Thursday, 30 August 2018

लाल किला: बेहतरीन वास्तुशिल्प

    लाल किला को देश का ऐतिहासिक किला कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। दिल्ली स्थित लाल किला कभी मुगल सल्तनत का केन्द्र रहा।

   विशेषज्ञों की मानें तो लाल किला वर्ष 1856 तक करीब दो सौ वर्ष तक मुगल शासकों का मुख्य निवास रहा। यंू कहें कि मुगल राजनीतिक केन्द्र रहा तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। लाल बलुआ पत्थरों का यह शानदार-जानदार स्मारक देश दुनिया में खास ख्याति रखता है। लाल किला के आंतरिक क्षेत्र में बाजार-हाट से लेकर रिहायश की शानदार संरचनाएं आकर्षित करती हैं।
    शाही अपार्टमेंट या मण्डपम की सुन्दर श्रंखला में जलधारा का शीतल प्रवाह वास्तु विलक्षणता को रेखांकित करता है। मुगलकाल की इस विलक्षण धरोहर का वास्तुशिल्प भी अति सुन्दर एवं प्रभावकारी है।
   वास्तुशिल्प में तिमुरीद एवं फारसी परम्पराओं का निर्वहन दिखता है। लाल किला की अभिनव वास्तुकला भवनों से लेकर बाग बगीचों में भी दिखती है। लाल बलुआ पत्थरों के साथ ही यहां संगमरमर की संरचनाएं आकर्षित करती हैं।

   विशिष्टताओं के कारण यूनेस्को ने लाल किला को विश्व विरासत स्थल घोषित किया है। चूंकि लाल किला का उपयोग मुगल शासक निवास के तौर पर होता था लिहाजा इसे धन्य किला भी कहा जाता था। आशय यह कि किला-ए-मुबारक है। मुगल शासक शाहजहां ने लाल किला का निर्माण 1639 में 12 मई को प्रारम्भ कराया था। 

   मुगल साम्राज्य की राजधानी आगरा से दिल्ली करने  के मकसद से लाल किला का निर्माण किया गया था। लाल किला के वास्तुशिल्पी वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी थे। करीब दस वर्ष की लम्बी अवधि के बाद 6 अप्रैल 1648 को लाल किला का निर्माण पूर्ण हो सका। इसका सौन्दर्य शास्त्र विलक्षण एवं आकर्षक है। खास यह कि विशिष्टताओं के कारण लाल किला अब देश का मुख्य पर्यटन स्थल बन चुका है।

   सांझ को लाल किला परिसर के अंदर मुगल साम्राज्य को रेखांकित करता एक लाइट एण्ड साउण्ड शो प्रसारित होता है। यह शो जानकारी आधारित होता है। करीब 254.67 एकड़ क्षेत्रफल में फैले लाल किला की सुरक्षात्मक दीवारों का एक लम्बा घेरा भी है। लाल किला की संरचना अष्टकोणीय है। मुगल वास्तुकला का नायाब उदाहरण लाल किला अपनी आगोश में कई ऐतिहासिक घटनाओें को समेटे है। 

   राष्ट्रीय महत्व के इस स्मारक को संरक्षित करने के प्रयास 1913 से प्रारम्भ हुये। लाल किला को रेखांकित करने की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। मसलन लाहौरी गेट, दिल्ली गेट, छती चौक, नौबत खाना, दीवान-ए-आम, नहर-ए-बिहिश, मुमताज महल, रंग महल आदि इत्यादि हैं।
    लाहौरी गेट : लाहौरी गेट लाल बलुआ पत्थर से बना लाल किला का मुख्य प्रवेश द्वार है। यह प्रवेश द्वार लाहौर शहर की ओर होने के कारण लाहौरी गेट के नाम से जाना गया। 
   दिल्ली गेट: दिल्ली गेट लाल किला का दक्षिणी इलाके का सार्वजनिक प्रवेश द्वार है। प्रवेश द्वार पर हाथी की सजावट की गयी है। भव्य दिव्य यह गेट बेहद आकर्षक है।
   छती चौक : छती चौक लाहौरी गेट के निकट स्थित है। छती चौक शाही मुगल के लिए था। इस स्थान पर शाही परिवार को खरीद-फरोख्त की सहूलियतें हासिल होती थीं। मसलन रेशम, आभूषण एवं अन्य सामान उपलब्ध होता था।

    नौबत खाना: नौबत खाना को नक्कारखाना भी कहा जाता था। यहां गीत-संगीत की महफिल होती थीं।
   दीवान-ए-आम : दीवान-ए-आम एक वृहद आकार का हाल है। मुगल शासक यहां जनता-आवाम का दुख दर्द सुनते थे। यहां उत्कीर्ण मेहराब एवं शिल्प कौशल दिखता है। इसके ठीक पीछे शाही आवास हैं।
    नहर-ए-विहिश : नहर-ए-विहिश वस्तुत: एक श्रंखला है। इसे स्वर्ग का प्रवाह भी कहा जाता है। शाही बुर्ज से पानी खींचने के साथ ही इसका प्रवाह मण्डपों के मध्य से होकर गुजरता है।
मुमताज महल: मुमताज महल बेगम का आवास रहा करता था। इसको बड़ा रंग महल भी कहा जाता है। मुमताज महल में लाल किला का पुरातात्विक संग्रहालय भी है।
    रंग महल: रंग महल खास तौर से मुगल शासक सम्राट की बेगम एवं मालकिनों की रिहायश था। इसको खास तौर से सजावटी एवं चित्रित किया गया था। इसमे चमकीले मुजैक का उपयोग किया गया है।
    खास महल: खास महल सम्राट का रिहायशी भवन था। यह एक अष्टकोणीय टावर जैसा है। खास महल से यमुना नदी का सुन्दर दृश्य दिखता था।
   दीवान-ए-खास: दीवान-ए-खास का उपयोग मुगल सम्राट खास सिपहसालारों, मंत्रियों एवं विशिष्टजनों से मुलाकात के लिए करते थे। संगमरमर पत्थर का चमकदार यह स्थान अति सुन्दर प्रतीत होता है। इसमें बेशकीमती पत्थरों का उपयोग भी किया गया है। इसे धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है। इनके अलावा भी लाल किला में सुन्दर स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है।
    लाल किला की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी इन्टरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली है। निकटतम रेलवे स्टेशन दिल्ली जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी लाल किला के लिए यात्रा कर सकते हैं।
28.656158,77.241020

Friday, 24 August 2018

हुमायूं का मकबरा: शानदार वास्तुशिल्प

   हुमायूं का मकबरा को वास्तुशिल्प एवं स्थापत्य शैली का शानदार आयाम कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

  जी हां, दिल्ली स्थित हुमायूं का मकबरा की सुन्दरता का कहीं कोई जोड़ नहीं। यह मुगल वास्तुकला एवं स्थापत्य कला की एक सयंुक्त संरचना है। खास यह कि हुमायूं का मकबरा देश का पहला शाही मकबरा है। करीब 21.60 हेक्टेयर में फैले मकबरा की सुन्दरता देखते ही बनती है। 

   इसमें 16 वीं सदी के मुगल उद्यान के गुम्बदों की शानदार श्रंखला है। हुमायूं का मकबरा शहंशाह अकबर के संरक्षण में 1560 के दशक में बना था। नई दिल्ली के दीनापनाह अर्थात पुराने किला के निकट निजामुद्दीन पूर्व क्षेत्र में स्थित है। इस परिसर में मुख्य इमारत हुमायूं का मकबरा है। साथ ही परिसर में हुमायूं सहित कई मुगल शासकों की कब्रगाह हैं।

    विलक्षण वास्तुशिल्प एवं स्थापत्य शैली के कारण इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है। विशेषज्ञों की मानें तो भारत में मुगल वास्तुकला की पहली संरचना है। इस मकबरा में चारबाग शैली को अपनाया गया। जिसको आधार बना कर ताजमहल का निर्माण किया गया था।
   हुमायूं का यह मकबरा उनकी विधवा बेगम हमीदा बानो बेगम की इच्छा पर 1560 में बनाया गया था। इसके वास्तुकार इब्न मुबारक मिराक घियाथुद्दीन एवं उनके पिता मिराक घुइयाथुद्दीन थे। इन वास्तुशिल्पियों को अफगानिस्तान से बुलाया गया था। इस भव्य दिव्य इमारत को बनाने में करीब 8 वर्षों का समय लगा था। 

   खास यह कि चारबाग शैली का यह पहला उदाहरण बना। लाल बलुआ पत्थरों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया। मकबरा में हुमायूं की कब्रगाह के बगल में बेगम हमीदा की कब्र है। इसके अलावा मकबरा में कई अन्य मुगल शासकों की कब्रगाह हैं। 

   मकबरा के लिए इस स्थान का चयन यमुना नदी के किनारे हजरत निजामुद्दीन की दरगाह से निकटता को ध्यान में रख कर किया गया था। निजामुद्दीन दिल्ली प्रसिद्ध सूफी संत थे। मुगल शासक निजामुद्दीन का काफी सम्मान करते थे।
   हुमायूं का मकबरा स्थापत्य शैली का अद्भुत उदाहरण है। स्थापत्य शैली की विलक्षणता एक नजर में ही यहां देखी जा सकती है। इस विशाल इमारत में करीब 16 मीटर ऊंचे दो मंजिला प्रवेश द्वार बने हैं। यह दक्षिण एवं पश्चिम में हैं। मुख्य इमारत में सितारे के समान एक छह किनारों वाला सितारा प्रवेश द्वार है।

   मकबरा का निर्माण मुख्य तौर पर गारा-चूना जोड़ कर किया गया है। इसके उपर पच्चीकारी, फर्श की सतह, झरोखों की जालियों, द्वार चौखट एवं झज्जों में श्वेत संगमरमर का उपयोग किया गया है। मकबरा करीब 8 मीटर ऊचे मूल चबूतरा पर खड़ा है।
   मकबरा में फारसी वास्तुकला का भी उपयोग दिखता है। आंतरिक बनावट में केन्द्रीय कक्ष सहित नौ कक्ष हैं। मुगल उद्यान चारबाग शैली में बने हैं। चारबाग शैली पर आधारित यह उद्यान दक्षिण एशिया के अपनी प्रकार का विशिष्ट उद्यान हैं। विशिष्टता के कारण हुमायूं का मकबरा पर्यटकों के बीच खास आकर्षण का केन्द्र रहता है। 
     इस मकबरा में सौ से अधिक कब्र हैं। अधिकांश कब्र पर नाम अंकित न होने से पहचान मुश्किल होने लगी है। इतना तो सुनिश्चित है कि यह सभी कब्र मुगल साम्राज्य के राज परिवार एवं उनके दरबारियों से ताल्लुक रखती हैं। मकबरा परिसर में चारबाग के अंदर दक्षिण-पूर्व दिशा में 1590 का बना नाई का गुम्बद भी खास है। यह शाही नाई हुआ करता था।
    हुमायूं के मकबरे की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते है।
28.592240,77.242670

Monday, 20 August 2018

जल महल : विलक्षण वास्तुशास्त्र

   जल महल को वास्तुशास्त्र का विलक्षण आयाम कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थित जल महल की सुन्दरता भी नायाब है।

  मान सागर झील के मध्य स्थित जल महल की ख्याति देश दुनिया में है। अरावली पर्वत श्रंखला के मध्य स्थित यह महल शान-ओ-शौकत का एक सुन्दर नगीना है। झील के मध्य में स्थित होने के कारण इसे आई बॉल भी कहा जाता है। दो मंजिला इस महल में सुन्दरता का हर आईना मौजूद है।

    शायद इसी लिए इसे रोमांटिक महल भी कहा जाता है। राजा जय सिंह के शासनकाल में निर्मित यह महल मध्यकालीन महलों की तरह है। इसमें खास तौर से सुन्दर मेहराब, नक्काशीदार बुर्ज, आकर्षक छतरियां एवं आलीशान सीढ़ियां हैं। सुन्दरता का एक आयाम यह भी है कि जल महल के निर्माण में राजपूताना शैली के साथ ही मुगल शैली की खासी झलक मिलती है। 

    जल महल को सुरम्य बनाने के लिए सुन्दर बगीचा भी बनाया गया था। खास यह कि जल महल के इस बगीचे में एक लाख से अधिक वृक्ष हैं। राजस्थान के सर्वाधिक ऊंचाई वाले वृक्ष यहां पाये जाते हैं। 
   लिहाजा जल महल क्षेत्र अब पक्षी अभ्यारण का स्वरूप भी ले रहा है। पक्षी अभ्यारण में विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों का कोलाहल-कलरव रहता है। विशेषज्ञों की मानें तो राजा जय सिंह ने इस शानदार एवं विलक्षण महल का निर्माण खास प्रयोजन से कराया था।

   जयपुर-आमेर मार्ग पर स्थित मान सागर झील के मध्य इस जल महल का निर्माण स्नान के खास मकसद से कराया गया था। राजा जय सिंह ने अश्वमेध यज्ञ के बाद अपनी रानियों एवं पंड़ितों के स्नान के लिए बनवाया था। जल महल के निर्माण से पहले राजा जय सिंह ने जयपुर की जलापूर्ति के लिए गर्भावती नदी पर बांध बनवा कर मान सागर झील का निर्माण कराया था। 

    इसका निर्माण वस्तुत: 1799 में कराया गया था। राजपूत शैली में संरचित इस जल महल का निर्माण नौकाओं के सहयोग से किया गया था। राजा जय सिंह अपनी रानी के साथ जल महल में खास वक्त बिताया करते थे।
    जल महल का उपयोग खास उत्सव के आयोजन के लिए भी करते थे। खास यह कि जल महल तपते रेगिस्तान में भी शीतलता प्रदान करता है। कारण जल महल का एक बड़ा हिस्सा पानी के अंदर बना है। 

   जल महल से पहाड़ एवं झील का अति खूबसूरत नजारा दिखता है। चांदनी रात में झील का पानी एवं जल महल का सुन्दर नजारा दिखता है। खास यह कि जल महल के रास्तों को भी अति सुन्दर तौर तरीके से सजाया गया है। 
   निकट ही चमेली बाग है। चमेली बाग की सुगंध दिल-दिमाग को तरोताजा कर देती है। मान सरोवर के आगे विशाल पर्वत श्रंखला देखने को मिलती है। सरोवर के शीर्ष पर ऐतिहासिक किले एवं मंदिर हैं। शीर्ष से जल महल की दिव्यता-भव्यता का अंदाज कुछ अलग ही दिखता है। जल महल की दिव्यता-भव्यता को ध्यान में रख कर इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। खास यह कि जल महल की यात्रा करने का सबसे उत्तम समय सितम्बर के बाद होता है।
   जयपुर स्थित जल महल की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जयपुर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जयपुर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
26.956620,75.842470

Friday, 10 August 2018

कुतुब मीनार : विलक्षण वास्तुशिल्प

   इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। जी हां, दिल्ली की कुतुब मीनार का निर्माण भी इच्छाशक्ति से ही हुआ। 

    इच्छाशक्ति ने कुतुब मीनार को विश्व की सबसे ऊंची मीनार के तौर पर खड़ा कर दिया। कुतुब मीनार को अफगानिस्तान के जाम की मीनार को चुनौती देते हुये बनाया गया। दिल्ली के महरौली इलाका स्थित कुतुब मीनार दुनिया की श्रेष्ठतम शिखर वाली र्इंट से बनी मीनार है। 

    दक्षिणी दिल्ली के महरौली स्थित कुतुब मीनार एक सुन्दर आयाम है। भारतीय वास्तुशिल्प एवं कला का अनुपम आयाम कुतुब मीनार की ख्याति दुनिया में है। इसकी ऊंचाई 72.5 मीटर एवं चौड़ाई 14.3 मीटर है। यह 14.3 मीटर की चौड़ाई शिखर तक जाकर 2.75 मीटर में सिमट जाती है। यह मीनार एक भव्य-दिव्य आकार के अहाते में स्थित है। 

    यूनेस्को ने कुतुब मीनार को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है। इस अट्टालिका की सुन्दरता एवं उत्कृष्टता देखने दुनिया भर के पर्यटक आते हैं। दिल्ली के प्रथम मुगल शासक कुतबुद्दीन ऐबक ने कुतुब मीनार का निर्माण 1193 में आरम्भ किया था। हालांकि वह इस अट्टालिका का आधार ही बनवा पाये थे। बाद में उनके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसकी तीन मंजिल को विस्तार दिया। बाद में 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने मीनार का निर्माण पूरा कराया था। यह मीनार पांच मंजिला है। 

   खास यह कि प्रत्येक मंजिल पर एक बालकनी है। निर्माण के समय के साथ इसके बदलाव भी हुये। पहली तीन मंजिल लाल बलुआ पत्थर से बनी हैं। इसके बाद चौथी एवं पांचवी मंजिल मार्बल एवं बलुआ पत्थरों से बनी हैं। ऐबक से तुगलक तक के शासनकाल का बदलाव कुतुब मीनार के स्थापत्यकला एवं वास्तुशिल्प में दिखता है। मीनार का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। मीनार में कुरान की आयतों, फूलों एवं बेलों का महीन नक्काशी से अंकन है। 

   कुतुब मीनार का इलाका पुरातन दिल्ली क्षेत्र कहलाता है। इस मीनार के निकट ही भारत की पहली क्वातुल इस्लाम मस्जिद है। बताते हैं कि इसका निर्माण 27 हिन्दू मंदिरों को तोड़ कर किया गया था। इस मस्जिद परिसर में 7 मीटर ऊंचा लौह स्तम्भ है। दिल्ली अंतिम हिन्दू राजाओं तोमर एवं चौहानों की राजधानी थी।
   देश का यह विश्व प्रसिद्ध बेहतरीन स्मारक है। खास तौर से इस स्मारक में 379 सीढ़ियां हैं। कुतुब मीनार का डिजाइन ऐसा किया गया है जिससे हर मंजिल खास अंदाज में दिखे। बलुआ पत्थरों के खम्भों पर गोलाकार खास नक्काशी की गयी है। दूसरी मंजिल पर गोल नक्काशी की गयी है। मीनार परिसर को सुसज्जित किया गया है।
    महरौली स्थित कुतुब मीनार की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी इण्टरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली है। निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली है। सड़क मार्ग से भी पर्यटक यात्रा कर सकते हैं।
28.524427,77.185455

Sunday, 5 August 2018

फतेहपुर सिकरी : सुन्दर वास्तुकला

   फतेहपुर सिकरी को वास्तुशिल्प का विलक्षण अलंकरण कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। उत्तर प्रदेश के आगरा शहर के निकट स्थित फतेहपुर सिकरी मुगल शासकों का एक सुन्दर एवं विहंगम आयाम है।

   मुगल शासक अकबर ने इस शानदार-जानदार शहर फतेहपुर सिकरी को मुगल साम्राज्य की राजधानी के तौर पर विकसित एवं स्थापित किया था। मुगल शासक अकबर ने एक अभियान के बाद फतेहपुर सिकरी को छोड़ दिया था। इतना ही नहीं फतेहपुर सिकरी भारतीय संस्कृति एवं धार्मिकता को भी रेखांकित करती है। विशेषज्ञों की मानें तो फतेहपुर सिकरी की स्थापना 1571 में हुयी थी। इसका नाम सिकरी गांव के आधार पर रखा गया था।

    फतेहपुर सिकरी को विजय का शहर के नाम से भी जाना-पहचाना जाता है। खास यह कि फतेहपुर सिकरी में आलीशान आवास एवं बाजार सहित बहुत कुछ विलक्षण है। इसकी वास्तुकला अद्भुत एवं विलक्षण है। करीब 1.90 किलोमीटर लम्बा एवं 1 किलोमीटर चौड़ाई वाला फतेहपुर सिकरी अपनी सुन्दरता के लिए देश विदेश में खास तौर से जाना जाता है। यह चौतरफा ऊंची दीवारों से घिरा इलाका है। 

   बाग-बगीचों एवं सुन्दर जलाशयों से युक्त फतेहपुर सिकरी मुगल शासकों का अति पसंदीदा स्थल था। फतेहपुर सिकरी का निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से किया गया है। फतेहपुर सिकरी में दरवाजों की एक लम्बी श्रंखला है। इन दरवाजों को दिल्ली गेट, लाल गेट, आगरा गेट, बीरबल गेट, चंदनपाल गेट, ग्वालियर गेट, तेहर गेट, चोर गेट, अजमेरी गेट आदि हैं। रानी जोधा के लिए ग्रीष्मकालीन एवं सर्दी के लिए अलग अलग महल थे। बुलंद दरवाजा को फतेहपुर सिकरी की शान माना जाता है। 
   बुलंद दरवाजा : बुलंद दरवाजा मंडली मस्जिद के दक्षिणी इलाका में स्थित है। खास यह कि बुलंद दरवाजा बाहर से करीब 180 फुट ऊंचा है। यहां के शिलालेख शांति का संदेश देते हैं।
    जामा मस्जिद : जामा मस्जिद फतेहपुर सिकरी के निर्माण अवधि की शायद पहली इमारत है। इसका आंगन बुलंद दरवाजा से ताल्लुक रखता है। गुम्बद एवं मेहराब आदि अति दर्शनीय हैं। 
   सलीम चिश्ती का मकबरा : सलीम चिश्ती का मकबरा बेहद दर्शनीय है। सफेद संगमरमर से बना मकबरा एक मंजिला है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे किसी संत की कब्रागाह हो। नक्काशीदार जाली एवं डिजाइन मुग्ध कर देती है। मकबरा के बायीं ओर शेख बदरुद्दीन चिश्ती के पुत्र इस्लाम खान का मकबरा है। यह लाल बलुआ पत्थरों से बना है।
   दीवान-ए-आम : दीवान-ए-आम एक खास इमारत है। मुगल शासक इस दीवान-ए-आम में बैठ कर आम जनता की शिकायतों एवं दुख दर्द को सुनते थे। यहीं से निदान भी किया जाता था। यह एक बड़ा एवं खुला आकार का मण्डप वाला स्थान है। यह एक आयातकार संरचना है। 
    दीवान-ए-खास : दीवान-ए-खास मुगल शासकों का परामर्श केन्द्र था। शासक इस स्थान पर खास व्यक्तित्वों से मुलाकात करते थे। यह एक चार छतरियों वाली एक साधारण इमारत है। फूलों की डिजाइन वाले नक्काशीदार खम्भों की सुन्दरता देखते ही बनती है। दीवान-ए-खास में मुगल शासक अकबर के लिए खास आसन बनाया गया था। यह आसन गोलाकार मंच की भांति है।
    इबादत खान : इबादत खान वस्तुत एक पूजा घर है। इसका निर्माण 1575 में किया गया था।
अनुप तालाओ : अनुप तालाओ का निर्माण राजा अनूप सिंह सिकरवार ने कराया था। यह एक केन्द्रीय मंच सजावटी स्थान है। इसमें एक शानदार पूल एवं चार पुलों का निर्माण है। यह स्थान शाही एंक्लेव की कुुछ इमारतों में से एक है। इसे सपनों का घर भी कहा जाता है। इस इलाका में अकबर का निवास, पंच महल, आंख मिचौली एवं ज्योतिषी कोर्ट आदि बहुत कुछ है।
   नौबतखाना : नौबतखाना को सूचना घर के तौर पर जाना जाता है। इसका आशय ड्रम हाउस के तौर पर है। इस स्थान का उपयोग मुगल शासक के आगमन की सूचना देने के लिए किया जाता था। यह शाही प्रवेश द्वार के निकट है।
    बीरबल हाउस : बीरबल हाउस शासक अकबर के पसंदीदा हिन्दू मंत्री का आवास था। अकबर का यह मंत्री उनका खास एवं पसंदीदा था। यह शानदार इमारत का डिजाइन अति दर्शनीय है।
हिरण मीनार : हिरण मीनार एक गोलाकार टावर है। यह हाथी के आकार प्रकार का बना है। लिहाजा इसे हाथी टावर भी कहा जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो यह स्थान मुगल शासक अकबर के पसंदीदा स्थलों में से एक था।
    फतेहपुर सिकरी की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। फतेहपुर सिकरी की दूरी आगरा से करीब 39 किलोमीटर है। निकटतम एयरपोर्ट आगरा है। एयरपोर्ट को खेरिया के नाम से जाना पहचाना जाता है। एयरपोर्ट से फतेहपुर सिकरी की दूरी करीब 40 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन फतेहपुर सिकरी है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी फतेहपुर सिकरी की यात्रा कर सकते हैं।
27.094529,77.667929

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