Sunday, 29 September 2019

कांगड़ा किला: खूबसूरत स्थापत्य कला

   कांगड़ा किला की स्थापत्य कला को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, इस दिव्य-भव्य का स्थापत्य दर्शन पर्यटकों को सम्मोहित कर देता है। 

   राजसी वैभव के साथ ही इस दिव्य-भव्य किला का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व भी है। भारत के हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा का यह शानदार किला अपने विहंगम दृश्य के लिए जाना पहचाना जाता है। कांगड़ा के निकट एक शिखर पर्वत पर विद्यमान कांगड़ा किला प्राचीनकाल की धरोहर के तौर पर है। 

   धर्मशाला से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित कांगड़ा किला की दिव्यता-भव्यता भी अति दर्शनीय है। यह किला व्यास नदी एवं उसकी तलहटी पर रचा बसा है। बाण गंगा नदी एवं मांझी नदी के संगम पर रचा-बसा कांगड़ा किला से पर्यटक आसपास का विहंगम दृश्य भी देख सकते हैं।

   कांगड़ा किला वस्तुत: एक खड़ी चट्टान पर स्थित है। कांगड़ा किला के प्रवेश द्वार के निकट एक छोटा किन्तु शानदार संग्रहालय है। इस संग्रहालय में कांगड़ा किला का इतिहास दर्शित है।

   कांगड़ा किला एवं आसपास का क्षेत्र धार्मिक एवं आध्यात्मिक माना जाता है। पुराने कांगड़ा के निकट एक शानदार पर्वत चोटी पर प्रसिद्ध जयंती माता मंदिर स्थित है। इस विशाल मंदिर का निर्माण गोरखा सेना के जनरल अमर सिंह थापा ने किया था। 

   इस किला से कुछ ही कदम दूर महाराजा संसार चन्द्र कटोच संग्रहालय स्थित है। इस संग्रहालय का संचालन कांगड़ा के शाही परिवार के हाथों में है। विशेषज्ञों की मानें तो कांगड़ा किला अपनी दिव्यता-भव्यता के साथ ही आक्रमण, युद्ध, कौशल-पराक्रम, धन-सम्पत्ति एवं विकास-वैभव का गवाह है।

   यह शक्तिशाली किला त्रिजटा साम्राज्य की उत्पत्ति को भी दर्शित करता है। विशेषज्ञों की मानें तो कांगड़ा किला हिमालय का सबसे बड़ा किला एवं अति प्राचीन किला है। इस किला की प्राचीनता का उल्लेख महाकाव्य महाभारत में भी मिलता है।

   कहावत है कि कांगड़ा का यह किला आर्थिक तौर पर अति समृद्ध रहा है। इस किला में अकल्पनीय धन रखा था। इस अकूत खजाना के कारण इस किला पर कई बार चढ़ाई भी हुई।

   मान्यता है कि यह अकूत सम्पदा किला में स्थित माता बृजेश्वरी देवी को बतौर भेंट चढ़ाया जाता था। कांगड़ा का यह किला करीब 463 एकड़ में फैला हुआ है। शिवालिक पहाड़ियों का यह किला अपने राजसी वैभव के कारण विशेष ख्याति रखता है।

  ऊंची-ऊंची दीवारों से घिरा यह किला काफी कुछ विशिष्टता रखता है। इस किला से बाण गंगा नदी एवं माझी नदी के सुन्दर संगम को भी दर्शित करता है। 

  इस विशाल किला का निर्माण कटोच राजवंश के महाराजा सुशर्मा चन्द्र ने कराया था। यहां कटोच वंश का शासन था।

   चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य से घिरा यह शानदार किला अति दर्शनीय है। कांगड़ा किला के मखमली घास के शानदार मैदान पर्यटकों को रोमांचित कर देते हैं।

   कांगड़ा किला की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट गग्गल एयरपोर्ट है। गग्गल एयरपोर्ट से कांगड़ा किला की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी कांगड़ा किला की यात्रा कर सकते हैं।
32.101500,76.273200

Tuesday, 24 September 2019

मुबारक मण्डी पैलेस : अतुलनीय स्थापत्य कला

   मुबारक मण्डी पैलेस की स्थापत्य कला की कहीं कोई तुलना नहीं की जा सकती। जी हां, मुबारक मण्डी पैलेस का स्थापत्य सौन्दर्य अतुलनीय है। 

   इस राजसी महल में राजस्थानी, मुगल एवं यूरोपीय बारोक शैली की वास्तुकला का संगम दिखता है। भारत के जम्मू-कश्मीर के शहर जम्मू स्थित यह शानदार महल भारतीय संस्कृति की एक शानदार विरासत है। 

   मुबारक मण्डी पैलेस की विशिष्टताओं को देखते हुए जम्मू-कश्मीर शासन ने इसे विरासत स्थल घोषित किया है। यह शानदार राजसी महल विभिन्न खण्ड़ों में है।

   खास यह कि मुबारक मण्डी पैलेस में स्थित डोगरा कला संग्रहालय यहां के सांस्कृतिक एवं विरासत के वैभव को दर्शाता है। शीश महल एवं पिंक हाल में स्थित डोगरा कला संग्रहालय अति दर्शनीय है।

   इस शानदार कला संग्रहालय में पेंटिंग, स्वर्ण धनुष एवं तीर आदि इत्यादि बहुत कुछ दर्शनीय है। जम्मू की यात्रा पर आधारित कलाकृतियों के इस अनुपम संगम में कलात्मकता की समृद्ध संस्कृति के दर्शन होते हैं।

   इस शानदार संग्रहालय में दिलचस्प वस्तुओं की एक लम्बी श्रंृखला विद्यमान है। इस कला संग्रहालय में कांगड़ा चित्रकला, जम्मू, बशोली कला स्कूल की कलात्मकता दिखती है।

   मुबारक मण्डी पैलेस डोगरा राजवंश एवं जम्मू-कश्मीर के महाराजा का शाही निवास था। तवी नदी के तट पर बने इस शाही महल का निर्माण करीब 1824 के आसपास किया गया था। इस महल के एक खास हिस्से को गोलघर कहा जाता है। 

  इस राजसी परिसर में कई प्रांगण, महल एवं आलीशान इमारतें हैं। इनमें खास तौर से दरबार हाल कॉम्पलेक्स, पिंक पैलेस, रॉयल पैलेस, गोलघर कॉम्पलेक्स, नवा महल, रानी चरक पैलेस, हवा महल, तक्खाना महल एवंं शीश महल आदि इत्यादि हैं। 

   पिंक पैलेस का नामकरण खास तौर से महल के रंग रोगन को ध्यान में रख कर किया गया। कारण इस महल का रंग गुलाबी है। मुबारक मण्डी पैलेस का शीश महल यहां की शान एवं शोभा है। 

   शीश महल पूरी तरह से कांच का बना है। शीश महल को किसी भी कोण से देखें तो इसकी दर्शनीयता बेहद लुभावनी प्रतीत होती है। 

   खास यह कि मुबारक मण्डी पैलेस जम्मू-कश्मीर का एक शानदार पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व रखने वाला विरासत स्थल है। इस महल की संरचना में पौराणिकता के दर्शन होते हैं तोे वहीं कलात्मक सौन्दर्य भी पर्यटकों को मुग्ध करता है। 

   खास यह कि इसकी नक्काशी एवं बनावट पर्यटकों को लुभाती है। मुबारक मण्डी पैलेस के चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य की निराली छटा अति दर्शनीय है। इस राजसी महल से तवी नदी का भव्य दिव्य दृश्यावलोकित होता है।

   मुबारक मण्डी पैलेस की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सतवरी एयरपोर्ट जम्मू है। सतवरी एयरपोर्ट से मुबारक मण्डी पैलेस की दूरी करीब 48 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू तवी जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी मुबारक मण्डी पैलेस की यात्रा कर सकते हैं।
32.726601,74.857025

Sunday, 22 September 2019

पुणे-पुण्य नगरी: सांस्कृतिक राजधानी

    पुणे को सांस्कृतिक राजधानी कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, शहर पुणे की आगोश में विशिष्टताओं का भण्डार है। 

  मूला एवं मू्ठा नदियों के किनारेे रचा-बसा पुणे का एक पौराणिक एवं गौरवशाली इतिहास भी है। पुणे को पुण्य नगरी के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। भारत के प्रांत महाराष्ट्र की सांंस्कृतिक राजधानी पुणे क्वीन आफ दक्कन भी कहा जाता है। इसे सूचना एवं तकनीकि शिक्षा के शानदार केन्द्र के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है।

   पुणे के वैभवशाली इतिहास में शनिवार वाड़ा, आगाखान महल, पार्वती हिल मंदिर, कात्रज सर्प उद्यान, कोणार्क, आैषधीय वनस्पतियां एवं सायबर सिटी पार्क आदि इत्यादि पुणे के विशिष्ट आकर्षण हैं।

   शनिवार वाड़ा: शनिवार वाड़ा एक वैभवशाली एवं शानदार महल है। पेशवा का निवास यह महल काफी कुछ विशिष्टतायें रखता है। इस महल की नींव बाजीराव ने 1730 में रखी थी। 

   खास यह कि इस शानदार महल की दीवारों पर महाभारत एवं रामायण का कथानक चित्रित है। शनिवार वाड़ा का कमल की 16 कलियों फूलों के आकार-प्रकार का फव्वारा तकनीकि कौशल को बयां करता है।
   खास यह कि इस महल में प्रत्येक दिन लाइट एण्ड साउण्ड शो का आयोजन किया जाता है। इस लाइट एण्ड साउण्ड शो में वैभवशाली इतिहास का वर्णन किया जाता है। 

   आगाखान महल: आगाखान महल का निर्माण 1892 में इमाम सुल्तान मोहम्मद शाह आगाखान ने किया था। स्वाधीनता आंदोलन में इस महल की खास भूमिका रही। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी, उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी सहित कई आंदोलनकारियों ने यहां आश्रय लिया था। मौला नदी के समीप स्थित इस शानदार महल में महात्मा गांधी के जीवन पर आधारित एक स्मारक भी है। 
   पार्वती हिल मंदिर: पार्वती हिल मंदिर पुणे का एक अति पवित्र स्थान है। समुद्र तल से करीब 2100 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर स्थापत्य कला का शानदार अलंकरण है।

   मान्यता है कि इस स्थान पर पेशवा शासक बाजीराव ने ब्रिाटिश फौज को पराजित किया था। इस स्थान पर देवदेवेश्वर मंदिर, कार्तिकालय, विष्णु एवं विठ्ठल मंदिर भी हैं। यह मंदिर मराठा साम्राज्य की शान एवं शोभा हैं। 
   कात्रज सर्प उद्यान: कात्रज सर्प उद्यान वस्तुत: सर्प एवं अन्य रेंगने वाले जीव जन्तुओं का संरक्षण क्षेत्र है। मगरमच्छ आदि इत्यादि यहां की शान एवं शोभा हैं। इस पार्क में एक शानदार पुस्तकालय एवं संग्रहालय भी है। इसमें सर्प विषयक विशेष जानकारी उपलब्ध रहती है। 
  कोणार्क: कोणार्क वस्तुत: एक शानदार पक्षी अभयारण्य है। पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां यहां संरक्षित दिखती हैं। 

   खास तौर से चाइना का पीला सुनहरा तीतर एवं कीनिया का रिंग ओइट तीतर आदि इत्यादि विशेष हैं। जैव विविधिता का आदर्श माना जाने वाला यह इलाका आैषधीय वनस्पतियों एवं फूलोें की 1000 से अधिक प्रजातियों के लिए जाना पहचाना जाता है।

  सायबर सिटी पार्क: सायबर सिटी पार्क सूचना एवं तकनीकि का शिक्षा क्षेत्र है। पर्यटक इस शानदार एवं खूबसूरत पार्क में खरीदारी का शौक पूरा कर सकते हैं।

   पुणे की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट लोहेेगांव एयरपोर्ट पुणे है। निकटतम रेलवे स्टेशन पुणे जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी पुणे की यात्रा कर सकते हैं।
18.520760,73.855408

Thursday, 12 September 2019

पांगोंग त्सो झील : अद्भुत सौन्दर्य

    पांगोंग त्सो झील की प्राकृतिक सुन्दरता किसी जादुई करिश्मा से कम नहींं। हिमालय की इस शानदार झील को वस्तुत: एक पौराणिक एवं धरोहर माना जाता है। 

    भारत के केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख की यह झील अद्भुत एवं विलक्षण है। समुद्र तल से करीब 4500 मीटर ऊंचाई पर स्थित पांगोंग त्सो झील भारत-चीन की सीमा पर स्थित है। इस शानदार झील का एक बड़ा हिस्सा चीन सीमा क्षेत्र में है। इसकी चौड़ाई करीब 8 किलोमीटर है। खारा जल की इस विलक्षण झील का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों को मुग्ध करता है। 

    सर्दियों में यह शानदार झील पूरी तरह से जम जाती है। इस दौरान पर्यटक झील को एक बडे़ विशाल नमक के जमाव के रूप में देख सकते हैं। हिमालय की इस झील की प्राकृतिक सुन्दरता पर दुनिया सम्मोहित है। इसका प्राकृतिक सौन्दर्य वैश्विक पर्यटकों को खींच लाता है।

    इस दिव्य-भव्य झील को उच्च घास का मैदान भी कहा जाता है। करीब 134 किलोमीटर लम्बी इस झील को हिमालय की बेमौसम झील कहा जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो पांगोंग त्सो झील करीब 604 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली हुयी है।

   पांगोंग त्सो झील वस्तुत: प्रवासी पक्षियों का प्रजनन क्षेत्र एवं आशियाना है। गर्मियों के मौसम में बाल वाले हंस एवं ब्रााह्मणी बतख आदि इत्यादि दर्शनीय होते हैं। इनके अलावा विलुप्त प्रजाति के पक्षियों का कोलाहल एवं कलरव भी पांगोंग त्सो झील पर दिखता है।

    पांगोंग त्सो झील की सुन्दरता की दर्शनीयता के लिए पर्यटकों को लेह-लद्दाख की विस्तृत यात्रा करनी पडे़गी। पांगोंग त्सो झील एवं आसपास के इलाके में पर्यटक लद्दाख की लोक संस्कृति एवं स्थानीयता का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। 

   पांगोंग त्सो झील एवं आसपास का शांत एवं शीतल परिवेश पर्यटकों को रोमांचित कर देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे पर्यटक किसी स्वर्ग लोक में आ गये हों। सर्दियों में पांगोंग त्सो झील की यात्रा का आनन्द दोगुना हो जाता है। कारण चौतरफा बर्फ की शानदार चादर दिखती है। बर्फबारी का यह दृश्य मुग्ध करने वाला होता है।

   हिमालय की पर्वत मालाओं से घिरी पांगोंग त्सो झील एवं मखमली घास के मैदान पर्यटकों को एक शानदार सुखद स्पर्श का एहसास कराते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो पांगोंग त्सो झील को भारत की विशाल नमक झीलों में से एक माना जाता है।

   इतना ही नहीं, पांगोंग त्सो झील को दुनिया की सबसे ऊंची, सबसे लम्बी एवं सबसे गहरी झील माना जाना जाता है। सबसे दिलचस्प यह कि इस शानदार झील के जल की निकासी कहीं नहीं है। लेह-लद्दाख की यह अति दर्शनीय झील भारत से तिब्बत तक फैली है। इस रमणीय झील के सम्मोहन से बॉलीवुड भी नहीं बच सका।

  हिमालय की वादियों की पांगोंग त्सो झील एवंं आसपास असंख्य फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। खास यह कि इस शानदार झील में पर्वतीय बतख भी देखने को मिलती हैं। आैषधीय वनस्पतियों की प्रचुरता भी पांगोंग त्सो झील की विशेषता है।

  विशेषज्ञों की मानें तो विलुुप्त आैषधीय वनस्पतियों की उपलब्धता पांगोंग त्सो झील की शान एवं शोभा है। बॉलीवुड का पसंदीदा इलाका होने के कारण पांगोंग त्सो झील की सुन्दरता कई फिल्मों में दर्शक देख चुके हैं। 

   इनमें खास तौर से दिल से, द फॉल, हीरो, थ्री इडियट्स, जब तक है जां, सनम रे, ना जाने कब आदि इत्यादि फिल्मों में पांगोंग त्सो झील का प्राकृतिक सौन्दर्य दिख चुका है।

   पांगोंग त्सो झील की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट कुशोक बगुला रम्पोछे एयरपोर्ट लेह है। एयरपोर्ट से पांगोंग त्सो झील की दूरी करीब 142 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कालका जंक्शन एवं शिमला जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी पांगोंग त्सो झील की यात्रा कर सकते हैं।
34.146490,77.481610

Wednesday, 4 September 2019

जैसलमेर : अद्भुत एवं विलक्षण स्थापत्य कला

   जैसलमेर को ऐतिहासिक, पौराणिक एवं स्थापत्य कला का अद्भुत संगम कहना चाहिए। जैसलमेर की स्थापत्य कला अति दर्शनीय है। 

   शायद इसी लिए जैसलमेर वैश्विक पर्यटकों का पसंदीदा पर्यटन है। भारत के राजस्थान का यह अनुपम शहर अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है। भारत के सुदूर पश्चिम के थार मरुस्थल इलाके का यह सुन्दर शहर अपनी आगोश में एक वैभवशाली इतिहास रखता है। 

   मान्यता है कि जैसलमेर की स्थापना यदुवंशी भाटी के वंशज रावल-जैसल ने की थी। जैसलमेर के भू-भाग को प्राचीनकाल में माडधरा एवं वल्लभमण्डल कहा जाता था। खास यह कि जैसलमेर के चौैतरफा रेगिस्तान में रेत के छोटे-बड़े आैर स्थाई एवं अस्थाईटीले दिखते हैं। 

   हवा के प्रवाह के साथ ही रेत के यह टीले अपना स्थान परिवर्तन करते रहते हैं। इन रेत के टीलों के मध्य कहीं पठार तो कहीं पहाड़ियां होती हैं।
   जैसलमेर को स्वर्ण नगरी भी कहा जाता है। कारण जैसलमेर की आभा हमेशा स्वर्ण सी चमकती दमकती रहती है। जैसलमेर के सांस्कृतिक इतिहास के साथ ही यहां की स्थापत्य कला भी अति दर्शनीय है। 

   जैसलमेर की स्थापत्य कला में चिंतन, विचार, विश्वास के साथ ही कल्पनाशीलता भी दर्शित होती है। जैसलमेर की स्थापत्य कला में दुर्ग निर्माण की संस्कृति विशेष रूप से परिलक्षित होती है। जैसलमेर के किलों, गढ़ियों, राजभवनों, मंदिरों, हवेलियों, जलाशयों, छतरियों एवं जनसामान्य के आवास संरचना में विशिष्ट स्थापत्य कला दर्शित होती है। 

   जैसलमेर में दुर्ग की श्रंृखला अति दर्शनीय है। यह आकर्षक दुर्ग जैसलमेर में कुछ दूरी पर फैले हुये हैं। यह दर्शनीय दुर्ग जैसलमेर के एक हजार वर्ष प्राचीन इतिहास के गवाह हैं। 

   मान्यता है कि यह दुर्ग मध्य युगीन इतिहास में बेहद महत्व वालेे थे। खास यह कि दुर्ग निर्माण में सुरक्षा के साथ ही मजबूती एवं सौन्दर्य का विशेष ध्यान रखा जाता था। 
  खास यह कि दुर्ग में एक ही प्रवेश द्वार रखने की परम्परा रही थी। इन भव्य दिव्य दुर्ग का निर्माण खास तौर से पत्थरों से ही किया जाता रहा। हालांकि किशनगढ़ एवं शाहगढ़ आदि दुर्ग इसके अपवाद रहे। 

   खास यह कि इन दुर्ग मेंं चार या इससे अधिक बुर्ज बनाने की भी परम्परा रही। बुर्ज का निर्माण दुर्ग की आवश्यकता कोे ध्यान में रख कर किया जाता रहा। जैसलमेर के दुर्ग दुनिया में खास तौर सेे प्रसिद्ध हैं। इसी लिए जैसलमेर को सौन्दर्य का अद्भुत शहर कहा जाना चाहिए। 

   नक्काशीदार हवेलियां, गलियों का प्राचीन सौन्दर्य, प्राचीन जैन मंदिरों की सुन्दरता भी अति दर्शनीय है। दुर्ग एवं किला आदि की संरचना के साथ ही जैसलमेर ऊंचे शिखरों वाले मंदिरों के लिए खास तौर से जाना पहचाना जाता है। भव्य गुबंद वाले जैन मंदिरों की स्थापत्य कला का विशेष महत्व है। कारण इस तरह की स्थापत्य कला अति दुर्लभ मानी जाती है। 

   जैसलमेर के जैन मंदिरों में जगती, गर्भगृह, मुख्य मण्डप, गूढ़मण्डप, रंगमण्डप, स्तंभ एवं शिखर आदि बेहद दर्शनीय हैं। इनमें खास तौर से गुजरात के सोलंकी एवं बघेल कालीन मंदिरों की स्थापत्य कला का प्रभाव दिखता है। 

   जैसलमेर खास तौर से मेलों एवं उत्सवों की दिव्यता एवं भव्यता के लिए भी जाना पहचाना जाता है। जैसलमेर के निकट ही सम गांंव पर्यटन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। 
   जैसलमेर का सोनार किला यहां का मुख्य आकर्षण माना जाता है। जैसलमेर के इस दिव्य भव्य किला का निर्माण 1156 में किया गया था। करीब 250 ऊंचा आैर 30 फुट ऊंची दीवार वाला यह किला विशाल शिलाखण्डों से बना है। इस किला में 99 प्राचीर हैं। इस किला का कुंआ विशिष्ट माना जाता है।

   रावल जैसल ने इस किला का निर्माण कराया था। यह किला जैसलमेर की 80 मीटर ऊंची त्रिकुट पहाड़ी पर निर्मित है। इसमें महल एवं मंदिर सहित बहुत कुछ है। 
   संकरी गलियों वाले इस किला में प्रवेश के लिए चार द्वार हैं। खास यह कि जैसलमेर अद्भुत, विलक्षण सौन्दर्य एवं शानदार स्थापत्य कला से संरचित एक इन्द्रधनुषी शहर है।

   जैसलमेर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जोधपुर एयरपोर्ट है। जोधपुर एयरपोर्ट से जैसलमेर की दूरी करीब 285 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जैसलमेर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी जैसलमेर की यात्रा कर सकतेे हैं।
27.055267,70.930719

शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...