Friday, 26 April 2019

सरखेज रोजा : विलक्षण वास्तुशिल्प

   सरखेज रोजा का वास्तुशिल्प अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। सरखेज रोजा का वास्तु सौन्दर्य निश्चय ही पर्यटक को आकर्षित करता है। 

   सरखेज रोजा भारत के गुजरात प्रांत के शहर अहमदाबाद में स्थित है। अहमदाबाद की यह शानदार इमारत वैश्विक पर्यटकों के खास आकर्षण का केन्द्र है। 
  इसे गुजरात की खूबसूरत एवं पौराणिक इमारतों में एक माना जाता है। खास यह कि इसे अहमदाबाद शहर की शान भी माना जाता है। 

  विशेषज्ञों की मानें तो सरखेज रोजा का निर्माण मुगल शासक सुल्तान अहमद शाह के शासनकाल में किया गया था। वस्तुत: प्राचीनकाल में सरखेज अहमदाबाद का एक छोटा गांव था। 

   मान्यता है कि इसी गांव में पीर शेख अहमद गट्टू गंज बक्श रहा करते थे। विशेषज्ञों की मानें तो मुगल शासक सुल्तान अहमद ने पीर साहब की याद में इस शानदार मकबरा का निर्माण कराया था। 

  मान्यता है कि 15 वीं शताब्दी में महमूद बेगडा ने इस मकबरा के निकट एक शानदार महल एवं सुन्दर झील का निर्माण कराया था। 
  इसके शानदार अतीत एवं गौरव को ध्यान में रखते हुए गुजरात सरकार ने इसे पौराणिक स्थल घोषित कर दिया। फिलहाल इस सौन्दर्यशाला की देखरेख गुजरात सरकार एवं पुरातत्व विभाग संयुक्त रूप से करते हैं।

  खास यह कि सरखेज रोजा का वास्तु शिल्प अति दर्शनीय है। गुजरात में इसे रोजा काम्प्लेक्स के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। इसकी भव्यता-दिव्यता अति दर्शनीय है। 

  खास यह कि यह आलीशान मकबरा अपने अस्तित्व में बहुत कुछ रखता है। सरखेज रोजा में महल, मकबरा झील, शानदार मस्जिद, मखमली घास से आच्छादित मैदान-लॉन आदि इत्यादि हैं। 
  अहमदाबाद से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित यह आलीशान एवं पौराणिक इमारत सौन्दर्य शास्त्र को खुद-ब-खुद बयां करती है। 

  हालांकि वर्तमान परिवेश में सरखेज रोजा को एक आदर्श पिकनिक स्पॉट माना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो महमूद बेगडा ने इसके स्वरूप को आधुनिक विस्तार दिया था। जिससे सरखेज रोजा के सौन्दर्य में चार चांद लग गये। 

  खास यह कि सरखेज रोजा के महल में गर्मी महल भी है। गर्मी महल में कभी भी गर्मी का एहसास नहीं होेता है। यह खास महल हमेशा एक शांत शीतलता का एहसास कराता है।
  बाद में सरखेज रोजा के इसी परिसर में मुगल शासक सुल्तान अहमद शाह ने अपने बेटे एवं बेगम का भी मकबरा बनवाया था। 

  इस शानदार इमारत की विशेषता यह है कि इसका वास्तु शिल्प मिश्रितशैली पर आधारित है। इसमें इस्लामिक वास्तुशिल्प दिखता है तो वहीं इसमें हिन्दू शैली एवं जैन अलंकरण भी दिखते हैं। यह मिश्रित निर्माण शैली अद्भुत एवं विलक्षण है।

  विशेषज्ञों की मानें तो यह निर्माण शैली दुर्लभ है। ऐसा वास्तुशिल्प कम ही स्मारकों में देखने को मिलता है। सरखेज रोजा के गुम्बद, खम्भों एवं कोष्ठक आदि इस्लामिक शैली पर आधारित हैं। 

  खास यह कि अलंकरण आदि हिन्दू शैली पर आधारित हैं। यहां की अधिकांश संरचनाओं में मेहराब नहीं है। पत्थरों पर यहां डिजाइन की शानदार श्रंखला दर्शनीयता को बढ़ाती है।
  विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य इमारत के वास्तुकार आजम एवं मुआज्जम खान थे। सरखेज रोजा की संरचना इसकी पौराणिकता के साथ-साथ सौन्दर्य शास्त्र को भी बयां करती है।

  सरखेज रोजा की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सरदार वल्लभ भाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट अहमदाबाद है। निकटतम रेलवे स्टेशन अहमदाबाद जंक्शन है। पर्यटक सड़़क मार्ग से भी सरखेज रोजा की यात्रा कर सकते हैं।
22.975890,72.497630

Thursday, 18 April 2019

लक्ष्मी विलास महल: प्राचीन एवं सुन्दर धरोहर

   लक्ष्मी विलास महल को भारत की शानदार राजसी धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, लक्ष्मी विलास महल की भव्यता-दिव्यता अति दर्शनीय है।

   खास यह कि इस महल का वास्तुशिल्प अति सुन्दर एवं शानदार है। शायद इसीलिए लक्ष्मी विलास महल वैश्विक पर्यटकों का बेहद पसंदीदा है। भारत के गुजरात प्रांत के बडोदरा शहर में स्थित यह महल राजसी शान का उत्कृष्ट उदाहरण है।

  इसे राजसी संरचनाओं की उत्कृष्टता कहा जाना चाहिए। यह ऐतिहासिक महल वास्तुकला की इण्डो-सारासेनिक रिवाइवल शैली पर आधारित है। खास यह कि इसका आकार प्रकार बकिंघम पैलेस के आकार से चार गुना बड़ा है। 

  राजसी काल में लक्ष्मी विलास महल महाराजा सयाजी राव गायकवाड़ का निजी निवास था। यह शानदार महल गुजरात के साथ साथ देश-विदेश में खास ख्याति रखता है। करीब 700 एकड़ क्षेत्रफल में फैला यह महल एक शानदार राजसी अलंकरण है।

  विशेषज्ञों की मानें लक्ष्मी विलास महल भारत की राजसी श्रेष्ठतम संरचनाओं में से एक है। गायकवाड़ राजघराना प्रसिद्ध मराठा राज परिवार के तौर पर देश दुनिया में जाना पहचाना जाता है।
  वस्तुत: लक्ष्मी विलास महल एक विहंगम संरचना है। जिसमें सौन्दर्य का हर आयाम रेखांकित है। 

  खास तौर से बाग-बगीचों से लेकर मंदिर आदि की सुन्दर संरचनायें हैं। प्राचीन शास्त्रीय शैली पर आधारित नजारबाग पैलेस भी अति विलक्षण है। 
   खास यह कि लक्ष्मी विलास महल की आतंरिक संरचना भी अति दर्शनीय है। आतंरिक साज-सज्जा यूरोपियन शैली को बयां करती है। इस विशाल पैलेस में मोेती बाग पैलेस, महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय खास तौर से शोभा एवं शान हैं। 

  विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1930 के दशक में महाराजा प्रताप सिंह ने यूरोपीय मेहमानों के लिए लक्ष्मी विलास महल परिसर में एक शानदार गोल्फ कोर्स बनाया था। हालांकि इसे बाद में देश की जनता के लिए भी खोल दिया गया। 

   खास यह कि लक्ष्मी विलास महल का दरबार हाल बेहद आकर्षक है। इस दरबार हॉल में संगीत समारोह एवं अन्य सांस्कृतिक समारोह के आयोजन होते हैं। मोजेक फर्श, बेल्जियम ग्लास एवं अन्य बेहतरीन वस्तुओं से सजा यह महल पर्यटकों को स्वत: आकर्षित करता है। 

   दरबार हाल केे बाहर आंगन में एक शानदार फव्वारा पर्यटकों का स्वागत करता है। खास तौर से महल में कांस्य, संगमरमर एवं टेराकोटा की मूर्तियां दर्शनीय हैं। केव गार्डेन का सौन्दर्य अतुलनीय है। 

   मोती बाग क्रिकेट ग्राउण्ड गुजरात की शान माना जाता है। दुर्लभ इनडोर टेनिस कोर्ट एवं बैडमिंटन कोर्ट को विशिष्ट माना जाता है। 
  खास यह कि लक्ष्मी विलास महल में एक रेलवे लाइन भी है। यह रेलवे ट्रैक महल से स्कूल तक जाता है। राज परिवार के राजवंश शिक्षा के लिए रेल से स्कूल आते जाते थे। 

  खास यह कि लक्ष्मी विलास महल में एक छोटा चिड़ियाघर भी है। चिड़ियाघर में एक तालाब भी है। यह तालाब खास तौर से मगरमच्छों का आशियाना था। यहां की बावली प्राचीन वैभव को बयां करती है।

  महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय: महाराजा फतेह सिंह संग्रहालय खास तौर से लक्ष्मी विलास महल की शान है। इसे कला का खास खजाना भी कह सकते हैं। यहां राजा रवि वर्मा के कला संसार का दिग्दर्शन किया जा सकता है। 
  यहां यूूरोपियन कला शैली भी दर्शित है। इस शानदार संग्रहालय में कांस्य के बर्तन, पत्थर के बर्तन, चीनी मिट्टी के बर्तन, जापानी मिट्टी के बर्तन एवं ताम्र बर्तन आदि विशिष्ट दर्शनीय हैं। इसके अलावा प्रसिद्ध ग्रीक एवं रोमन मूर्तियां भी यहां प्रदर्शित हैं।

   लक्ष्मी विलास महल की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बडोदरा एयरपोर्ट गुजरात है। एयरपोर्ट शहर से करीब 6 किलोमीटर दूर स्थित है।
   निकटतम रेलवे स्टेशन भी बडोदरा में है। बडोदरा जंक्शन शहर में स्थित है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी लक्ष्मी विलास महल, बडौदरा की यात्रा कर सकते हैं।
22.311200,73.181980

Wednesday, 10 April 2019

बागेश्वर : अद्भुत एवं विलक्षण

   बागेश्वर को हिन्दुओं का महातीर्थ कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। इस पवित्र भूमि को भगवान सदाशिव की भूमि कहा जाता है।

   भारत के उत्तराखण्ड का शहर बागेश्वर आध्यात्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं खास तौर से धार्मिक महत्व है। समुद्र तल से करीब 1004 मीटर की ऊंचाई पर रचा-बसा यह शहर काफी कुछ अद्भुत एवं विलक्षण है। 

   बागेश्वर वस्तुत: तीन नदियों के संगम पर स्थित है। सरयू नदी, गोमती नदी एवं अव्यक्त भागीरथी नदी बागेश्वर में प्रवाहमान हैं। 
   मान्यता है कि बागेश्वर की पवित्र धरती के दर्शन मात्र से पापों से मुक्ति मिल जाती है। मान्यता है कि पुराणों में बागेश्वर के महात्म का सारगर्भित उल्लेख है। 

   कहावत है कि बागेश्वर की पवित्र भूमि के दर्शन से व्यक्ति जन्म एवं मृत्यु के शाश्वत बंधन से मुक्त हो जाता है। बागेश्वर वस्तुत: एक छोटा शहर है लेकिन इसका धार्मिक महत्व शिखर की ख्याति रखता है। 

   सरयू नदी, गोमती नदी एवं भागीरथी नदी का संगम होने के कारण बागेश्वर का विशेष धार्मिक महत्व है। हालांकि बागेश्वर को एक बड़े बाजार के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है। सरयू नदी की मान्यता है कि सरयू नदी में स्नान करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही अश्वमेघ यज्ञ का पुण्य हासिल होता है।

   सरयू का सतोगुणी जल पीने से सोमपान का फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस तीर्थ यात्रा के दौरान किसी की मृत्यु होती है तो उसे भगवान सदाशिव का सानिध्य प्राप्त होता है।
   बागेश्वर तीर्थ वस्तुत: सूर्य तीर्थ एवं अग्नि तीर्थ के मध्य विद्यमान है। शहर के पूर्व मेें भुलेश्वर महादेव, पश्चिम में नीलेश्वर पर्वत, उत्तर दिशा में सूर्य कुण्ड तीर्थ एवं दक्षिण दिशा में अग्नि कुण्ड तीर्थ विद्यमान हैं। 

    खास यह कि बागेश्वर में बागेश्वर नाथ का प्राचीन मंदिर भी है। बागेश्वर नाथ को बागनाथ एवं बाघनाथ भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव ने बाघ का स्वरूप धारण किया तो इस स्थान को ब्याघ्रेश्वर कहा जाने लगा।
   कालान्तर में यह बदल कर बागीश्वर फिर बागेश्वर हो गया। मान्यता है कि अनादिकाल में मुनि वशिष्ठ तपबल से ब्राह्मा के कमण्डल से निकली सरयू को धरती पर ला रहे थे। मार्ग में ऋषि मार्कण्डेय को तपस्या करते देख मां सरयू वहीं रूक गयीं।

   मुनि वशिष्ठ ने भगवान शिव से प्रार्थना की तोे भगवान शिव ने बाघ का स्वरूप धारण किया। साथ ही पार्वती जी को गाय स्वरूप प्रदान किया। कथानक के अनुसार बाघ ने गाय पर हमला किया। जिस पर गाय रंभाने लगी। 
   इस पर ऋषि मार्कण्डेय की तपस्या टूटी। जैसे ही ऋषि मार्कण्डेय गाय को बचाने के लिए दौड़े तो भगवान शिव ने बाघ का स्वरूप त्याग कर साक्षात शिव के स्वरूप में प्रकट हो गये। पार्वती ने भी गाय का स्वरूप त्याग कर स्वयं प्रकट हो गयीं।
   ऋषि मार्कण्डेय को शिव एवं पार्वती के दर्शन हुए। इसके बाद मां सरयू आगे बढ़ सकीं। बागेश्वर एवं आसपास आकर्षक एवं धार्मिक स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है। 
  बाघनाथ मंदिर: बाघनाथ मंदिर वस्तुत: भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। इसका निर्माण अल्मोड़ा के राजा लक्ष्मी चन्द ने कराया था।
  सूर्य कुण्ड एवं अग्नि कुण्ड: सूर्य कुण्ड एवं अग्नि कुण्ड वस्तुत: सरयू नदी से जनित प्राकृतिक कुण्ड हैं।
  चण्डिका मंदिर: चण्डिका मंदिर शहर बागेश्वर से करीब 5 किलोमीटर दूर स्थित है। श्रद्धालुओं का सैलाव यहां नवरात्र में दिखता है।
  श्रीहर मंदिर: श्रीहर मंदिर भी बागेश्वर का एक आकर्षण है। विजयादशमी पर यहां विशाल मेला का आयोजन होता है।
  गौरी उड्यार: गौरी उड्यार एक प्राचीन गुफा है। इसमें भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है। यह स्थान शहर से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित है।
  बागेश्वर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पंत नगर एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
29.838300,79.773900

Monday, 8 April 2019

साइलेंट वैली नेशनल पार्क: आैषधीय वनस्पतियों का खजाना

    साइलेंट वैली नेशनल पार्क को आैषधीय वनस्पतियों का भण्डारण क्षेत्र कहा जाना चाहिए। साइलेंट वैली को आैषधीय खजाना भी कहा जा सकता है।

    जी हां, इस शानदार वैली में देश-विदेश की असंख्य दुर्लभ आैषधीय वनस्पतियां उपलब्ध हैं। भारत के केरल प्रांत के जिला पालक्कड़ का यह राष्ट्रीय उद्यान देश विदेश में खास ख्याति रखता है। इसे भारत का शानदार हिल स्टेशन भी कहा जा सकता है। 

  पालक्कड़ जिला के मन्नारकाड से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित साइलेंट वैली नेशनल पार्क करीब 90 वर्ग किलोमीटर दायरे में फैला है। इसके उत्तर दिशा में नीलगिरी पर्वत श्रंखला विद्यमान है तो वहीं दक्षिण में मन्नारकाड है।

   विशेषज्ञों की मानें तो इस दुर्लभ एवं अद्भुत साइलेंट वैली नेशनल पार्क की खोज वर्ष 1847 में ब्रिाटिश वनस्पति शास्त्री रॉबर्ट वाइट ने की थी। इसके बाद इसे वैश्विक ख्याति हासिल हुयी।
   स्थानीयता में इसे सैरन्ध्रीवनम कहते है। इसका आशय द्रोपदी से है। मान्यता है कि अज्ञातवास की अवधि में पाण्डव ने यहां प्रवास किया था। 

   खास यह कि इसे साइलेंट वैली कहने के पीछे इसका शांत परिवेश है। विशेषज्ञों की मानें तो साइलेंट वैली नेशनल पार्क का एक अपना अलग ही प्राकृतिक आकर्षण है। 

   खास यह कि साइलेंट वैली नेशनल पार्क को वन्य जीवन अभयारण्य के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो साइलेंट वैली नेशनल पार्क में तीन दर्जन से अधिक स्तनधारी वन्य जीवों की प्रजातियां संरक्षित हैं। 

   पर्यटकों को भ्रमण के लिए यहां किराये के वाहन उपलब्ध रहते हैं। घनी जैव विविधिता के लिए खास तौर से साइलेंट वैली नेशनल पार्क कोे जाना पहचाना जाता है।
   विशेष फूलों, आैषधीय पौधों एवं लुप्त होने वाली वनस्पतियों का संरक्षण क्षेत्र माना जाने वाला साइलेंट वैली नेशनल पार्क पर्यटकों को एक विशेष प्राण वायु प्रदान करता है।

   शीतल एवं शांत हवाओं के झोके पर्यटकों को भरपूर आक्सीजन प्रदान करते हैं। जिससे पर्यटक खुद को बेहद ऊर्जावान होने का एहसास करते हैं। साइलेंट वैली नेशनल पार्क का मुख्य आकर्षण विजन नेचर रिजॉट्र्स है। इस रिजॉट्र्स में काफी कुछ दर्शनीय है। 

   साइलेंट वैली नेशनल पार्क की तलहटी पर विद्यमान रिजॉट्र्स में बर्ड वॉचिंग टॉवर एवं वॉचिंग टॉवर हैं। पर्यटक यहां प्रकृति की शांति का एहसास करते हैं। स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से साइलेंट वैली नेशनल पार्क बेहद लाभकारी है। 

   आैषधीय वनस्पतियों की प्रचुरता वाला यह क्षेत्र पर्यटकों को प्राकृतिक उपचार प्रदान करता है। आयुर्वेद केन्द्र पर्यटकों का कायाकल्प उपचार प्रदान करता है। जिससे पर्यटक नवजीवन का अनुभव करते हैं। 

   जैव विविधिता से आच्छादित यह क्षेत्र खास तौर से जीव विज्ञान के विद्यार्थियों, वैज्ञानिकों एवं शोधकर्ताओं के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।
   वैज्ञानिकों की मानें तो साइलेंट वैली नेशनल पार्क में 1000 से अधिक पुष्प एवं पौध प्रजातियां संरक्षित हैं। जिसमें 110 प्रजातियां आर्किड हैं। तितलियां की 200 से अधिक प्रजातियां साइलेंट वैली नेशनल पार्क में पायी जाती हैं। 

   साथ ही चिड़ियों की 150 से अधिक प्रजातियां एवं पक्षियों की 20 से अधिक प्रजातियां साइलेंट वैली नेशनल पार्क में संरक्षित हैं।
   खास यह कि साइलेंट वैली नेशनल पार्क से कुंती नदी का प्रवाहमान इसे अति दर्शनीय बना देता है। कुंती नदी नीलगिरी पर्वत अर्थात 2000 मीटर की ऊंचाई से नीचे अवतरित होती है। नदी की निर्मलता एवं जल की शीतलता बेहद दर्शनीय होती है।

   साइलेंट वैली नेशनल पार्क की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट कोयम्बटूर एयरपोर्ट तमिलनाडु है। एयरपोर्ट से साइलेंट वैली नेशनल पार्क की दूरी करीब 90 किलोमीटर है।
  निकटतम रेलवे स्टेशन पालक्कड जंक्शन है। पालक्कड जंक्शन से साइलेंट वैली नेशनल पार्क की दूरी करीब 69 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी साइलेंट वैली नेशनल पार्क की यात्रा कर सकते हैं।
10.786870,76.468071

Friday, 5 April 2019

आदिलाबाद: प्राकृतिक सौन्दर्य

  आदिलाबाद की प्राकृतिक सुन्दरता पर्यटकों को निश्चय ही आकर्षित कर लेगी। कारण आदिलाबाद के चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य की निराली छटा दिखती है। 

   ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे आदिलाबाद को प्रकृति ने खुद गढ़ा हो। भारत के तेलंगाना का शहर आदिलाबाद वस्तुत: एक ऐतिहासिक एवं पौराणिक शहर है। प्रकृति की गोद में रचा-बसा आदिलाबाद वस्तुत: देवी सरस्वती के लिए भी जाना पहचाना जाता है। 

   आदिलाबाद का नामकरण बीजापुर के प्रथम शासक अली आदिल शाह के नाम पर है। खास यह कि आदिलाबाद विभिन्न संस्कृतियों का संगमन शहर है। 

  खास यह कि आदिलाबाद गोदावरी एवं पेनगंगा नदियों के संगम स्थल के एक शानदार पठार पर 600 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। 
  खास यह कि आदिलाबाद एवं उसके आसपास शानदार एवं सुन्दर स्थानों की बेहतरीन श्रंखला विद्यमान है। प्राकृतिक सौन्दर्य के आकर्षण की यह शानदार श्रंखला वैश्विक पर्यटकों को खास तौर से आकर्षित करती है।

   आदिलाबाद के विशेष आकर्षण में महात्मा गांधी पार्क, बासार मंदिर, केलसापुर नगर, जगन्नाथ मंदिर, कव्वल वन्यजीव अभयारण्य, कुंटाला वॉटरफॉल्स एवं निर्मल दीर्घा आदि बहुत कुछ है।
   महात्मा गांधी पार्क: महात्मा गांधी पार्क आदिलाबाद शहर के मध्य स्थित है। पार्क का प्राकृतिक परिवेश पर्यटकों को खास शांति प्रदान करता है। वनस्पतियों की प्रचुरता पर्यटकों को एक खास सुगंध से तरोताजा रखती हैं। पर्यटक यहां एक ऊर्जा का एहसास करते हैं।

  बासर मंदिर: बासर मंदिर गोदावरी नदी के तट पर विद्यमान है। निजामाबाद से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित यह सुन्दर मंदिर ज्ञान गंगा का स्थान माना जाता है। बासर मंदिर वस्तुत: श्री ज्ञान सरस्वती मंदिर दक्षिण भारत का प्रमुख स्थान है।

   यह स्थान विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित है। मान्यता है कि शांति की खोज में ऋषि व्यास ने यहां देवी सरस्वती की आराधना की थी। देवी सरस्वती ने आराधना से प्रसन्न होकर ऋषि व्यास को यहां दर्शन दिये थे।
  खास यह कि यहां सरस्वती, लक्ष्मी एवं काली विद्यमान है। हालांकि मंदिर मुख्यत: सरस्वती को समर्पित है। पर्यटक यहां गोदावरी नदी में स्नान कर देवी सरस्वती के दर्शन करते हैं।
  केलसापुर: केलसापुर आदिलाबाद से करीब 32 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां शेषनाग की विशाल पाषाण प्रतिमा विद्यमान है। यहां नगोबा जात्रा आयोजित की जाती है। यह यहां का मुख्य आकर्षण है। 
   जगन्नाथ मंदिर: जगन्नाथ मंदिर आदिलाबाद से करीब 21 किलोमीटर दूर स्थित है। मान्यता है कि इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण पल्लव प्रमुख ने कराया था। मंदिर का वास्तुशिल्प बेहद आकर्षक है। 

  मंदिर का वास्तुशिल्प जैन शैली पर आधारित है। खास यह कि यहां लक्ष्मी नारायण स्वामी महोत्सव बेहद धूमधाम से मनाया जाता है।
  कव्वल वन्य जीव अभयारण्य: कव्वल वन्य जीव अभयारण्य वस्तुत: आदिलाबाद की शान है।

   करीब 893 वर्ग किलोमीटर दायरे मेें फैला यह अभयारण्य दक्षिण भारत का मुख्य आकर्षण है। विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीवों से अभयारण्य अनुगूंजित रहता है। यहां सूर्योदय एवं सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य पर्यटकों को रोमांचित करता है। 

   कुंटाला फॉल्स: कुंटाला फॉल्स आदिलाबाद से करीब 22 किलोमीटर दूर स्थित है। यह कदम नदी का हिस्सा है। यह फॉल्स करीब 45 मीटर ऊंचाई से नीचे गिरता है। चौतरफा वनस्पतियों का सघन क्षेत्र एक खास सुगंध प्रदान करता है।

   इस शानदार झरना के निकट ही भगवान शिव की विशाल प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा को सोमेश्वर के नाम से ख्याति हासिल है।
   आदिलाबाद की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट हैदराबाद एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन आदिलाबाद जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी आदिलाबाद की यात्रा कर सकते हैं।
17.417500,78.709720

शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...