जैसलमेर : अद्भुत एवं विलक्षण स्थापत्य कला
जैसलमेर को ऐतिहासिक, पौराणिक एवं स्थापत्य कला का अद्भुत संगम कहना चाहिए। जैसलमेर की स्थापत्य कला अति दर्शनीय है।
शायद इसी लिए जैसलमेर वैश्विक पर्यटकों का पसंदीदा पर्यटन है। भारत के राजस्थान का यह अनुपम शहर अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है। भारत के सुदूर पश्चिम के थार मरुस्थल इलाके का यह सुन्दर शहर अपनी आगोश में एक वैभवशाली इतिहास रखता है।
मान्यता है कि जैसलमेर की स्थापना यदुवंशी भाटी के वंशज रावल-जैसल ने की थी। जैसलमेर के भू-भाग को प्राचीनकाल में माडधरा एवं वल्लभमण्डल कहा जाता था। खास यह कि जैसलमेर के चौैतरफा रेगिस्तान में रेत के छोटे-बड़े आैर स्थाई एवं अस्थाईटीले दिखते हैं।
हवा के प्रवाह के साथ ही रेत के यह टीले अपना स्थान परिवर्तन करते रहते हैं। इन रेत के टीलों के मध्य कहीं पठार तो कहीं पहाड़ियां होती हैं।
जैसलमेर को स्वर्ण नगरी भी कहा जाता है। कारण जैसलमेर की आभा हमेशा स्वर्ण सी चमकती दमकती रहती है। जैसलमेर के सांस्कृतिक इतिहास के साथ ही यहां की स्थापत्य कला भी अति दर्शनीय है।
जैसलमेर की स्थापत्य कला में चिंतन, विचार, विश्वास के साथ ही कल्पनाशीलता भी दर्शित होती है। जैसलमेर की स्थापत्य कला में दुर्ग निर्माण की संस्कृति विशेष रूप से परिलक्षित होती है। जैसलमेर के किलों, गढ़ियों, राजभवनों, मंदिरों, हवेलियों, जलाशयों, छतरियों एवं जनसामान्य के आवास संरचना में विशिष्ट स्थापत्य कला दर्शित होती है।
जैसलमेर में दुर्ग की श्रंृखला अति दर्शनीय है। यह आकर्षक दुर्ग जैसलमेर में कुछ दूरी पर फैले हुये हैं। यह दर्शनीय दुर्ग जैसलमेर के एक हजार वर्ष प्राचीन इतिहास के गवाह हैं।
मान्यता है कि यह दुर्ग मध्य युगीन इतिहास में बेहद महत्व वालेे थे। खास यह कि दुर्ग निर्माण में सुरक्षा के साथ ही मजबूती एवं सौन्दर्य का विशेष ध्यान रखा जाता था।
खास यह कि दुर्ग में एक ही प्रवेश द्वार रखने की परम्परा रही थी। इन भव्य दिव्य दुर्ग का निर्माण खास तौर से पत्थरों से ही किया जाता रहा। हालांकि किशनगढ़ एवं शाहगढ़ आदि दुर्ग इसके अपवाद रहे।
खास यह कि इन दुर्ग मेंं चार या इससे अधिक बुर्ज बनाने की भी परम्परा रही। बुर्ज का निर्माण दुर्ग की आवश्यकता कोे ध्यान में रख कर किया जाता रहा। जैसलमेर के दुर्ग दुनिया में खास तौर सेे प्रसिद्ध हैं। इसी लिए जैसलमेर को सौन्दर्य का अद्भुत शहर कहा जाना चाहिए।
नक्काशीदार हवेलियां, गलियों का प्राचीन सौन्दर्य, प्राचीन जैन मंदिरों की सुन्दरता भी अति दर्शनीय है। दुर्ग एवं किला आदि की संरचना के साथ ही जैसलमेर ऊंचे शिखरों वाले मंदिरों के लिए खास तौर से जाना पहचाना जाता है। भव्य गुबंद वाले जैन मंदिरों की स्थापत्य कला का विशेष महत्व है। कारण इस तरह की स्थापत्य कला अति दुर्लभ मानी जाती है।
जैसलमेर के जैन मंदिरों में जगती, गर्भगृह, मुख्य मण्डप, गूढ़मण्डप, रंगमण्डप, स्तंभ एवं शिखर आदि बेहद दर्शनीय हैं। इनमें खास तौर से गुजरात के सोलंकी एवं बघेल कालीन मंदिरों की स्थापत्य कला का प्रभाव दिखता है।
जैसलमेर खास तौर से मेलों एवं उत्सवों की दिव्यता एवं भव्यता के लिए भी जाना पहचाना जाता है। जैसलमेर के निकट ही सम गांंव पर्यटन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
जैसलमेर का सोनार किला यहां का मुख्य आकर्षण माना जाता है। जैसलमेर के इस दिव्य भव्य किला का निर्माण 1156 में किया गया था। करीब 250 ऊंचा आैर 30 फुट ऊंची दीवार वाला यह किला विशाल शिलाखण्डों से बना है। इस किला में 99 प्राचीर हैं। इस किला का कुंआ विशिष्ट माना जाता है।
रावल जैसल ने इस किला का निर्माण कराया था। यह किला जैसलमेर की 80 मीटर ऊंची त्रिकुट पहाड़ी पर निर्मित है। इसमें महल एवं मंदिर सहित बहुत कुछ है।
संकरी गलियों वाले इस किला में प्रवेश के लिए चार द्वार हैं। खास यह कि जैसलमेर अद्भुत, विलक्षण सौन्दर्य एवं शानदार स्थापत्य कला से संरचित एक इन्द्रधनुषी शहर है।
जैसलमेर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जोधपुर एयरपोर्ट है। जोधपुर एयरपोर्ट से जैसलमेर की दूरी करीब 285 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जैसलमेर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी जैसलमेर की यात्रा कर सकतेे हैं।
27.055267,70.930719
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