Friday, 1 March 2019

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान: पक्षियों का स्वर्ग

   केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग कहा जाना चाहिए। उद्यान का प्राकृतिक सौन्दर्र्य भी अद्भुत है।

  वस्तुत: केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान पक्षी अभयारण्य है। हालांकि इस राष्ट्रीय उद्यान में अद्भुत वन्य जीवन देखने को मिलता है। भारत के प्रांत राजस्थान के भरतपुर का यह पक्षी अभयारण्य फूलों की सुगंध से महकता रहता है। 

  इस विहंगम राष्ट्रीय उद्यान का नामकरण भगवान शिव पर आधारित है। यहां केवलादेव महादेव का शिव मंदिर है।
   खास यह कि पक्षियों की 366 से अधिक प्रजातियां केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान संरक्षित हैं। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में देशी एवं प्रवासी पक्षियों का शानदार एवं सुन्दर आशियाना है। 

  सर्दियों में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान अति दर्शनीय हो जाता है। कारण प्रवासी पक्षियों का कोलाहल-कलरव मन मस्तिष्क को मुग्ध कर लेता है। राजस्थान के भरतपुर का यह शानदार अभयारण्य करीब 29 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला है।

  पक्षियों के अलावा केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में 379 पुष्प प्रजातियां, मछलियों की 50 से अधिक प्रजातियां, 50 से अधिक सांप की प्रजातियां, एक दर्जन से अधिक छिपकलियों की प्रजातियां, कछुओं की असंख्य प्रजातियां सुशोभित हैं।

  केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान वस्तुत: भारत की समृद्ध जैविक विरासत है। इसे भरतपुर पक्षी विहार के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है। 
  गौरतलब है कि केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में हजारों की संख्या में दुर्लभ एवं विलुप्त प्रजातियों के पक्षी एवं जीव-जन्तु हैं। 

  मसलन साइबेरिया से आने वाले सारस आदि इत्यादि हैं। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को देश विदेश में वैश्विक पर्यटन के लिए जाना पहचाना जाता है। शरद ऋतु में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में पक्षी विज्ञानी बहुतायत में आते हैं।

  विशेषज्ञों की मानें तो 1971 में इसे संरक्षित पक्षी अभयारण्य घोषित किया गया था। इसके बाद 1985 में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की विशिष्टता को देखते हुए यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया था। 

  विशेषज्ञों की मानें तो यह पक्षी विहार 250 वर्ष से भी अधिक समय से अस्तित्व में है। बताते हैं कि भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने इस इलाके में बांध का निर्माण कराया था। यह विशाल बांध गंभीर एवं बाणगंगा नदियों के संगम स्थल पर बनाया गया था। 

  केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान राजसी शासनकाल में राजा-महाराजाओं का पसंदीदा शिकारगाह भी था। हालांकि यह परम्परा 1850 से पहले की थी। यह राष्ट्रीय पक्षी विहार कभी मेलोर्ड एवं टील जैसे पक्षियों की बहुलता के लिए जाना पहचाना जाता था। 

  केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को जंतुशाला भी कह सकते हैं। दुर्लभ जीव-जन्तुओं का स्वच्छंद विचरण पर्यटक यहां देख सकते हैं। मानसून के मौसम में यहां पक्षियों का खिलंदड़पन देखने को खास तौर से मिलता है। 
   सिर पर पट्टी एवं ग्रे रंग के बतख, पिनटेल पतख, शाही गिद्ध, मैदानी गिद्ध, पीला-भूरा गिद्ध, धब्बेदार गिद्ध, हरियर गिद्ध, सुस्त गिद्ध आदि असंख्य प्रजातियां दर्शनीय हैं। 

  पक्षियों के अलावा बाघ, तेंदुआ, काला हिरण, पायथन, सांभर आदि असंख्य जीव-जन्तुओं का समूह यहां देखने को मिलता है।
  वनस्पतियों से आच्छादित सघन वन क्षेत्र बेहद लुभावना प्रतीत होता है। फूलों की सुगंध परिवेश को हमेशा खुशनुमा बनाये रखती है।

   केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली है। नई दिल्ली एयरपोर्ट से केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की दूरी करीब 184 किलोमीटर है। 
  पर्यटक आगरा एयरपोर्ट से भी केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं। निकटतम रेेलवे स्टेशन भरतपुर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
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