Thursday, 17 January 2019

एलीफेंटा गुफाएं: अद्भुत प्राचीन संरचना

   एलीफेंटा गुफाओं को भारतीय सभ्यता एवं सांस्कृतिक अतीत की सुन्दर संरचना कहा जाना चाहिए। एलीफेंटा गुफाएं वस्तुत: मुम्बई के निकट एक द्वीप पर स्थित हैं। 

   महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित एलीफेंटा गुफाएं मूर्ति संरचना की एक शानदार एवं सजीव उत्करण है।
   इस स्थान को गुफाओं के नाम से ही एलीफेंटा द्वीप के नाम से जाना पहचाना जाता है। खास यह कि इस श्रंखला को धारपुरी के नाम से भी जाना जाता है। 

   एलीफेंटा गुफाओं में असंख्य पुरातात्विक अवशेष विद्यमान हैं। इसे भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का सुन्दर आयाम भी कहा जाना चांिहए। 
  यह प्राचीन गुफाएं अपनी रॉक-कट संरचनाओं, मूर्तियों एवं नक्काशी के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। यह गुफाएं भारत का एक अति समृद्ध इतिहास है। इन गुफाओं में भगवान शिव को विभिन्न रूप एवं स्वरूपों में दर्शित किया गया है। 

   गुफाओं में शिव का सदाशिव स्वरूप दिखता है। शिव के सभी तीन पक्षों को अति सहजता एवं सुन्दरता से प्रदर्शित किया गया है। 
  इनमें खास तौर से शिव को निर्माता, संरक्षक एवं विध्वंसक स्वरूप में दर्शित किया गया है।

  खास यह कि इसकी संरचना बेहद जटिल एवं सुन्दर है। एलिफेंटा गुफाएं ठोस बेसाल्ट चट्टानों पर उत्कीर्ण हैं। यह गुफा मुम्बई की पूर्व दिशा में करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित हैं। एलीफेंटा गुफाओं की ख्याति वैश्विक स्तर पर है। 

   पौराणिक देवी-देवताओं एवं आराध्य की सुन्दर एवं दिव्य-भव्य मूर्तियां यहां प्रतिष्ठापित हैं। इन मूर्तियों में सर्वाधिक लोकप्रिय शिव की त्रिमूर्ति है। 
  मूर्ति संरचना के यहां इन्द्रधनुषी रंग दिखते हैं। खास यह कि एलिफेंटा गुफाएं वैश्विक पर्यटकों के विशेष आकर्षण का केन्द्र हैं। 

   यह स्थान एलीफेंटा की 7 गुफाओं का संगमन है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण महेश मूर्ति गुफा है। एलीफेंटा की यह पहाड़ी शैलोत्कीर्ण है। जिसमें उमा महेश गुहा मंदिर है।
   इसकी संरचना करीब 8वीं शताब्दी की है। हालांकि एलीफेंटा एक छोटा सा द्वीप है लेकिन इस द्वीप की ख्याति वैश्विक स्तर पर है।

   करीब 7.2 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला यह शानदार एवं सुन्दर द्वीप बेहद दर्शनीय है। वस्तुत: इस द्वीप पर दो पहाड़ियां हैं। इन दोनों पहाड़ियों के मध्य एक अति संकीर्ण घाटी है।
   विशेषज्ञों की मानें तो इस अति प्राचीन द्वीप का प्राचीन नाम धारापुरी है। चूंकि यह द्वीप एलीफेंटा गुफाओं से ख्याति रखता है। 

   लिहाजा अब इसे एलीफेंटा द्वीप कहा जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो इसे कभी द्वीप पोरी एवं पुरी के नाम से भी प्रसिद्धि हासिल थी। इन पहाड़ियों के पाश्र्व एवं आंतरिक क्षेत्र में संरचना की गयी है।
   चट्टानों को तराश कर पांच गुफाओं की वृहद संरचना की गयी है। इन पांच गुफाओं की विशिष्टता अलग ही दर्शनीयता रखती हैं। 

   खास यह कि दो गुफाएं लघु स्वरूप में है। इस प्रकार यहां कुल 7 गुफाएं हैं। खास यह कि इन पांच गुफाओं को शैव गुफाएं माना जाता है। 
  कुछ बौद्ध स्तूप एवं टीले भी हैं। यह गुफाएं हिन्दू दर्शन, बौद्ध दर्शन के साथ साथ प्रतिमाएं विज्ञान का समन्वयन भी दर्शाती हैं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो शिव की मूर्तियां एवं अन्य समस्त संरचनाएं गुप्तकालीन हैं। विशेषज्ञों की मानें तो यह क्षेत्र कभी कोंकणी मौर्य की द्वीप राजधानी था। 
   प्राचीन काल में पुर्तगालियों का भी यहां आधिपत्य रहा है। राजघाट पर हाथी की विशाल मूर्ति अवस्थित है। शायद इसी कारण इसे एलीफेंटा गुफाओं एवं द्वीप का नाम दिया गया है। 

   एलीफेंटा गुफाओं की कलात्मकता अति दर्शनीय है। मुम्बई के गेटवे आफ इण्डिया से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित एलीफेंटा गुफाओं की संरचना वैश्विक पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। 
  एलीफेंटा द्वीप पर पर्यटकों को प्राकृतिक सौन्दर्य शास्त्र का अध्ययन कराने के लिए पर्यटन रेल भी संचालित है। जिससे पर्यटक द्वीप पर घूम कर प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द ले सकते हैं। 

   एलीफेंटा गुफाओं की विशिष्टताओं एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर श्रंखला में शामिल किया है। वर्ष 1987 में यूनेस्को ने गुफाओं को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था।
   खास यह कि यह स्थान शिव मंदिरों की श्रंखला से आच्छादित है। गुफाओं की नक्काशी हिन्दू पौराणिक कथाओं का सजीव वर्णन एवं चित्रण करती हैं।
   एक विशाल शिलाखण्ड पर त्रिमूर्ति सदाशिव संरचित हैं। नृत्य करते भगवान नटराज एवं योग करते शिव योगीश्वर के रूप में विद्यमान हैं।
   विशेषज्ञों की मानें तो 1970 के दशक में इसे स्मारक घोषित किया गया। एलीफेंटा गुफाओं का रखरखाव एवं संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। गुफाओं की विशेषता पर्यटकों को खुद-ब-खुद आकर्षित करती है।
   एलीफेंटा गुफाओं की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट छत्रपति शिवाजी इण्टरनेशल एयरपोर्ट मुम्बई है। निकटतम रेलवे स्टेशन छत्रपति शिवाजी टर्मिनल रेलवे स्टेशन एवं लोकमान्य तिलक टर्मिनल रेलवे स्टेशन हैं। पर्यटक सड़क मार्ग से भी एलीफेंटा गुफाओं की यात्रा कर सकते हैं।
19.135000,72.793440

Friday, 11 January 2019

बेसिलिका बोम जीसस चर्च: अद्भुत संरचना

   बेसिलिका बोम जीसस चर्च की सुन्दरता का कोई जोड़ नहीं। बेसिलिका बोम जीसस चर्च के शिल्प सौन्दर्य एवं स्थापत्य कला को अद्भुत कहा जाना चाहिए। 

   जी हां, गोवा का यह चर्च अति प्राचीन एवं बेहद दर्शनीय है। विलक्षण स्थापत्य कला, शिल्प सौन्दर्य एवं वास्तुकला की शानदार संरचना बेसिलिका बोम जीसस चर्च को यूनेस्को ने विश्व धरोहर श्रंखला में शामिल किया है।

   विश्व विरासत सूची की यह संरचना वैश्विक पर्यटकों की अति पसंदीदा है। खास तौर के गोवा के प्रमुख पर्यटन स्थल में बेसिलिका बोम जीसस चर्च को शीर्ष पर गिना जाता है। भारत के गोवा में स्थित यह चर्च देश का पहला बेसिलिका है।

  विशेषज्ञों की मानें तो यह चर्च देश का सर्वाधिक लोकप्रिय चर्च है। ईसाई धर्म में बेसिलिका बोम जीसस चर्च मील का पत्थर है।
   विशेषज्ञों की मानें तो बोम जीसस का शाब्दिक अर्थ पवित्र जीसस है। इसे भारत में बारोक वास्तुकला का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है।

  पुराने गोवा स्थित इस चर्च की संरचना बेहद विहंगम है। चर्च का निर्माण 1594 में प्रारम्भ हुआ था। चर्च को बनाने में करीब 11 वर्ष का समय लगा था।
   सर्वप्रथम इसे 1605 में आर्कबिशप डोम फ्रा ने संरक्षित किया था। ईसाई धर्म के इतिहास में यह चर्च बेसिलिका बोम जीसस चर्च विश्व धरोहर के तौर पर उभरा। 

   विशेषज्ञों की मानें तो सेंट फ्रांसिस जेवियर का अंश इसमें शामिल है। सेंट का मुख्य स्थान बेसिलिका बोम जीसस चर्च ही था।
   हालांकि फ्रांसिस जेवियर की मृत्यु सैंसियन द्वीप पर हुयी थी। इस संत के अवशेष आज भी देश दुनिया को आकर्षित करते हैं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो संत को चिकित्सा विज्ञान का चमत्कार कहा जाता है। इसे चमत्कारिक शक्तियां भी माना जाता है।

  भारत के गोवा स्थित इस अति प्राचीन चर्च बेसिलिका बोम जीसस चर्च की सुन्दर संरचना पर्यटकों को मुग्ध कर लेती है। संगमरमर का शानदार फर्श बेशकीमती माना जाता है। 

   चर्च का आंतरिक क्षेत्र बेहद सुसज्जित एवं आकर्षक है। बारोक शैली को रेखांकित करने वाले इस चर्च की मुख्य वेदी को स्वर्ण अंश बेहद सुन्दर बना देता है। इसके अलावा लोयोला के इग्नाटियस पर सोने का पानी चढ़ा है। 

   चर्च में हाय मोजी कुड शब्द से अलंकृत परिवेश बेहद शांत रहता है। हाय मोजी कुड का कोंकडी में अर्थ होता है कि मेरा शरीर है।
   बेसिलिका बोम जीसस चर्च खास तौर से सेंट फ्रांसिस जेवियर के जीवन संघर्ष को रेखांकित करता है। 

  समाधि स्थल के शीर्ष पर चांदी का ताबूत रखा है। विशेषज्ञों की मानें तो सेंट का शरीर 1696 में रखा गया था। खास यह कि बेसिलिका बोम जीसस चर्च के एक हिस्से में बेसिलिका बोम आर्ट गैलरी है। 

   जिस पर गो मार्टिन के चित्रकार ने कार्य किया था। चार सौ से अधिक वर्ष पुराना यह चर्च पर्यटकों को ईसाई धर्म के हर पवित्र आयाम का दर्शन कराता है। विशेष यह कि बेसिलिका बोम जीसस चर्च पर सेंट की स्मृति में प्रदर्शनी आयोजित की जाती है।

  इसमें चर्च के आंतरिक क्षेत्र के सुन्दर छवियां भी शामिल होती हैं। यह भित्ति चित्र दर्शकों-पर्यटकों को बेहद लुभाते हैं।
    बेसिलिका बोम जीसस चर्च की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पणजी एयरपोर्ट है।
  एयरपोर्ट से बेसिलिका बोम जीसस चर्च की दूरी करीब 10 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी बेसिलिका बोम जीसस चर्च की यात्रा कर सकते हैं।
15.299326,74.123993

Monday, 7 January 2019

चंपानेर-पावागढ़: अद्भुत स्थापत्य कला

    चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क की स्थापत्य कला एवं सौन्दर्य शास्त्र का कोई जोड़ नहीं। किला एवं स्मारकों का यह इलाका चंपानेर-पावागढ़ विरासत स्थल अति दर्शनीय है। 

   गुजरात के पंचमहल जिला स्थित चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क भारत सहित दुनिया भर में अपनी विशिष्ट ख्याति रखता है। 
  खास यह कि चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क के आसपास पंचमहल शहर का फैलाव है। स्थापत्य कला का यह अद्भुत संगम वैश्विक स्तर पर विशेष ख्याति रखता है। 

   विशिष्टताओं के कारण यूनेस्को ने चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क को विश्व धरोहर श्रंखला में शामिल किया है। यूनेस्को ने इसे 2004 में वैश्विक धरोहर घोषित किया था।
   विशेषज्ञों की मानें तो चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क को एक शहर के तौर पर गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने विकसित किया था।

  यह विरासत स्थल पावागढ़ की पहाड़ियों से चौतरफा घिरा हुआ है। किला एवं स्मारकों की एक लम्बी श्रंखला वाला चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क पुरातात्विक, ऐतिहासिक, पौराणिक एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो यह एक प्रारंभिक हिन्दू राजधानी है। यह एक पहाड़ी क्षेत्र है। खास यह कि चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क के मध्य में शानदार महल है।
   चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क में शानदार प्रवेश द्वार, मेहराब दार निर्माण, मस्जिद-मकबरा, मंदिर, आवासीय संरचना एवं कृषि आधारित संरचनाएं हैं। 

   दिव्य-भव्य जलाशय चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क की शान एवं शोभा हैं। समुद्र तल से करीब 800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क समृद्ध स्थापत्य कला की शानदार संरचना है। 
   खास यह कि पावागढ़ पर्वत के शिखर पर कालिका देवी का दिव्य-भव्य मंदिर है। इस तीर्थ पर भव्य मेला का भी आयोजन होता है।

    विशेषज्ञों की मानें तो चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क में 15वीं से 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति एवं वास्तुकला का अद्भुत संगमन दिखता है। चंपानेर-पावागढ़ विरासत स्थल करीब 2328 हेक्टेयर में फैला है।

  इस विश्व धरोहर स्थल में विशिष्टताओं की एक लम्बी श्रंखला है। इसमें हेरिटेज जोन सहित बहुत कुछ विशिष्ट है। 
   इनमें खास तौर से कबूतरखाना, मकबरा, मकबरा मांडवी, पाटीदार गांव, हाथीखाना, सिंध माता, सिकंदर का रेउना, बबन की दरगाह, नौ कुंआ सत बबडी आदि इत्यादि हैं। 

    बड़ौदा से करीब 50 किलोमीटर एवं गोधरा से करीब 68 किलोमीटर दूर स्थित चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क में राजपूताना धार्मिक स्मारक श्रंखला विद्यमान है। लाल-पीले पत्थरों की यह संरचना बेहद दर्शनीय है। 

   भू-विज्ञान की इस संरचना का अपना एक अलग ही अंदाज है। इसे भारत की सबसे पुरानी रॉक संरचनाओं में से एक माना जाता है।
   पहाड़ी का सबसे प्राचीन एवं ऊंचा स्थान जम्बुघोड़ा माना जाता है। सीढ़ीदार पत्थरों की प्राकृतिक चट्टानों का संगमन एक शानदार दृश्य अवलोकित होता है।

  विशेषज्ञों की मानें तो चंपानेर नाम चंपा से लिया गया है। चंपानेर पर कई शासकों ने शासन किया था। चौहान एवं गुर्जर राजवंश का शासन भी यहां रहा। 
   सैकड़ों वर्ष गुजर जाने के बाद भी चंपानेर-पावागढ़ विरासत स्थल का सौन्दर्य शास्त्र जीवंत है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे पत्थर अभी बोल उठेंगे। दीवारों पर सजीव चित्रण बरबस पर्यटकों को आकर्षित करता है। 

   परिसर में मखमली घास के हरे-भरे लॉन-मैदान पर्यटकों को लुभाते हैं। वस्तुत: चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क स्थापत्य कला एवं संस्कृति की वैश्विक धरोहर है। 
  देखें तो चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क एक जीवंत राजधानी है। जिसमें धर्म-संस्कृति, महल-किला, दैनिक जीवन का प्रतिबिंबन आदि इत्यादि बहुत कुछ दिखता है।

   चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अहमदाबाद एयरपोर्ट है।
   निकटतम रेलवे स्टेशन चंपानेर रोड है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क की यात्रा कर सकते हैं।
22.466990,73.523920

Friday, 4 January 2019

पर्वतीय रेल: रोमांचक एहसास

   भारत की पर्वतीय रेल के सफर को रोमांचक कहा जाना चाहिए। जी हां, भारतीय पर्वतीय रेल का सफर पर्यटन के रोमांच एवं आनन्द को दोगुना कर देता है। 

   शायद इसी विशिष्टता के कारण भारतीय पर्वतीय रेलवे को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है। भारत में पर्वतीय पर्यटन का आनन्द प्रदान करने के लिए मुख्य रूप से चार पर्यटन क्षेत्रों में पर्वतीय रेलवे संचालित हैं। 
  इनमें खास तौर से दार्जिलिंग हिमालयी रेल, नीलगिरि पर्वतीय रेल, कालका-शिमला रेलवे एवं माथेरान हिल रेलवे हैं। 

   खास यह कि यह सभी विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा हैं। खास तौर से देखें तो भारतीय रेलवे पर्यटकों को प्राकृतिक सौन्दर्य का हर आयाम दर्शनीय बना देती है। दार्जिलिंग पर्वतीय रेल पश्चिम बंगाल के प्राकृतिक सौन्दर्य का रोमांचक दर्शन कराती है। 

   वस्तुत: उत्तर बंगाल धरती का सुन्दर हिस्सा है। फन टॉय ट्रेन, खूबसूरत चाय के बागान, लम्बी सुरंग, टाइगर हिल्स सहित बहुत कुछ दर्शनीय एवं रोमांचक है। पर्वतीय रेल को वस्तुत: इंजीनियरिंग का चमत्कार कहा जाना चाहिए। 

   कारण यह पर्वतीय रेल सुरम्य एवं शांत प्राकृतिक सौन्दर्य एवं भारत की विरासत का विहंगम दर्शन कराती है। यह सब कुछ देखना किसी मणि की भांति प्रतीत होता है।
   इस पर्वतीय रेल का सफर रोमांटिक एवं मजेदार होता है। इस खूबसूरत ट्रेन को टॉय ट्रेन भी कहा जाता है। यह रेल न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच संचालित है।

    करीब 80 किलोमीटर लम्बी रेलवे लाइन का निर्माण 1879 से 1881 की अवधि में किया गया था। यह ट्रेन पर्यटन का अद्भुत दर्शन कराती है।
   इसमें आधुनिक इंजन का उपयोग किया जाता है। यूनेस्को ने इसे 2 दिसम्बर 1999 को विश्व धरोहर श्रंखला में शामिल किया था। 
   कालका-शिमला रेलवे भी पर्वतीय पर्यटन का शानदार सफर कराती है। खास यह कि कालका-शिमला रेलवे शानदार हिल्स का दर्शन कराती है।
   आकाश का स्पर्श करते हिम शिखर अति दर्शनीय प्रतीत होते हैं तो वहीं पर्यटक एक विशेष रोमांच का एहसास करते हैं। यह रेल शिमला के मध्य से गुजरती है। लिहाजा पर्यटक खरीददारी का भी शौक पूरा कर सकते हैं। 

   यहां के ब्रिाटिश संस्थान पर्यटकों को आकर्षित करते है। पर्यटक इस ट्रेन से सफर कर शिमला के गोथिक शैली के भवन का अवलोकन कर सकते हैं। गोथिक इमारतें यहां की शान मानी जाती हैं। कालका-शिमला रेलवे का उप हिमालयी क्षेत्र कांगड़ा घाटी भी है। 

   इस उप क्षेत्र में पठानकोट से जोगिन्दर नगर के मध्य रेल करीब 163 किलोमीटर का सफर तय करती है। इस दौरान पर्यटक प्राकृतिक सौन्दर्य, प्राचीन हिन्दू मंदिर आदि इत्यादि बहुत कुछ देख सकते हैं।
  नीलगिरि पर्वतीय रेल भी यूनेस्को की विश्व धरोहर श्रंखला में शामिल है। यह रेल सफर वर्ष 2005 में प्रारम्भ हुआ।

  इस खूबसूरत रेल सफर में पर्यटक पहाड़ों की खूूबसूरती देख सकते हैं तो वहीं मखमली घास के हरे-भरे मैदान लॉन अद्भुत दृश्य दर्शनीय हैं।
   माथेरान हिल रेलवे खास तौर से पश्चिमी घाट के नेरल एवं माथेरान के मध्य करीब 21 किलोमीटर की दूरी में संचालित है। विशेषज्ञों की मानें तो माथेरान हिल रेलवे को वर्ष 1900 में डिजाइन किया गया था।

   निर्माण कार्य करीब 1904 में पूर्ण हो सका। यह क्षेत्र केन्द्रीय रेलवे के अधीन संचालित है। खास यह कि यह रेलवे लाइन घोड़े की नाल की भांति दिखती है। यह रेल सफर में नदी को पार करती है तो कई सुरंग भी दिखते हैं।

   पर्वतीय रेलवे का आनन्द लेने के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। कालका-शिमला रेलवे का निकटतम एयरपोर्ट जुब्बारहट्टी एयरपोर्ट है।

   दार्जिलिंग हिमालयी रेल का निकटतम एयरपोर्ट बागडोगरा एयरपोर्ट सिलीगुडी है। बागडोगरा एयरपोर्ट से दार्जिलिंग की दूरी करीब 95 किलोमीटर है। माथेरान हिल रेलवे की यात्रा का निकटतम एयरपोर्ट छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट मुम्बई है। 
  नीलगिरि पर्वतीय रेल का निकटतम एयरपोर्ट कोयम्बटूर इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। इसके साथ ही पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
31.097520,77.193100

Tuesday, 1 January 2019

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी: दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा

   स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को दुनिया का दिव्य-भव्य स्मारक कहा जाना चाहिए। जी हां, भारत के गुजरात प्रांत का यह विहंगम स्मारक अद्भुत एवं अनूठा है। 

  वस्तुत: यह स्मारक देश के प्रथम उप प्रधानमंत्री एवं प्रथम गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल को समर्पित है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी स्मारक गुजरात के सरदार सरोवर बांध से करीब 3.20 किलोमीटर दूर साधु बेट नामक स्थान पर स्थित है।
  स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर देश के प्रथम गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की आदमकद प्रतिमा विद्यमान है।

    स्वर्गीय पटेल की यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की ऊंचाई 182 मीटर अर्थात 597 फुट है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की कुल ऊंचाई 240 मीटर है। इसमें प्रतिमा की ऊंचाई 182 मीटर है। इसका आधार करीब 58 मीटर ऊंचा है। 
  इस प्रकार स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की कुल ऊंचाई 240 मीटर है। वस्तुत: यह स्थान गुजरात स्थित नर्मदा नदी का एक विहंगम टापू है। नर्मदा जिला के केवड़िया स्थित विहंगम स्मारक स्टैच्यू ऑफ यूनिटी अति दर्शनीय है। 

   इस दिव्य-भव्य स्मारक को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्टूबर 2018 को इसे राष्ट्र को समर्पित किया था। 
  वैश्विक आधार पर देखें तो चीन स्थित स्प्रिंग टैम्पल बुद्ध की आधार सहित ऊंचाई 153 मीटर है। खास यह कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का कुल वजन करीब 1700 टन है। 
   विशेषज्ञों की मानें तो स्टैच्यू ऑफ यूनिटी स्वत: अद्भुत एवं विलक्षण है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण राम वी सुतार की देखरेख में किया गया है। उल्लेखनीय है कि सुतार को भारत सरकार ने 2016 में पद्म भूषण से अलंकृत किया है।
   हालांकि इसके पहले भी 1999 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया था। विशेषज्ञों की मानें तो स्टैच्यू ऑफ यूनिटी विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है। 

   ऊंचाई में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी ने दुनिया को बहुत पीछे छोड़ दिया है। खास यह कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की 153 मीटर ऊंचे दर्शक दीर्घा से स्मारक की दिव्यता-भव्यता के साथ ही आसपास का विहंगम दृश्य भी आसानी से देख सकते हैं। 
  दर्शक दीर्घा से सरदार सरोवर बांध, जलाशय, सतपुड़ा एवं विंध्य पर्वत श्रंखलाओं का मनोरम दृश्य अवलोकित होता है।

   इस प्रतिमा के आंतरिक क्षेत्र में दो हाई स्पीड लिफ्ट भी हैं। दर्शक दीर्घा पर एक साथ 200 से अधिक पर्यटकों के लिए स्थान है। सरदार पटेल संग्रहालय भी शानदार स्थल है। 
   संग्रहालय सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी घटनाओं को रेखांकित करता है। लाइट एण्ड साउण्ड शो पर्यटकों को सम्पूर्ण जानकारी एवं मनोरंजन प्रदान करता है।

   खास यह कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी गुजरात का सबसे बेहतरीन पर्यटन स्थल है। विशेषज्ञों की मानें तो स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को देखने एक दिन में 27000 से अधिक पर्यटक पहंुचे। 
  स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण पर करीब 3001 करोड़ की धनराशि खर्च की गयी।

    इस प्रकार देखें तो स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण पर 438.15 मिलियन अमेरिकी डालर खर्च हुये। खास यह कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण 5 वर्ष की अवधि में हो सका।
   विशेषज्ञों की मानें तो स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का 31 अक्टूबर 2013 को शिलान्यास किया गया था। 

  इसके पांच वर्ष बाद 31 अक्टूबर 2018 को इसे राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया। खास यह रहा कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण के लिए किसानों से लौह दान लिया गया। उल्लेखनीय है कि सरदार बल्लभ भाई पटेल लौह पुरुष भी कहा जाता है। 

   किसानों से लौह दान पुराने कृषि उपकरण, बेकार-खराब लौह वस्तुओं के रूप में लिया गया। लौह दान लेने का कार्य सरदार बल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट ने किया।
   इसके लिए देश में 36 कार्यालय खोले गये थे। लौह दान में 5 लाख किसानों ने लौह दान किया था।

   इसमें करीब 5000 मीट्रिक टन लौह संग्रहित किया गया था। हालांकि इस लोहे का उपयोग मुख्य प्रतिमा में न होकर परियोजना के अन्य कार्य में किया गया। 
   स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण में लोहा, कांस्य एवं कंक्रीट का उपयोग किया गया है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण त्रिस्तरीय है। इसमें आधार, प्रदर्शनी फ्लोर, छज्जा एवं छत आदि हैं। 

   स्मारक उपवन व विशाल संग्रहालय अति दर्शनीय है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर एक अत्याधुनिक पब्लिक प्लाजा भी है। 
  यहां से नर्मदा नदी एवं प्रतिमा आसानी से देख सकते हैं। इसकी विलक्षणता एवं दर्शनीयता को देखते हुए इसे देश का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आकर्षण कहना चाहिए।
   स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बडोदरा है। बडोदरा एयरपोर्ट से स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की दूरी करीब 90 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन बडोदरा जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की यात्रा कर सकते हैं।
21.837915,73.719055

शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...