Monday, 17 June 2019

सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान: सुन्दर एवं विलक्षण

   सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान को वन्य जीवोंं का शानदार आशियाना कहा जाना चाहिए। जी हां, खास तौर से विलुप्त वन्य जीवों का यह संरक्षण क्षेत्र है। 

  भारत के राजस्थान के अलवर जिला स्थित सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान का प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भुत एवं विलक्षण है। अरावली पर्वत माला के मध्य स्थित सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान भारत के चुनिंदा एवं प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। 

   करीब 866 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस राष्ट्रीय उद्यान की विधिवत स्थापना वर्ष 1955 में की गयी थी। सरिस्का अलवर राज परिवार का यह शिकारगाह था। लिहाजा कभी इसे राजसी शिकारगाह के तौर पर जाना पहचाना जाता था।

   अलवर के महाराजा ने सरिस्का में एक भव्य-दिव्य राजमहल का निर्माण कराया था। इस शानदार अभयारण्य के मध्य में स्थित राजमहल बेहद रोमांचक प्रतीत होता है। 

  हालांकि अब इसे शानदार होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। इस होटल में रह कर पर्यटक वन्य जीवों की रोमांचक अनुभूति कर सकते हैं। इस शानदार राजमहल के सामने विशाल जलाशय हैं। 

  इस जलाशय में वन्य जीवों की अठखेलियां पर्यटकों को खास तौर से रोमांचित करती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1955 में इसे वन्य जीव आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था। 

   वन्य जीवन की विविधिता एवं महत्व को देखते हुए सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान को वर्ष 1978 में बाघ परियोजना अभयारण्य घोषित किया गया। जयपुर से करीब 107 किलोमीटर दूर एवं दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर दूर स्थित सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान अति दर्शनीय एवं रोमांचक है।

   वस्तुत: इसे सरिस्का बाघ अभयारण्य कहा जाना चाहिए। हालांकि इस शानदार अभयारण्य में बाघ के अलावा चीता, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, कैरकल, धारीदार बिज्जू, सियार स्वर्ण, चीतल, सांभर, नीलगाय, चिंकारा, चार सींग वाला मृग, जंगली सुअर, जंगली भैंसा, खरगोश एवं लंगूर आदि इत्यादि सहित अंसख्य वन्य जीव प्रजातियां इस अभयारण्य में पर्यटकों को रोमांचित करती हैं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 2008 में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान में बाघ पुर्नवास कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। इसके बाघ वंश में काफी तेजी से वृद्धि हुई। बंजर एवं रेगिस्तान की मिली जुली भूमि वाला यह शानदार अभयारण्य वन्य जीवों के किसी स्वर्ग से कम नहीं है। 

   आैषधीय वनस्पतियों एवंं पर्यावरणीय वृक्ष श्रंखला से समृद्ध यह उद्यान विभिन्न आकार एवं प्रकार के वन्य जीवों को संरक्षण देता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस विशाल उद्यान में कई मंदिर एवं पौराणिक स्थल भी विद्यमान हैं।

   हालांकि अब इनके अवशेष ही दिखते हैं। इस प्रकार इसे धरोहर का क्षेत्र भी कह सकते हैं। ऐतिहासिक कनकवाड़ी किला भी सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान में ही स्थित है। फोटोग्राफर्स के लिए सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान धरती पर स्वर्ग के समान है।

   विशेषज्ञों की मानें तो 1982 में इसे नेशनल पार्क का दर्जा दिया गया था। पर्यटक सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान में जंगल सफारी का भी भरपूर आनन्द ले सकते हैं। 
   पर्यटकों को खास तौर से सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा अक्टूबर से मार्च की अवधि में करना चाहिए। इस दौरान वन्य जीवों एवं पक्षियों की दर्शनीयता बेेहतरीन रहती है।

   सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैंं। निकटतम एयरपोर्ट सांगानेर एयरपोर्ट जयपुर है। निकटतम रेलवे स्टेशन अलवर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
27.367500,76.400700

Sunday, 16 June 2019

बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान: वन्य जीवन का स्वर्ग

   बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान के प्राकृतिक सौन्दर्य को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। प्रकृति प्रेमियों के लिए इसे बेहद रोमांचक एवं धरती का स्वर्ग माना जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान वस्तुत: वन्य जीवन के रोमांच के लिए प्रसिद्ध है। पशु-पक्षी प्रेमियों के लिए यह किसी स्वर्ग से कम नहीं। भारत के कर्नाटक राज्य के जिला चामराजनगर का यह शानदार एवं सुन्दर अभयारण्य वैश्विक ख्याति रखता है।

   विशेषज्ञों की मानेें तो बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान वन्य जीवन की विलुप्त प्रजातियों का संरक्षण क्षेत्र है। वर्ष 1973 में इसे टाइगर रिजर्व के तौर पर स्थापित किया गया था। विशेषज्ञों की मानें तो एक समय यह मैसूर के महाराजा की आरक्षित शिकारगाह था। 

   मैसूर के महाराजा ने वर्ष 1931 में 90 वर्ग किलोमीटर दायरे में फैले इलाके को वन्य जीव अभयारण्य बनाया था। इसका नाम वेणुगोपाल वन्य जीव पार्क रखा गया था। 

  वर्ष 1973 में टाइगर प्रोजेक्ट के तहत इसे वेणुगोपाल वन्य जीव पार्क में करीब 800 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र जोड़ा गया था। करीब 874 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला वन्य जीव अभयारण्य मैसूर से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित है।

   खास यह कि इसे दक्षिण भारत का सबसे बड़ा संरक्षित वन्य जीव अभयारण्य माना जाता है। इस सम्पूर्ण अभयारण्य को नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व कहा जाता है। 

  आैषधीय वनस्पतियों की प्रचुरता वाला बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद ऊर्जावान माना जाता है। 

   विशेषज्ञों की विलुप्त एवं दुर्लभ आैषधीय वनस्पतियां भी इस अभयारण्य में संरक्षित एवं पुष्पित-पल्लवित हैं। पर्यटक बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान वन्य जीवन के रोमांच का एहसास करते हैं तो वहीं अति ऊर्जा के संचार का भी अनुभव करते हैं।

  खास तौर से देखें तो हाथियों एवं बाघ वंश की प्रमुखता इस शानदार अभयारण्य की विशिष्टता है। 

  इसे भारतीय हाथियों का घर कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   हाथियों के अलावा बाघ, तेंदुआ, भालू, सांभर, ढोल, गौर, चीतल, कांकड़, मूषक मृग आदि इत्यादि इस अभयारण्य की शोभा एवं शान हैं। खास यह कि पक्षियों की यहां 200 से अधिक प्रजातियां प्रवास करती हैं।

   बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बेंगलुरु इण्टरनेशनल एयरपोर्ट है। 

   बेंगलुरू इण्टरनेशनल एयरपोर्ट से बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान की दूरी 215 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मैसूर जंक्शन है। पर्यटक सड़़क मार्ग से भी बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
12.802760,77.577160

Monday, 10 June 2019

रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान : वन्य जीवन का रोमांच

  रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान को वन्य जीवों की अद्भुत दुनिया कहा जाना चाहिए। इसे बाघों का आशियाना भी कहा जा सकता है। 

   जलीय पक्षियोंं की तीन सौ से अधिक प्रजातियां रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान की विशिष्टता को काफी कुछ अलग बना देती हैं। भारत के राजस्थान के दक्षिणी जिला सवाई माधोपुर के इस दिव्य-भव्य एवं विशाल अभयारण्य में आैषधीय वनस्पतियों का विशेष भण्डारण है।

   रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान उत्तर भारत के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। खास यह कि वर्ष 1973 में इस विशाल अभयारण्य को रणथम्भोर टाइगर रिजर्व के तौर पर घोषित किया गया है। करीब 1113.364 वर्ग किलोमीटर दायरे में फैला रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए खास प्रसिद्ध है। 

  रणथम्भोर टाइगर रिजर्र्व घोषित होने के बाद वर्ष 1980 में इसका एक बड़ा हिस्सा करीब 392 वर्ग किलोमीटर राष्ट्रीय उद्यान के रूप में घोषित किया गया।

   खास यह कि रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान मानसिंह अभयारण्य एवं कैला देवी अभयारण्य से घिरा हुआ है। खास यह कि रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान आैषधीय वनस्पतियोें की अति समृद्धता रखता है तो वहीं बाघों की वंश परम्परा भी अति समृद्धशाली दिखती है। 

  रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान की वनस्पतियों की समृद्धता का सहज अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यहां आैषधीय पौधों की 300 से अधिक प्रजातियां पुष्पित एवं पल्लवित हैं। वनस्पतियों एवं फूलों की सुगंध से रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान का वातावरण महकता रहता है। 

   पर्यटक जीप सफारी की सवारी कर रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान के रोमांचक सफर का एहसास कर सकते हैं। बाघ चूंकि एकांत प्रिय होता है। लिहाजा सघन वन क्षेत्र में बाघ को आसानी से देेखा जा सकता है। खास यह कि रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान एक आभासी द्वीप की भांति एहसास कराता है। 

   बाघ के अलावा रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान में वन्य जीवों की एक लम्बी श्रंखला पर्यटकों को रोमांचक एहसास कराती है। इनमें खास तौर से तेंदुआ, भालू, लकडबग्गा, जंगली बिल्ली, मछली पकड़ने वाली बिल्ली, कैराकल, लोमड़ी, मगरमच्छ, सांभर, हिरन, नीलगाय, चिंकारा एवं जेब्राा आदि इत्यादि हैं।

  खास यह कि प्रकृति प्रेमियों के लिए रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान किसी स्वर्ग से कम नहीं है। खास तौर से फोटोग्राफर्स के लिए तो अद्भुत एवं विलक्षण है। जिससे शाही वन्य जीवों को फोटोग्राफर्स कैमरे में कैद कर सकें। 

   जीप सफारी से पर्यटक सघन वन क्षेत्र, वनस्पतियों से आच्छादित वन क्षेत्र, मखमली घास के खुले एवं विशाल मैदानों एवं स्मारक अवशेष का भी पर्यटक आनन्द ले सकते हैं।

   खास तौर से पर्यटक रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान में रॉयल बंगाल टाइगर की शानदार झलक पा सकते हैं। निश्चय ही रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर पर्यटक रोमांचक एहसास का अनुभव बनाये रख सकते हैं। 

   बाघ शावकों का खिलंदड़पन पर्यटकों को बरबस आकर्षित करता है। शावकों का बाघिन के पीछे-पीछे जाना बेहद आकर्षक प्रतीत होता है। झीलों-झरनों में तैरना बाघ वंश का खास शौक होता है।
  लिहाजा बाघों को जलक्रीड़ा करते भी पर्यटक देख सकते हैं। आशय यह कि रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान पर्यटकों को एक रोमांचक एहसास कराता है।

   रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सांगानेर एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन सवाई माधोपुर जंक्शन है। पर्यटक सड़़क मार्ग से भी रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
26.016540,76.363150

Sunday, 9 June 2019

गिर वन्य जीव अभयारण्य : एशियाई शेरों के दर्शन

   गिर वन्य जीव अभयारण्य को एशियाई शेरों का एकमात्र ठिकाना कहा जाना चाहिए। जी हां, गिर वन्य जीव अभयारण्य अद्भुत एवं विलक्षण है।

   गिर में वस्तुत: एशियाई शेरों का एकमात्र साम्राज्य कायम है। भारत के गुजरात प्रांत के जिला जूनागढ़, अमरेली एवं सोमनाथ तक फैला यह अभयारण्य अति दर्शनीय है। विशेषज्ञों की मानें तो करीब 1424 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले इस वन्य जीव अभयारण्य में एशियाई शेरों की संख्या 525 से भी अधिक है। 

   एशियाई शेरों का बढ़़ता कुनबा वैश्विक पर्यटकों को आकर्षित करता है। निकट ही मितीयाला वन्य जीव अभयारण्य भी है लेकिन गिर वन्य जीव अभयारण्य एशियाई शेरों के लिए ही खास तौर से जाना पहचाना जाता है।

   सिंह दर्शन के लिए गिर वन्य जीव अभयारण्य खास तौर से जाना पहचाना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो विश्व में एशियाई शेरों की आबादी लगातार कम होने की चिंता ने इस विशाल वन्य जीव अभयारण्य को अस्तित्व दिया था। 

   इस क्षेत्र को एशियाई शेरों का संरक्षण क्षेत्र घोषित किया गया। विशेषज्ञों की मानेंं तो विश्व में अफ्रीका के बाद गिर में ही सर्वाधिक एशियाई शेरों की आबादी है। गिर के जंगलों को बाकायदा वर्ष 1969 में गिर वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया। 

  हालांकि इसकी विधिवत स्थापना वर्ष 1965 में हुयी। विशेषज्ञों की मानें तो गिर का इतिहास 100 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। गिर के जंगलों में एशियाई शेरों की आबादी पर संकट देख कर जूनागढ़ के नवाब ने शेरों के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया था।

  वर्ष 1913 में गिर के जंगलों में एशियाई शेरों की संख्या 20 थी। संरक्षण मिलने से अब एशियाई शेरों का कुनबा 525 का आकंड़ा पार कर गया। वन्य जीवों के लिए गिर वन्य जीव अभयारण्य को एक आदर्श उद्यान के तौर पर देखा जाता है। 

  चौतरफा एक शांति एवं सुरम्यता इस शानदार एवं सुन्दर अभयारण्य की शान एवं शोभा है। खूबसूरत वातावरण एवं स्थलाकृति गिर वन्य जीव अभयारण्य को काफी कुछ विशेष बना देती है। 
  गिर वन्य जीव अभयारण्य को गिर नेशनल पार्क, सासन गिर एवं गिर वन के रूप में जाना पहचाना जाता है। सू्खे पताड़ वाले वृक्षों, कांटेदार झाड़ियों, हरे-भरे वन क्षेत्र से आच्छादित गिर वन्य जीव अभयारण्य पर्यावरण की दृष्टि से अति समृद्ध है। 

   मूलत: एशियाई शेरों के घर के तौर पर विख्यात गिर वन्य जीव अभयारण्य आैषधीय वनस्पतियों का भण्डारण क्षेत्र भी है। सागवान, शीशम, बबूल, बेर, जामुन एवं वन सम्पदाओं की प्रचुरता वाला गिर वन्य जीव अभयारण्य पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। 

  गिर वन्य जीव अभयारण्य भले ही एशियाई शेरों का आशियाना हो लेकिन यहां हिरन, सांभर, चीतल, नीलगाय, चिंकारा, बारहसिंगा आदि कुलांचे भरते देखे जा सकते हैं।
  वन्य जीवन का खिलंदड़पन पर्यटकों को एक रोमांच से भर देता है। बाघ, भालू, भेडिया सहित वन्य जीवों की असंख्य प्रजातियां गिर वन्य जीव अभयारण्य में खास तौर से आबाद हैं।

   गिर भारत का एक शानदार एवं अच्छा पक्षी अभयारण्य भी है। इस शानदार पक्षी अभयारण्य में कलगी वाला बाज, कठफोडवा, एरीओल, जंगली मैना, मैैना, पैराडाइज फ्लाईकेचर आदि इत्यादि हैं। साथ ही अधोलिया, वालडेरा, रतनधुरा एवं पीपलिया आदि इत्यादि पक्षियों का भी यह आशियाना है। 

  नदियों एवंं झीलों वाले इस इलाके में मगरमच्छों की भी विभिन्न प्रजातियां गिर वन्य जीव अभयारण्य में दर्शनीय हैं। गिर वन्य जीव अभयारण्य में एशियाई शेरोें की दर्शनीयता के लिए सफारी एवं जीप की सवारी करनी चाहिए। गिर वन्य जीव अभयारण्य में प्रवेश के लिए आवश्यक है कि पर्यटकों के पास भ्रमण के आवश्यक इंतजाम हों। निश्चय ही गिर वन्य जीव अभयारण्य पर्यटकों को एक खास रोमांच का एहसास कराता है।

   गिर वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट राजकोट एवं अहमदाबाद एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन जूनागढ़ जंक्शन एवं वेरावल जंक्शन हैं। पर्यटक सड़़क मार्ग से भी गिर वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा कर सकते हैं।
21.091840,70.836320

Friday, 7 June 2019

पेरियार राष्ट्रीय उद्यान : वन्य जीवन का सौन्दर्य

   पेरियार राष्ट्रीय उद्यान को हाथियों का घर कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, यह राष्ट्रीय उद्यान खास तौर से हाथियों के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है। 

   हालांकि इस राष्ट्रीय उद्यान का एक बड़ा हिस्सा बाघ संरक्षण के लिए भी आरक्षित है। पेरियार राष्ट्रीय उद्यान भारत का प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान है। 
  खास यह कि पेरियार राष्ट्रीय उद्यान दक्षिण भारत का खूबसूरत एवं दर्शनीय उद्यान है। भारत के केरल प्रांत के पश्चिमी घाटों का यह सुन्दर उद्यान वस्तुत: वन्य जीव अभयारण्य है।

   इस खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यान में हाथियों, बाघों केे अलावा नीलगाय, जंगली सुअर, सांभर, भालू, चीता, तेंदुआ, हिरन आदि इत्यादि वन्य जीव संरक्षित हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना 1950 में की गयी थी।

  पेरियार राष्ट्रीय उद्यान को वर्ष 1998 की अवधि में हाथी संरक्षण परियोजना के तहत विशेष संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था। हालांकि इसके पूर्व वर्ष 1978 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। 

   पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटकों के लिए सभी आवश्यक सेवायें-सुविधायें उपलब्ध हैं। जिससे पर्यटक पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में घूम कर वन्य जीवन के रोमांच का एहसास कर सकें। 
  नदियों, झीलों एवं झरनों की प्रचुरता रखने वाला यह वन्य जीव अभयारण्य प्रकृति का एक शानदार उपहार है। पेरियार एवं पम्बा यहां की मुख्य नदियां हैं। 

  पेरियार राष्ट्रीय उद्यान वस्तुत: केरल के इडुक्की एवं पथानामथिट्टा जिलों का एक बड़ा हिस्सा है। करीब 925 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान अति दर्शनीय है। पानी के मोटरयान में सवार होकर पर्यटक पेरियार राष्ट्रीय उद्यान के सौन्दर्य एवं वन्य जीवन के रोमांच का एहसास करते हैं। 

   पेरियार राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा का सबसे बेहतरीन समय अक्टूबर से जून की अवधि है। वनस्पतियों एवं फूलों की विभिन्न प्रजातियां संरक्षित हैं। लिहाजा परिवेश एक खास सुगंध से महकता रहता है। 
   विशेषज्ञों की मानें तो वनस्पतियों की 170 से अधिक एवं फूलों की 140 से अधिक प्रजातियां यहां संरक्षित हैं। यह इलाका खास तौर से इलायची हिल्स के तौर पर ख्याति रखता है।

   समुद्र तल से करीब 2019 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पेरियार राष्ट्रीय उद्यान प्रकृति के सौन्दर्य का करीब-करीब हर खजाना अपनी आगोश में रखता है। इस शानदार अभयारण्य में पेरियार झील एवं मुल्लापेरियार बांध पेरियार राष्ट्रीय उद्यान की शान एवं शोभा हैं। 

   मुल्लापेरियार बांध का निर्माण करीब 1895 में किया गया था। लिहाजा इसे देश के अति प्राचीन बांध में माना जा सकता है। 
   खास यह कि पेरियार राष्ट्रीय उद्यान की जलवायु अति शीतल एवं शांत रहती है। लिहाजा पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटक शांत शीतलता का एहसास करते हैं। इसे आैषधीय वनस्पतियों का भण्डारण क्षेत्र भी कहा जा सकता है। 

   खास यह कि इस इलाके में चाय बागान, कॉफी बागान एवं इलायची के बागानों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। विशेषज्ञों की मानें तो इस सुन्दर अभयारण्य में 24 बंगाल टाइगर्स हैं।
   इतना ही नहीं, पक्षियों की 265 से अधिक प्रजातियां पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में संरक्षित हैं। सांप, मगरमच्छ, छिपकली एवं कछुआ सहित अन्य वन्य जीवों की एक लम्बी श्रंखला इस विशाल अभयारण्य में संरक्षित हैं। नदियां, झील एवं झरनों की विशाल श्रंखला मछलियों एवं जलीय जीवन को आश्रय देते हैं। 

   खास तौर से पेरियार ट्राउट, पेरियार लाटिया, पेरियार कंटिया, चना कंटिया, त्रावणकोर लोच आदि मछलियों की प्रजातियां नदियों, झीलों एवं झरनों में कोलाहल करती दिखती हैं।
  विशेषज्ञों की मानें तो 160 से अधिक तितलियोंं की प्रजातियां पेरियार राष्ट्रीय उद्यान के परिवेश को आैर भी अधिक खूबसूरत बनाती हैं।

   इनमें खास तौर से चूना तितली, मालाबार पेड़ अप्सरा, त्रावणकोर शाम ब्रााउन आदि इत्यादि हैं।
   पेरियार राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट कोचीन इण्टरनेशनल एयरपोर्ट है।

   निकटतम रेलवे स्टेशन इडुक्की जंक्शन है। इडुक्की जंक्शन से पेरियार राष्ट्रीय उद्यान की दूरी करीब 60 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी पेरियार राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
9.847510,76.980900

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