रखती है। केन्द्रीय सीमा बारपेटा रोड़ को छूती है। पूर्वी सीमा पाथस्ला के निकट भुर्इंयापुर में स्थित है। इस उद्यान का विहंगम दृश्य पर्यटकों को मुग्ध करता है। मानस राष्ट्रीय उद्यान के पश्चिमी इलाके में मानस नदी प्रवाहमान है। 

  अभयारण्य क्षेत्र की यह मुख्य नदी है। पर्यटक मानस नदी में नौका विहार एंव जलक्रीड़ा का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। वस्तुत: मानस नदी ब्राह्मपुत्र की सहायक नदी है। मानस नदी वस्तुत: भारत एवं भूटान को विभाजित करते हुए एक अंतरराष्ट्रीय सीमा के तौर पर कार्य करती है।

   इस दिव्य-भव्य वन्य जीव अभयारण्य में भारतीय हाथी, एक सींग वाला गैंडा, गौरा, एशियाई जल भैंसा, बाराहसिंगा, भारतीय बाघ, भारतीय तेंदुआ, एशियाई स्वर्ण बिल्ली, टोपी वाला लंगूर, स्वर्ण लंगूर, सांभर, हिरण, चीतल, बड़ी गिलहरी आदि इत्यादि वन्य जीव इस अभयारण्य की शान एवं शोभा हैं।

   आैषधीय वनस्पतियों की प्रचुरता इस अभयारण्य को काफी कुछ खास बना देती है। आैषधीय वनस्पतियां वायु मण्डल को शुद्ध एवं ताजगी से युक्त रखती हैं। जिससे पर्यटक खुद को तरोताजा होने का एहसास करते हैं। जैव विविधिता की दृष्टि से मानस राष्ट्रीय उद्यान अति समृद्ध है। 

  विशेषज्ञों की मानें तो मानस राष्ट्रीय उद्यान जैव विविधिता में दुनिया केे अति समृद्ध उद्यानों में से एक है। इस शानदार अभयारण्य में स्तनधारी जीवों की 55 से अधिक प्रजातियां संरक्षित हैं।

   पक्षियों की 380 से अधिक प्रजातियां इस शानदार उद्यान की शोभा हैं। इनके अलावा वन्य जीवों की असंख्य प्रजातियां भी इस अभयारण्य में आश्रय पाती हैं। मानस राष्ट्रीय उद्यान का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकोंं को मुग्ध कर लेता है।

  मानस राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलाई इण्टरनेशनल एयरपोर्ट गुवाहाटी है। निकटतम रेलवे स्टेशन बारपेटा रोड जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी मानस राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
26.727630,90.995403

Thursday, 20 June 2019

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान: प्राकृतिक सौन्दर्य

   कान्हा राष्ट्रीय उद्यान को प्राकृतिक सुन्दरता की श्रेष्ठतम संरचना कहा जाना चाहिए। जी हां, भारत के इस राष्ट्रीय उद्यान का प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भुत है। 

   भारत के मध्य प्रदेश के मंडला जिला का यह शानदार राष्ट्रीय उद्यान वैश्विक ख्याति रखता है। खास यह कि मध्य प्रदेश राष्ट्रीय उद्यानों एवं सघन वन क्षेत्र के लिए प्रसिद्ध है। विशेषज्ञों की मानें तो कान्हा का आशय कनहार से है। स्थानीयता में कनहार चिकनी मिट्टी कोे कहा जाता है। 

   मान्यता है कि कान्हा सघन वन क्षेत्र के निकट एक गांव मेें सिद्ध पुरुष रहते थे। सिद्ध पुरुष का नाम कान्हा था। लिहाजा अब इस क्षेत्र को कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के नाम से जाना पहचाना जाता है। इसे बाघ, हाथी एवं भालू सहित असंख्य वन जीवों का आशियाना कहना चाहिए।

   करीब 940 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस राष्ट्रीय उद्यान में एक अति विशाल पर्वतीय क्षेत्र है। सतपुड़ा की पर्वत मालाओं से आच्छादित कान्हा राष्ट्रीय उद्यान ऊंचा-नीचा क्षेत्र है। खास यह कि इन पर्वत मालाओं की ऊंचाई समुद्र तल से कहीं 450 मीटर है तो कहीं 900 मीटर भी है।

   कान्हा को बाघ संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। कान्हा राष्ट्रीय उद्यान का आकार-प्रकार घोड़े के पैर की भांति है। बंजर एवं हेलन घाटियां कान्हा की शान एवं शोभा हैं। वर्ष 1955 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की असंख्य खूबियां रखता है।

   बाघ, हाथी एवं भालू वंश के साथ ही विलुप्त हो चुकी बाराहसिंगा की प्रजातियां यहां खास तौर से दर्शनीय हैं। कान्हा एशिया के अति सुन्दर एवं सुरम्य वन्य जीव अभयारण्य में से एक है। बाघ संरक्षण के लिए यह एक आदर्श क्षेत्र है। 

   विशेषता यह कि खुले एवं विशाल मैदान वन्य जीवन को विशेष संरक्षण प्रदान करते हैं। बाघ के अलावा काला हिरन, बारहसिंगा, सांभर, चीतल एवं बंदरों को कुलांचे भरते देखा जा सकता है। बांस एवं टीक के वृक्ष कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की शान एवं शोभा हैं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो बारहसिंगा की प्रजाति कान्हा राष्ट्रीय उद्यान को काफी कुछ खास बनाये रखती है। विशेषज्ञों की मानें तो दो दशक पहलेे बारहसिंगा की यह प्रजाति विलुप्त श्रेणी में आ गयी थी लेकिन इस विशाल अभयारण्य में बारहसिंगा को कुलांचे भरते देखा जा सकता है।

   भारत का कान्हा राष्ट्रीय उद्यान एकमात्र अभयारण्य है, जहां बारहसिंगा बहुलता में पाये जाते हैं। पर्यटक जीप सफारी की सवारी कर कान्या राष्ट्रीय उद्यान के प्राकृतिक सौन्दर्य एवं वन्य जीवन का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। बाघों को नजदीक से देखने के लिए पर्यटक कान्हा में हाथी की सवारी कर सकते हैं। 

   कान्हा राष्ट्रीय उद्यान को पक्षियों का एक विशाल घरौंदा कहा जा सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो कान्हा में पक्षियों की 300 से अधिक प्रजातियां संरक्षित हैं। सर्दियों में प्रवासी पक्षियों का भारी जमावड़ा रहता है। आशय यह कि सर्दियों में कान्हा मेहमान पक्षियों का घर बन जाता है।

   कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में सारस, छोटी बतख, पिंटेल, तालाबी बगुला, मोर-मोरनी, मुर्गा, तीतर, बटेर, कबूतर, पपीहा, उल्लू, किंगफिशर, कठफोड़वा आदि इत्यादि पक्षी हैं। बामनी दादर यहां का एक खास इलाका है। 

   बामनी दादर वस्तुत: सूर्योदय एवं सूर्यास्त का दर्शनीय स्थल है। बामनी दादर से कान्हा राष्ट्रीय उद्यान का विहंगम दृश्य दिखता है। खास यह कि कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में दुर्लभ जीव-जन्तु भी दिख जायेंगेे।
   भारतीय उदबिलाव, भारतीय पैंगोलिन आदि इत्यादि है। राजा-रानी कान्हा का एक विशेष क्षेत्र है। वस्तुत: राजा-रानी पेड़ों के दो विशाल ठूंठ हैं। जंगल में स्थित इन दो ठूंठ की नित्य पूजा अर्चना की जाती है। इनको राजा-रानी के नाम से जाना पहचाना जाता है। 
   कान्हा संग्रहालय: कान्हा संग्रहालय में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान का प्राकृतिक इतिहास उपलब्ध है। संग्रहालय से टाइगर रिजर्व का शानदार दृश्य देखा जा सकता है। वन्य जीवों की विशेषताओं का यहां सचित्र उल्लेख है।
   कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा केे सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट नागपुर एयरपोर्ट है। नागपुर एयरपोर्ट से कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की दूरी करीब 266 किलोमीटर है। निकटतम रेेलवे स्टेशन जबलपुर जंक्शन है। जबलपुर जंक्शन से कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की दूरी 175 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी कान्हा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
22.586600,80.356200

Wednesday, 19 June 2019

एलोरा गुफाएं: विलक्षण सौन्दर्य

   एलोरा गुफाओं की संरचना को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। इन गुफाओं की नक्काशी एवं पच्चीकारी पर्यटकों को मुग्ध कर लेती है। 

   एलोरा गुफाओं का यह स्मारक देश दुनिया में खास ख्याति रखता है। भारत के महाराष्ट्र के आैरंगाबाद का एलोरा गुफाओं का यह शानदार स्मारक विश्व में प्रसिद्ध है। विशिष्टताओं के कारण ही इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है।

  खास यह कि एलोरा गुफाएं भारतीय पाषाण शिल्प स्थापत्य कला का शानदार दर्शन है। विशेषज्ञों की मानें तो इसका वास्तविक नाम वेरुल है। इस पुरातात्विक स्मारक की सुन्दरता अति दर्शनीय है। 

  एलोरा गुफाओं के इस समूह में 34 शानदार एवं दर्शनीय गुफाएं हैं। इसे चरणाद्रि पर्वत का फलक क्षेत्र माना जाता है। इस शानदार संरचना में हिन्दू, बौद्ध एवं जैन मंदिर एवंं गुफाएं हैं।

   विशेषज्ञों की मानें तो एलोरा में 12 बौद्ध, 17 हिन्दू एवं 5 जैन गुफाएं संरचित हैं। यह सभी गुफाएं एक दूसरे के सन्निकट हैं। एलोरा गुफाओं की यह संरचना धार्मिक सौहाद्र्र को भी प्रदर्शित करती है। मठ एवं मंदिरों की यह श्रंखला करीब दो वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली है। 

   बेसाल्ट की खड़ी चट्टान को काट कर बनायी गयी एलोरा गुफाओं का यह समूह वैश्विक पर्यटकों की खास पसंदीदा है। दुर्गम पहाड़ियों का यह क्षेत्र भारतीय प्राचीन सभ्यता का जीवंत प्रदर्शन है।

   बौद्ध, हिन्दू एवं जैन धर्म को समर्पित एलोरा गुफाएं शिल्प देवता विश्वकर्मा को समर्पित हैं। इस संरचना का सर्वोच्च एवं श्रेष्ठ अलंकरण कैलाश मंदिर है। इसका निर्माण राष्ट्रकूट शासक ने कराया था। एलोरा गुफाओं की इस संरचना में मूर्ति शिल्प की एक शानदार श्रंखला विद्यमान है। 

  इन मूर्तियों में कहीं जोश दर्शित है तो वहीं कहीं भावनाओं का प्रवाह दिखता है। शिल्पकला एवं चित्रकला की इस शानदार संरचना की विलक्षणता पर्यटकों को मुग्ध करती है।

   बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म की तराशी मूर्तियां गुफा की शोभा एवं शान हैं। इनमें शांति एवं आध्यात्म की शानदार झलक मिलती है। पर्वत श्रंखला पर पच्चीकारी का कलात्मक अंकन पर्यटकों को लुभाता है। 
  पूजा कक्ष, मठ-विहार, हिन्दुओं के विभिन्न संस्कारों को दर्शित किया गया है। कैलाश मंदिर की नक्काशी एवं पच्चीकारी पर्यटकों को मुग्ध कर लेती है। मंदिर की कलात्मकता श्रेेष्ठतम आयाम को स्पर्श करती है।

   विशेषज्ञों की मानें तो मंदिर की प्रतिमा एक ही शिलाखण्ड पर संरचित दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा है। सीढ़ियां, दरवाजे, खिड़कियां आदि इत्यादि बहुत कुछ दर्शनीयता को बढ़ाते हैं। भगवान विष्णु की शानदार प्रतिमा कलात्मकता का एक अति सुन्दर आयाम है।


   राक्षस से देव युद्ध, मनुष्य का शेर में परिवर्तित होना बेहद सजीव प्रतीत होते हैं। नन्दी का स्मारक बेहद आकर्षक लगता है। प्रवेश द्वार एवं दिव्य-भव्य आंगन की शान एवं शोभा निराली है।
  हाथियों का झुण्ड, शेर वंश सहित अन्य वन्य जीवों की एक लम्बी श्रंखला एलोरा गुफाओें में दर्शित हैं। दीवारों पर पौराणिक कथानकों का शानदार दृश्यांकन है।

   इनमें कलात्मकता का विशेष दर्शन होता है। रावण का शक्ति प्रदर्शन पर्यटकों को रोमांचित करता है। कमल के फूलों का शानदार सृजन कलात्मकता को स्वत: बयां करता है। आभूषण की सुन्दर सजावट भी बेहतरीन है। एलोरा गुफाएं खास तौर से अपने सौन्दर्य शास्त्र से पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।

   एलोरा गुफाओं की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट आैरंगाबाद एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन आैरंगाबाद जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी एलोरा गुफाओं की यात्रा कर सकतेे हैं।
19.876165,75.343315

Tuesday, 18 June 2019

अजंता गुफाएं: आश्चर्यजनक वास्तुशिल्प

   अजंता गुफाओं का वास्तुशिल्प आश्चर्यजनक एवं अति सुन्दर कहा जाना चाहिए। वास्तुशिल्प की यह सुन्दर संरचना वस्तुत: भारत की अति समृद्ध विरासत है।

   इस अद्भुत एवं विलक्षण वास्तुशिल्प को वैश्विक स्तर पर सराहना मिलती है। भारत के महाराष्ट्र के जिला आैरंगाबाद स्थित यह भारतीय विरासत वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है। खास यह कि अजंता गुफाओं को विश्व विरासत के तौर पर मान्यता है।

  यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत का दर्जा प्रदान किया है। अजंता गुफाओं को वैश्विक विरासत का यह खिताब वर्ष 1983 में मिला। करीब 29 विशाल शिलाखण्ड को काट कर बौद्ध स्मारक गुफाओं की संरचना की गयी है। खास यह कि अजंता गुफाओं के इस शानदार स्मारक के शिल्प एवं चित्रण में बौद्ध धर्म का रेखांकन मिलता है।

   आैरंंगाबाद में यह संरचनाएं अजंता गांव के निकट स्थित हैं। अजंता गांव से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित अजंता गुफाओं में खास तौर से बौद्ध धर्म, मंदिर, देवी-देवताओं का चित्रण, हिन्दू राजाओं का शासन, आश्रय व्यवस्था आदि इत्यादि बहुत कुछ दर्शनीय है। 

  खास यह कि इन गुफाओं का आकार-प्रकार घोड़े की नाल जैसा है। गुफाओं का विहंगम दृश्य पर्यटकों को मुग्ध कर लेता है। सघन वन क्षेत्र से घिरी अजंता गुफाएं आैरंगाबाद से करीब 106 किलोमीटर दूर हैं। जलगांव से करीब 60 किलोमीटर एवं भुसावल से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित यह गुफाएं सौन्दर्य शास्त्र की अनुपम गाथा हैं। 

  खास यह कि इस शानदार घाटी की तलहटी में धारा बाघूर बहती है। विशेषज्ञों की मानें तो यहां कुल 29 गुफाएं विद्यमान हैं। अजंता गुफाओं का यह समूह वस्तुत: आवासीय मठ जैसा है।

   विशेषज्ञों की मानें तो अजंता गुफाओं की अंतिम गुफा की खोज वर्ष 1956 के आसपास की गयी थी। इस खनन में बौद्ध स्तूप एवं मठ आदि की खोज हुयी थी। आंग्ल-भारतीय की दृष्टि में अजंता गुफाएं वस्तुत: अभिव्यंजन गुफा एवं मंदिर हैं।

   अजंता एक प्रकार का महाविद्यालय मठ था। गुफाओं का नक्काशी कार्य अति दर्शनीय एवं अद्भुत है। भगवान बुद्ध अपनी धर्म-चक्र-प्रवर्तन मुद्रा में विराजमान दर्शित हैं। दीवारों के साथ एक शानदार गलियारा भी शोभा को बढ़ाता है। दर एवं दीवार नक्काशी एवं चित्रांकन से परिपूरित है। 

   महाकक्ष की प्रत्येक दीवार करीब 40 फुट लम्बी आैर 20 फुट ऊंची है। दर्शित दृश्यों में अधिकतर उपदेशों, धार्मिक अलंकरण से आच्छादित हैं। अधिसंख्य चित्रांकन जातक कथाओं एवं गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित हैं। फलकों की नक्काशी कहीं अधिक शानदार एवं सुन्दर है।

   नक्काशी की गहनता अति दर्शनीय है। अधिसंख्य मूर्तियां सजीव प्रतीत होती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे मूर्तियां अभी बोल उठेंगी। द्वार के दोनों ओर वर्गाकार खिड़कियां अति शोभायमान हैं। 

   खास यह कि बौद्ध धर्म एवं आस्था का प्रवाह इन अजंता गुफाओं मेें दर्शित है। विशेषज्ञों की मानें तो अजंता गुफाओं की यह संरचना शिक्षक एवं छात्र समूह की सक्रियता को दर्शाता है।

   माना जाता है कि वाकाटक राजा हरिसेना इस उत्तम संरचना अर्थात अजंता गुफा के संरक्षक रहे थे। अजंता गुफाओं का वास्तुशिल्प एवं संरचना अति शानदार एवं सुन्दर है। लिहाजा इन संरचनाओं को वैश्विक ख्याति है। खास यह कि अजंता गुफाओं का यह समूह वैश्विक पर्यटकों का बेहद पसंदीदा है।


   अजंता गुफाओं की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट आैरंगाबाद एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन आैरंगाबाद जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी अजंता गुफाओं की यात्रा कर सकते हैं।
20.552450,75.699531

शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...