Friday, 4 January 2019

पर्वतीय रेल: रोमांचक एहसास

   भारत की पर्वतीय रेल के सफर को रोमांचक कहा जाना चाहिए। जी हां, भारतीय पर्वतीय रेल का सफर पर्यटन के रोमांच एवं आनन्द को दोगुना कर देता है। 

   शायद इसी विशिष्टता के कारण भारतीय पर्वतीय रेलवे को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है। भारत में पर्वतीय पर्यटन का आनन्द प्रदान करने के लिए मुख्य रूप से चार पर्यटन क्षेत्रों में पर्वतीय रेलवे संचालित हैं। 
  इनमें खास तौर से दार्जिलिंग हिमालयी रेल, नीलगिरि पर्वतीय रेल, कालका-शिमला रेलवे एवं माथेरान हिल रेलवे हैं। 

   खास यह कि यह सभी विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा हैं। खास तौर से देखें तो भारतीय रेलवे पर्यटकों को प्राकृतिक सौन्दर्य का हर आयाम दर्शनीय बना देती है। दार्जिलिंग पर्वतीय रेल पश्चिम बंगाल के प्राकृतिक सौन्दर्य का रोमांचक दर्शन कराती है। 

   वस्तुत: उत्तर बंगाल धरती का सुन्दर हिस्सा है। फन टॉय ट्रेन, खूबसूरत चाय के बागान, लम्बी सुरंग, टाइगर हिल्स सहित बहुत कुछ दर्शनीय एवं रोमांचक है। पर्वतीय रेल को वस्तुत: इंजीनियरिंग का चमत्कार कहा जाना चाहिए। 

   कारण यह पर्वतीय रेल सुरम्य एवं शांत प्राकृतिक सौन्दर्य एवं भारत की विरासत का विहंगम दर्शन कराती है। यह सब कुछ देखना किसी मणि की भांति प्रतीत होता है।
   इस पर्वतीय रेल का सफर रोमांटिक एवं मजेदार होता है। इस खूबसूरत ट्रेन को टॉय ट्रेन भी कहा जाता है। यह रेल न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच संचालित है।

    करीब 80 किलोमीटर लम्बी रेलवे लाइन का निर्माण 1879 से 1881 की अवधि में किया गया था। यह ट्रेन पर्यटन का अद्भुत दर्शन कराती है।
   इसमें आधुनिक इंजन का उपयोग किया जाता है। यूनेस्को ने इसे 2 दिसम्बर 1999 को विश्व धरोहर श्रंखला में शामिल किया था। 
   कालका-शिमला रेलवे भी पर्वतीय पर्यटन का शानदार सफर कराती है। खास यह कि कालका-शिमला रेलवे शानदार हिल्स का दर्शन कराती है।
   आकाश का स्पर्श करते हिम शिखर अति दर्शनीय प्रतीत होते हैं तो वहीं पर्यटक एक विशेष रोमांच का एहसास करते हैं। यह रेल शिमला के मध्य से गुजरती है। लिहाजा पर्यटक खरीददारी का भी शौक पूरा कर सकते हैं। 

   यहां के ब्रिाटिश संस्थान पर्यटकों को आकर्षित करते है। पर्यटक इस ट्रेन से सफर कर शिमला के गोथिक शैली के भवन का अवलोकन कर सकते हैं। गोथिक इमारतें यहां की शान मानी जाती हैं। कालका-शिमला रेलवे का उप हिमालयी क्षेत्र कांगड़ा घाटी भी है। 

   इस उप क्षेत्र में पठानकोट से जोगिन्दर नगर के मध्य रेल करीब 163 किलोमीटर का सफर तय करती है। इस दौरान पर्यटक प्राकृतिक सौन्दर्य, प्राचीन हिन्दू मंदिर आदि इत्यादि बहुत कुछ देख सकते हैं।
  नीलगिरि पर्वतीय रेल भी यूनेस्को की विश्व धरोहर श्रंखला में शामिल है। यह रेल सफर वर्ष 2005 में प्रारम्भ हुआ।

  इस खूबसूरत रेल सफर में पर्यटक पहाड़ों की खूूबसूरती देख सकते हैं तो वहीं मखमली घास के हरे-भरे मैदान लॉन अद्भुत दृश्य दर्शनीय हैं।
   माथेरान हिल रेलवे खास तौर से पश्चिमी घाट के नेरल एवं माथेरान के मध्य करीब 21 किलोमीटर की दूरी में संचालित है। विशेषज्ञों की मानें तो माथेरान हिल रेलवे को वर्ष 1900 में डिजाइन किया गया था।

   निर्माण कार्य करीब 1904 में पूर्ण हो सका। यह क्षेत्र केन्द्रीय रेलवे के अधीन संचालित है। खास यह कि यह रेलवे लाइन घोड़े की नाल की भांति दिखती है। यह रेल सफर में नदी को पार करती है तो कई सुरंग भी दिखते हैं।

   पर्वतीय रेलवे का आनन्द लेने के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। कालका-शिमला रेलवे का निकटतम एयरपोर्ट जुब्बारहट्टी एयरपोर्ट है।

   दार्जिलिंग हिमालयी रेल का निकटतम एयरपोर्ट बागडोगरा एयरपोर्ट सिलीगुडी है। बागडोगरा एयरपोर्ट से दार्जिलिंग की दूरी करीब 95 किलोमीटर है। माथेरान हिल रेलवे की यात्रा का निकटतम एयरपोर्ट छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट मुम्बई है। 
  नीलगिरि पर्वतीय रेल का निकटतम एयरपोर्ट कोयम्बटूर इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। इसके साथ ही पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
31.097520,77.193100

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