Tuesday, 24 December 2019

विजयवाड़ा: समृद्ध सांस्कृतिक सौन्दर्य

   विजयवाड़ा की सांस्कृतिक समृद्धता को अतुलनीय कहा जाना चाहिए। जी हां, विजयवाड़ा की सांस्कृतिक समृद्धता अति दर्शनीय है। 

    लिहाजा इसके सांस्कृतिक सौन्दर्य से पर्यटक खिचे चले आते हैं। भारत के आंध्र प्रदेश का विजयवाड़ा अति दर्शनीय शहर है। कृष्णा नदी के तट पर स्थित विजयवाड़ा वस्तुत: पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य से अति समृद्ध शहर है। इन्द्राकिलाद्री पहाड़ियों से घिरा विजयवाड़ा कलाकृतियों के लिए भी प्रसिद्ध है।

   मान्यता है कि यह कलाकृतियां सदियों प्राचीन हैं। खास यह कि विजयवाड़ा का मनोरम परिदृश्य पर्यटकों को शांत शीतलता का एक सुखद एहसास कराता है। लिहाजा पर्यटक एक रोमांच से भर उठते हैं। प्राचीन शहर होने के कारण वियजवाड़ा की भौगोलिक स्थित अति सुन्दर एवं मोहक है। 

   विजयवाड़ा की यात्रा का सबसे बेहतरीन समय अक्टूबर से मार्च की अवधि होती है। कारण इस अवधि में विजयवाड़ा का मौसम सुहावना होता है। विजयवाड़ा का नामकरण देवी कनक दुर्गा पर आधारित है। देवी कनक दुर्गा को विजया भी कहते हैं। लिहाजा इस शहर को विजया के नाम पर विजयवाड़ा नाम दिया गया। 

   खास यह कि विजयवाड़ा मंदिरों एवं गुफाओं से भी समृद्ध है। लिहाजा पर्यटक दर्शन, पूजन के साथ ही प्राचीनता की भी अनुभूति कर सकते हैं। विजयवाड़ा में मालेश्वर मंदिर एक अति प्रसिद्ध स्थान है। मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर में श्रीचक्र की स्थापना की थी।

   विजयवाड़ा के निकट ही पहाड़ी पर स्थित विक्टोरिया म्युजियम भी अति दर्शनीय है। काले ग्रेनाइट पत्थर की विशालकाय बुद्ध प्रतिमा यहां का मुख्य आकर्षण है। विजयवाड़ा से दक्षिण में करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित गंडीवाड़ा जैन मंदिर आस्था एवं विश्वास का प्रसिद्ध केन्द्र है।

   बौद्ध धर्म से ताल्लुक रखने वाले अवशेष प्राचीनता को दर्शित करते हैं। बौद्ध धर्म के अवशेष की 99 समाधियां हैं। खास यह कि इस स्थान को विशिष्टता के कारण राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया है। 
   विजयवाड़ा एवं उसके अासपास दर्शनीय एवं आकर्षक स्थलों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। इनमें खास तौर से देखें तो भवानी आईलैण्ड, उनादल्ली गुफाएं, प्रकाशम बैराज, मोगलाराजपुरम गुफाएं आदि इत्यादि हैं। इनका आकर्षण पर्यटकों को सम्मोहित कर लेता है। 

   भवानी आईलैण्ड: भवानी आईलैण्ड विजयवाड़ा का एक खास आकर्षण है। विजयवाड़ा की शान एवं शोभा की ख्याति रखने वाला भवानी आईलैण्ड बेहद आकर्षक एवं दर्शनीय है। 

   करीब 130 एकड़ क्षेत्र में फैला भवानी आईलैण्ड पर्यटकों को रोमांच से भर देता है। भवानी आईलैण्ड कृष्णा नदी का सबसे बड़ा द्वीप है। लिहाजा पर्यटक जलक्रीड़ा का भरपूर आनन्द ले सकते हैं।
    पर्यटक भवानी आईलैण्ड पर नौकायन का आनन्द ले सकते हैं तो वाटर स्पोट्र्स का रोमांचक एहसास भी कर सकते हैं। पर्यटकों के बीच यह आईलैण्ड बेहद प्रसिद्ध है।

   उनादल्ली गुफाएं: उनादल्ली गुफाएं अति प्राचीन संरचना है। मान्यता है कि चार मंजिला उनादल्ली गुफाएं 7वीं शताब्दी की संरचनाएं हैं। इस क्षेत्र की प्रारम्भिक गुफाओं में यह एक है। 
   लिहाजा विजयवाड़ा में इसका पौराणिक महत्व है। इसकी शानदार वास्तुकला एवं मूर्ति शिल्प पर्यटकों को मुग्ध कर लेते हैं। सुरम्य पृष्ठभूमि पर आधारित इन गुफाओं में भगवान विष्णु की दिव्य भव्य प्रतिमा विद्यमान है। खास यह कि इस स्थान से सूर्यास्त का अति मनोरम दृश्य दिखता है। 
   प्रकाशम बैराज: प्रकाशम बैराज कृष्णा नदी की शान एवं शोभा है। करीब 1223.5 मीटर लम्बा प्रकाशम बैराज एक आदर्श पिकनिक स्पॉट भी है। प्रकाशम बैराज का निर्माण वर्ष 1852 से 1855 की अवधि में किया गया।
   बांध की तीन जलधाराएं हैं। यह तीनों जलधाराएं शहर विजयवाड़ा के मध्य से होकर गुजरती हैं। इस बांध के जल से एक अति खूबसूरत झील भी बनाई गयी है। बांध से झील का मनोरम परिदृश्य दिखता है।

   मोगलाराजपुरम गुफाएं: मोगलाराजपुरम गुफाओं को वस्तुत: विशाल चट्टानों को काट कर बनाया गया है। वस्तुत: यह एक अभयारण्य क्षेत्र है। मान्यता है कि यह दर्शनीय गुफाएं 5वीं शताब्दी में संरचित की गयी हैं। 
   खास यह है कि इन गुफाओं में प्रवेश करते ही एहसास होता है कि जैसे 5वीं शताब्दी में हों। इन गुफाओं में भगवान अर्धनारीश्वर की राजसी प्रतिमा है। गुफाएं सबसे सुन्दर पुरातन मूर्ति शिल्प को अपने आगोश में संरक्षित रखे हुए है। पर्यटकों को इन गुफाओं में भारत के अति समृद्ध एवं पौराणिक इतिहास के दर्शन होते हैं तो वहीं प्राचीन वास्तुकला से भी परिचय होता है।

     विजयवाड़ा की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट गन्नवरम एयरपोर्ट विजयवाड़ा है। एयरपोर्ट शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी विजयवाड़ा की यात्रा कर सकते हैं।
15.895870,80.764660

Wednesday, 18 December 2019

कोल्हापुर: शिल्पकला का अद्भुत संगम

   कोल्हापुर को शिल्पकला एवं लजीज व्यंजनों का अद्भुत संगम कहा जाना चाहिए। जी हां, कोल्हापुर अपने प्राकृतिक सौन्दर्य शास्त्र के साथ ही चप्पलों, आभूषणों एवं स्वादिष्ट-लजीज व्यंजनों के लिए देश दुनिया में खास प्रसिद्ध है। 

   भारत के महाराष्ट्र के दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित कोल्हापुर वस्तुत: एक सुन्दर एवं धार्मिक शहर है। कोल्हापुर को खास तौर से देवी महालक्ष्मी के लिए जाना एवं पहचाना जाता है। मुम्बई से करीब 400 किलोमीटर दूर स्थित कोल्हापुर वस्तुत: महाराष्ट्र का एक जिला है। 

   मुम्बई के निकट होने के कारण कोल्हापुर वैश्विक पर्यटकों का बेहद पसंदीदा पर्यटन क्षेत्र है। पौराणिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण शहर कोल्हापुर मराठी कला के लिए खास तौर से जाना एवं पहचाना जाता है। विशेष रूप से कोल्हापुरी हस्तशिल्प वैश्विक ख्याति रखता है। 

   कोल्हापुरी चप्पलें तो दुनिया में अपनी एक खास पहचान एवं ख्याति रखती हैं। कोल्हापुर का प्राकृतिक सौन्दर्य, इतिहास, संस्कृति एवं आध्यात्म पर्यटकों को मुग्ध कर लेता है। 

   कोल्हापुर एवं उसके आसपास आकर्षक एवं दर्शनीय स्थलों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। इनमें खास तौर से महालक्ष्मी मंदिर बेहद प्रसिद्ध है। महालक्ष्मी मंदिर, नया महल, छत्रपति साहू जी संग्रहालय, पन्हाला किला, काशी विश्वेश्वर मंदिर, जोतिबा मंदिर, रंकाला तालाब, दाजीपुर अभयारण्य एवं टाउनहाल आदि इत्यादि हैं।

   महालक्ष्मी मंदिर: महालक्ष्मी मंदिर वस्तुत: कोल्हापुर की शान एवं शोभा हैं। मंदिर का सौन्दर्य शास्त्र पर्यटकों, दर्शकों एवं श्रद्धालुओं को मुग्ध कर लेता है। यह मंदिर देवी महालक्ष्मी को समर्पित है। महालक्ष्मी को देवी अम्बा के नाम से भी जाना जाता है। 

   मंदिर परिसर में काशी विश्वेश्वर, कार्तिक स्वामी, सिद्धिविनायक, महासरस्वती, महाकाली, श्री दत्ता एवं भगवान श्री राम विराजमान हैं। महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण चालुक्य शासक करन देव ने 7वीं शताब्दी में किया था। मंदिर के गर्भगृह में देवी महालक्ष्मी की 40 किलो की दिव्य-भव्य प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठापित है। 

   पौराणिक मान्यताओं की मानें तो प्राचीनकाल में केशी राक्षस के पुत्र कोल्हासुर का यहां शासन था। महालक्ष्मी ने राक्षस कोल्हासुर का वध किया था। लिहाजा इस स्थान को राक्षस कोल्हासुर एवं देवी महालक्ष्मी के लिए जाना जाता है। मंदिर का वास्तुशिल्प अति दर्शनीय एवं लुभावना है। 
   नया महल: नया महल एक दिव्य भव्य पौराणिक संरचना है। वर्ष 1884 में बने इस महल को महाराज का नया महल कहा जाता है। इस शानदार महल का वास्तुशिल्प गुजरात एवं राजस्थान के सौन्दर्य शास्त्र पर आधारित है। 
   इसमें हिन्दू स्थापत्य कला, जैन स्थापत्य कला एवं राजवाड़ा शैली का समिश्रण दिखता है। छत्रपति साहू जी महाराज का यह महल स्थापत्य कला का अद्भुत एवं विलक्षण संगम है। महल के भूतल पर प्राचीन वस्त्रों, हथियारों एवं आभूषणों आदि इत्यादि का भव्य संग्रहालय है। इसे छत्रपति साहू जी महाराज संग्रहालय के नाम से जाना जाता है। छत्रपति साहू जी महाराज की अनेक वस्तुएं संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। 
   पन्हाला किला: पन्हाला किला समुद्र तल से करीब 3127 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। किला एवं आसपास का प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भुत एवं विलक्षण है। 
   पन्हाला किला का नामकरण पन्ना नामक एक जनजातीय पर आधारित है। इस जनजाति ने इस किला पर शासन किया था। इस किला का निर्माण 1015 में राजा भेज ने किया था।
   काशी विश्वेश्वर मंदिर: काशी विश्वेश्वर मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी के दौरान किया गया था। इस मंदिर में दो कुण्ड हैं। इनको काशी एवं मणिकर्णिका के नाम से जाना जाता है। यहां महालक्ष्मी उद्यान है। एक प्राचीन गुफा भी है। गुफा का उद्देश्य प्राचीन काल में ध्यान साधना से रहा है। 

   जोतिबा मंदिर: जोतिबा मंदिर वस्तुत: कोल्हापुर के उत्तर दिशा में पहाड़ों से घिरा एक दर्शनीय एवं सुरम्य स्थान है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण 1730 में नवाजीसवा ने कराया था। मंदिर का वास्तुशिल्प प्राचीन है। 
   गर्भगृह में जोतिबा की चार भुजाधारी प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। जोतिबा को भैरव का पुर्नजन्म माना जाता है। जोतिबा ने महालक्ष्मी के साथ रत्नासुर से युद्ध लड़ा था। राक्षस रत्नासुर के नाम से पहाड़ सहित पूरे इलाके को जाना एवं पहचाना जाता है।
   रंकाला तालाब: रंकाला तालाब वस्तुत: कोल्हापुर की शान एवं शोभा है। वस्तुत: इसे एक सुन्दर झील के तौर पर ख्याति हासिल है। पर्यटक रंकाला मेें पर्यटक जलक्रीड़ा का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। इस झील का निर्माण छत्रपति साहू जी महाराज ने कराया था।
   दाजीपुर अभयारण्य: दाजीपुर अभयारण्य वस्तुत: कोल्हापुर एवं सिंधुदुर्ग का सीमा क्षेत्र है। इस प्रसिद्ध पर्यटन क्षेत्र में पशु पक्षियों की असंख्य प्रजातियां पाई जाती हैं। चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य की निराली छटा पर्यटकों को मुग्ध कर लेती है। आैषधीय वनस्पतियों की उपलब्धता परिवेश को आैर भी अधिक खुशनुमा बना देती है। रोमांच के शौकीन पर्यटकों के लिए दाजीपुर अभयारण्य किसी स्वर्ग से कम नहीं है।
   टाउनहाल: टाउनहाल कोल्हापुुर शहर के मध्य स्थित एक शानदार एवं दर्शनीय इमारत है। टाउनहाल की इमारत में एक दिव्य भव्य संग्रहालय भी है। इस संग्रहालय में ब्राह्मपुरी से लायी गयीं वस्तुएं खास तौर से प्रदर्शित हैं। इनमें खास तौर से प्राचीन मूर्तियां, कलाकृतियां, प्राचीन सिक्के, कढ़ाईदार वस्त्र, तलवारें एवं हथियार आदि दर्शित एवं प्रदर्शित हैं।
   कोल्हापुर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बेलगांव एयरपोर्ट है। बेलगांव एयरपोर्ट से कोल्हापुर की दूरी करीब 150 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोल्हापुर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग सेे भी कोेल्हापुर की यात्रा कर सकते हैं।
16.694590,74.223053

Sunday, 15 December 2019

उनाकोटि: अद्भुत एवं विलक्षण शिल्प

   उनाकोटि को नक्काशी कला का इन्द्रधनुषी आयाम कहा जाना चाहिए। जी हां, उनाकोटि का सौन्दर्य शास्त्र अद्भुत एवं विलक्षण है। 

   भारत के राज्य त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से करीब 125 किलोमीटर दूर स्थित उनाकोटि वस्तुत: एक अति प्राचीन पौराणिक धरोहर एवं सम्पदा है। यहां सुन्दर रॉक कट नक्काशी के दुर्लभ दर्शन होते हैं। उनाकोटि का शाब्दिक अर्थ एक करोड़ से कम होता है। 

   खास यह कि 7वीं एवं 9वीं शताब्दी का यह सौन्दर्य शिल्प वैश्विक ख्याति रखता है। वस्तुत: उनाकोटि को हिन्दुओं का एक प्राचीन तीर्थ भी माना जाता है। कारण सौन्दर्य शास्त्र की यह प्राचीन संरचना देवी देवताओं को समर्पित है। उनाकोटि भगवान शिव के कृतित्व, व्यक्तित्व एवं ईश्वरत्व को रेखांकित करती है।

  हिन्दू पौराणिक कथाओं के असंख्य उदाहरण उनाकोटि में दर्शनीय हैं। भगवान शिव, पार्वती, नंदी, भगवान श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, गणेश, हनुमान आदि सहित अनेक देवी देवताओं की प्रतिमाएं उनाकोटि में दर्शनीय एवं शोभायमान हैं। इनके अलावा मां दुर्गा, भगवान विष्णु आदि की भी आकर्षक प्रतिमाएं विद्यमान हैं। 

   खास यह है कि उनाकोटि के स्थान पर भगवान शिव की विशाल प्रतिमा विद्यमान है। भगवान शिव की इस विशाल प्रतिमा को उनाकोटेश्वर के नाम से जाना एवं पहचाना जाता है। यह प्रतिमा करीब 30 फुट ऊंची है। इसके अलावा भगवान शिव की दो अन्य विशाल प्रतिमाएं भी हैं। 

   भगवान गणेश की प्रतिमा विलक्षण एवंं अद्भुत है। इस प्रतिमा में भगवान गणेश की प्रतिमा में चार हाथ एवं दांत दर्शनीय हैं। गणेश की यह प्रतिमा अति सुन्दर है। इसके अलावा गणेश की अन्य प्रतिमाएं भी आकर्षक हैं। उनाकोटि की अद्भुत मूर्तियां पर्यटकों में रोमांच पैदा करती हैं।

   मान्यता है कि इन दर्शनीय प्रतिमाओं की संरचना कालू शिल्पकार ने की थी। मान्यता है कि शिल्पकार कालू भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत जाना चाहता था लेकिन यह संभव नहीं था। भगवान शिव ने शिल्पकार से कहा कि यदि एक रात में एक करोड़ प्रतिमाएं संरचित कर दे तो वह कैलाश जा सकेगा। 

   लिहाजा शिल्पकार रात भर मूर्तियों की संरचना करता रहा। सुबह गणना में एक मूर्ति कम निकली। लिहाजा शिल्पकार कालू कैलाश नहीं जा सका। ऐसे मेें शिल्पकार कालू धरती पर ही रह गया लेकिन उसकी इस संरचना ने शिल्पकार कालू को अमर कर दिया। 

   शायद इसी लिए इस स्थान को उनाकोटि कहा जाता है। उनाकोटि को ट्रैकिंग के लिए बेहतरीन पर्यटन माना जाता है। खास यह है कि उनाकोटि को पूर्वोत्तर भारत के रहस्यों में गिना जाता है। 

   हालांकि भारतीय पर्यटन का यह सुन्दर आयाम लम्बेे समय से अज्ञात रहा है। अद्भुत एवं विलक्षण मूर्ति शिल्प होने के साथ ही उनाकोटि को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान हासिल है। भगवान शिव सहित अन्य देवी देवताओं को विधिवत पूजन अर्चन किया जाता है।

   इन अद्भुत एवं विलक्षण मूर्ति शिल्प की दर्शनीयता के लिए दुनिया भर केे पर्यटक आते हैं। उनाकोटि बेहद रोमांचक है। उनाकोटि का सौन्दर्य शास्त्र एवं नक्काशी बेहद लुभावनी है। लिहाजा पर्यटकों की आवाजाही लगी रहती है।

   उनाकोटि की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अगरतला एयरपोर्ट है। 

   पर्यटक कमलपुर एयरपोर्ट से भी उनाकोटि की यात्रा कर सकते हैंं। निकटतम रेलवे स्टेशन कुमारघाट जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी उनाकोटि की यात्रा कर सकते हैं।
23.833820,91.282420

Friday, 13 December 2019

नीरमहल : अद्भुत एवं अतुलनीय वास्तुशिल्प

   नीरमहल का वास्तुशिल्प विलक्षण एवं अतुलनीय कहा जाना चाहिए। जी हां, इसे इंजीनियरिंग का नायाब करिश्मा कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   भारत के त्रिपुरा की राजधानी अगरतला का यह विलक्षण महल देश दुनिया में खास ख्याति रखता है। अगरतला की विशाल झील रुद्रसागर के मध्य बना नीरमहल अति दर्शनीय है। त्रिपुरा के शाही परिवार का निवास नीरमहल त्रिपुरा की अति खूबसूरत संरचना है।

   रुद्रसागर झील के मध्य करीब छह वर्ग किलोमीटर के दायरे में बना यह शाही महल धरती पर स्वर्ग लोक से कम नहीं है। 
   खास यह कि यह महल विशिष्ट खूबसूरती के साथ साथ इंजीनियरिंग के कला कौशल के लिए भी विशेष तौर से जाना एवं पहचाना जाता है। नीर महल का शाब्दिक अर्थ देखें तो इसे जल महल अर्थात पानी महल कहा जायेगा। 

   इस शानदार जल महल की संरचना 1930 में राजा बीर विक्रम किशोर देबबर्मण ने की थी। नीरमहल का वास्तुशिल्प हिन्दू शैली एवं इस्लामिक शैली के समिश्रण पर आधारित है। बलुआ पत्थरों एवं संगमरमर से संरचित यह खूबसूरत इमारत देश दुनिया में खास तौर से प्रसिद्ध है।

   इस शाही महल की वास्तुकला एवं बनावट देश दुनिया के पर्यटकों को स्वत: आकर्षित करती है। संगमरमर की इस अद्भुत संरचना में विलक्षणताओं की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है।
   नीरमहल में कई टावर, बालकनी, पुल एवं पवेलियन आदि इत्यादि हैं। इनसे इस राजसी महल की खूबसूरती आैर भी अधिक बढ़ जाती है। 

   झील के चारों दिशाओं में बाग बागीचों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। जिससे झील एवं नीरमहल की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। 
  नीरमहल के आंतरिक क्षेत्र में भी बागवानी अति दर्शनीय है। इस बागवानी में वर्ष पर्यंत रंग बिरंगे फूल खिलते रहते हैं। जिससे नीरमहल की खूबसूरती आैर भी निखर उठती है। 

   त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से करीब 55 किलोमीटर दूर स्थित नीरमहल प्राकृतिक झील रुद्रसागर की शान एवं शोभा है। शाम होते ही नीरमहल का अद्भुत दृश्य पर्यटकों को मुग्ध कर लेता है।

  खास यह कि त्रिपुरा के राजसी परिवार का यह ग्रीष्मकालीन प्रवास महल रहा है। खास यह है कि नीरमहल भारत के शीर्ष सुन्दर एवं चुनिंदा महलों में से एक है। देश के बड़े महलों में नीरमहल को गिना जाता है।

   फ्लड़ लाइट्स की रोशनी नीरमहल को अति दर्शनीय बना देती हैं। नीरमहल के मुख्य आकर्षण में वाटर स्पोटर्स आदि इत्यादि की सेवाएं सुविधाएं पर्यटकों को उपलब्ध हैं। इस झील में प्रवासी पक्षियों को कोलाहल कलरव भी एक आकर्षण है।

  रुद्रसागर झील का अनुपम एवं अतुलनीय सौन्दर्य नीरमहल को अति दर्शनीय बना देता है। खास तौर से नीरमहल का उत्सव देखने वाला होता है।

  विशेष उत्सव पर रुद्रसागर झील में तैराकी प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। नीरमहल में सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं। इनमें खास तौर से नाट्य मंचन एवं गीत संगीत के कार्यक्रम होते हैं।

  नीरमहल की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अगरतला एयरपोर्ट है। 

  निकटतम रेलवे स्टेशन अगरतला जंक्शन है। अगरतला एयरपोर्ट से नीरमहल की दूरी करीब 60 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी नीरमहल की यात्रा कर सकते हैं।
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शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...