Sunday, 30 September 2018

नालन्दा महाविहार: बौद्ध धर्म की धरोहर

   नालन्दा महाविहार को बिहार का श्रेष्ठतम पर्यटन केन्द्र कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, बिहार का नालन्दा महाविहार अपने प्राचीन इतिहास के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 

    बिहार शरीफ जिला स्थित नालन्दा विश्वविद्यालय वैश्विक धरोहर की श्रेणी में गिना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो नालन्दा विश्वविद्यालय दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था। दुनिया के असंख्य देशों से छात्र अध्ययन के लिए नालन्दा आते थे। खास यह कि नालन्दा विश्वविद्यालय के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

   विशेषज्ञों की मानें तो 14 हेक्टेयर क्षेत्रफल में नालन्दा विश्वविद्यालय के अवशेष मिले थे। नालन्दा विश्वविद्यालय की सभी इमारतों का निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से किया गया था।
   विश्वविद्यालय परिसर दक्षिण-उत्तर दिशा की ओर निर्मित है। मठ एवं विहार पूर्व दिशा में अवस्थित हैं। परिसर की मुख्य इमारत में बिहार 1 थी। वर्तमान में यहां दोमंजिला इमारत निर्मित है।

   विलक्षणताओं एवं विशेषताओं के कारण नालन्दा विश्वविद्यालय को यूनेस्को ने विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है। भगवान गौतम बुद्ध एवं भगवान महावीर कई बार नालन्दा विश्वविद्यालय में ठहरे थे। 
   विशेषज्ञों की मानें तो भगवान महावीर ने मोक्ष की प्राप्ति नालन्दा स्थित पावापुरी में की थी। खास यह कि नालन्दा विश्वविद्यालय को नालन्दा महाविहार भी कहा जाता है। परिसर में विश्वविद्यालय के अवशेष, संग्रहालय, नव नालन्दा महाबिहार, ह्वेनसांग मेमोरियल हाल दर्शनीय है। 

   नालन्दा महाविहार एवं आसपास दर्शनीय एवं पर्यटन स्थलों की एक लम्बी श्रंखला है। इनमें खास तौर से राजगीर, पावापुरी, गया एवं बोध गया आदि इत्यादि हैं। 
   विशेषज्ञों की मानें तो नालन्दा विश्वविद्यालय अर्थात नालन्दा महाविहार के अवशेष की खोज अलेक्जेंडर कर्निघंम ने की थी। पांचवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक इसे बौद्ध शिक्षा केन्द्र के तौर पर वैश्विक स्तर पर जाना-पहचाना जाता था। 

   दुनिया के इस पहले आवासीय अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में 10000 से अधिक छात्र यहां रह कर शिक्षा ग्रहण करते थे। दुनिया की कई नामचीन हस्तियो ने नालन्दा में रह कर शिक्षा हासिल की थी। विशेष यह कि 2000 से अधिक शिक्षक यहां रह कर छात्रों को शिक्षा देते थे।
   यहां आने वाले बौद्ध यात्रियों की संख्या भी अच्छी रहती थी। गुप्त राजवंश ने प्राचीन कुषाण वास्तुशैली के इन मठ एवं अन्य सम्पदाओं को अपेक्षित संरक्षण दिया था। 
   सम्राट अशोक एवं हर्षवर्धन ने नालन्दा महाविहार में सबसे अधिक मठ, विहार एवं मंदिरों का निर्माण कराया था। पुरातात्विक विभाग के द्वारा यहां की गयी खुदाई से पुरातात्विक संरचनाओं की जानकारी मिलती है।
   करीब 800 वर्षों तक नालन्दा ज्ञान का क्षेत्र रहा। वैदिक शिक्षा के लिए नालन्दा विश्व में जाना पहचाना गया। छठ पूजा के लिए प्रसिद्ध सूर्य मंदिर भी यहां से कुछ दूर पर स्थित है। 

   नालन्दा पुरातात्विक संग्रहालय: नालन्दा पुरातात्विक संग्रहालय विश्वविद्यालय परिसर की विपरीत दिशा में स्थित है। इस संग्रहालय में खुदाई से प्राप्त अवशेषों को प्रदर्शित किया गया है। 
  इसमें भगवान गौतम बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं, आकार-प्रकार की मूर्तियों का अच्छा एवं समृद्ध संग्रह है। बुद्ध की टेराकोटा मूर्तियों बेहतरीन संग्रह है। संग्रहालय में तांबे की प्लेट, पत्थर पर अंकित अभिलेख, प्राचीन सिक्के, बर्तन एवं अन्य बहुत कुछ प्रदर्शित है। 
   नव नालन्दा महाविहार: नव नालन्दा महाविहार एक शिक्षा संस्थान है। इसमें पाली साहित्य, बौद्ध धर्म की शिक्षा एवं अनुसंधान होता है। हालांकि यह एक नया शिक्षा संस्थान है। फिर भी इसकी ख्याति वैश्विक स्तर पर है। खास यह है कि विदेशों के छात्र यहां शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में आते हैं।
   ह्वेनसांग मेमोरियल हाल: ह्वेनसांग मेमोरियल हाल एक नव निर्मित भवन है। इस भवन का निर्माण चीन के विख्यात यात्री ह्वेनसांग की स्मृति में किया गया है। इसमें ह्वेनसांग से संबंधित वस्तुओं का प्रदर्शन एवं उनकी मूर्ति स्थापित है। 

   सिलाव: सिलाव नालन्दा एवं राजगीर के मध्य स्थित है। सिलाव की मिठाई खाजा देश दुनिया में विशेष तौर पर प्रसिद्ध है। पर्यटक सिलाव में खाजा का स्वाद ले सकते हैं।
   सूरजपुर बड़गांव: सूरजपुर बड़गांव में भगवान सूर्य का अति प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। यहां एक भव्य-दिव्य झील भी है। यहां छठ का उत्सव खास तौर से मनाया जाता है।


   नालन्दा महाविहार की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जयप्रकाश नारायण एयरपोर्ट पटना है। पटना एयरपोर्ट से नालन्दा की दूरी करीब 89 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन नालन्दा जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी नालन्दा महाविहार की यात्रा कर सकते हैं।
25.199700,85.510040

Friday, 21 September 2018

अगरतला : समृद्ध सांस्कृतिक शहर

    अगरतला को पूर्वोत्तर भारत का एक खूबसूरत एवं सांस्कृतिक शहर कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, पूर्वोत्तर का अगरतला देश के त्रिपुरा की राजधानी है।

   इसकी सांस्कृतिक समृद्धता बेमिशाल है। मनोरंजन एवं पर्यटन की दृष्टि से भी पूर्वोत्तर भारत के इस शहर का कोई जोड़ नहीं। हरोआ नदी के किनारे रचा-बसा त्रिपुरा का यह शहर पर्यटन की दृष्टि से भी खास है। एडवेंचर के असंख्य विकल्प अगरतला में मौजूद हैं। जीव-जंतु एवं वनस्पतियों की प्रचुरता अगरतला को कुछ खास बना देती हैं। 

   लिहाजा देश-दुनिया के पर्यटकों का अगरतला आना-जाना निरंतर जारी रहता है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो अगरतला देश की अन्य प्रांतीय राजधानियों से काफी कुछ अलग है। अगरतला बंगला देश तक फैले गंगा-ब्राह्मपुत्र के मैदानी इलाके के पश्चिम में है। लिहाजा अगरतला का एक बड़ा हिस्सा पर्यावरण से आच्छादित है। शांत एवं सुसंस्कृत शहर अगरतला पर्यटकों को आकर्षित करता है। 

   अगरतला संस्कृति एवं प्राकृतिक सुन्दरता के मध्य पर्यटकों को कुछ खास ऊर्जावान बना देता है। विशेषज्ञों की मानें तो अगरतला 19 वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया। माणिक्य वंश ने अगरतला को विकसित कर अपनी राजधानी बनाया था।

   उत्तरी त्रिपुरा के उदयपुर स्थित रंगमाटी से अगरतला को राजधानी बनाया गया था। दरअसल अगरतला की परिकल्पना महाराज वीर विक्रम किशोर माणिक्य बहादुर ने की थी। शायद इसी कारण अगरतला को वीर विक्रम सिंह माणिक्य बहादुर का शहर भी कहा जाता है। 

    शायद इसी लिए अगरतला शाही सम्पदाओं से अति समृद्ध है। इनमें खास तौर से देखें तो विलक्षण सम्पदाओं की एक लम्बी श्रंखला है। इनमें खास तौर से उज्जयंता महल, नीरमहल, महाराजा वीर विक्रम कालेज, लक्ष्मी नारायण मंदिर एवं रविन्द्र कनान आदि इत्यादि बहुत कुछ है। अगरतला के हस्तशिल्प का अपना यहां एक अलग अंदाज है।  
   उज्जयंता महल: उज्जयंता महल का निर्माण महाराजा राधा किशोर माणिक्य ने वर्ष 1901 में कराया था। फिलहाल इसका उपयोग राज्य विधानसभा के तौर पर किया जाता है। इसकी सुन्दरता एवं वास्तुशिल्प देखते ही बनता है। करीब 800 एकड़ में फैला यह परिसर शहर का मुख्य स्मारक भी है। इसमें बाग-बगीचे, मानव निर्मित झीलें भी हैं। 
   नीरमहल: नीरमहल शहर से करीब 53 किलोमीटर दूर स्थित है। इस खूबसूरत एवं विलक्षण महल का निर्माण महाराजा वीर विक्रम किशोर माणिक्य ने कराया था। रुद्रसागर झील के मध्य बने इस नीरमहल में महाराजा गर्मियों में ठहरते थे। नीरमहल में मुगल एवं हिन्दू वास्तुशिल्प का सम्मिश्रित स्वरूप दिखता है। नीरमहल की ख्याति देश-दुनिया के सुन्दर वास्तुशिल्प के तौर पर है। 
   जगन्नाथ मंदिर: जगन्नाथ मंदिर अगरतला के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। जगन्नाथ मंदिर अपनी अनूठी वास्तुशिल्प शैली के लिए ख्याति रखता है। मंदिर एक अष्टभुजीय संरचना है।
    महाराजा वीर विक्रम कालेज: महाराजा वीर विक्रम कालेज का निर्माण 1947 में महाराजा वीर विक्रम सिंह ने कराया था। कालेज निर्माण के पीछे मंशा युवाओं को व्यावसायिक एवं गुणवत्तायुक्त शिक्षा का प्रबंध करना था।

   लक्ष्मी नारायण मंदिर: लक्ष्मी नारायण मंदिर हिन्दुओं के एक तीर्थ की भांति है। इसका निर्माण कृष्णानन्द सेवायत ने कराया था। इसे अगरतला के लोकप्रिय पर्यटन स्थल के तौर पर भी जाना जाता है। इसे लक्ष्मी नारायण बाड़ी भी कहा जाता है।
   रविन्द्र कनान: रविन्द्र कनान राजभवन के निकट एक अति समृद्धशाली उद्यान है। इसका उपयोग खेल मैदान के तौर पर भी होता है। शहर का यह एक आदर्श पिकनिक स्पॉट भी है।

   वेणुबन विहार : बेणुबन विहार एक दर्शनीय स्थल है। वस्तुत: यह एक बौद्ध मंदिर है। इसकी दर्शनीयता बेहद आकर्षक है।
    अगरतला की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अगरतला है। निकटतम रेलवे स्टेशन अगरतला जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी अगरतला की यात्रा कर सकते हैं।
23.833820,91.282420

Tuesday, 18 September 2018

सांची का स्तूप: वास्तुशिल्प का सौन्दर्य

   सांची का स्तूप शायद दुनिया का विलक्षण सौन्दर्य शिल्प होगा। सांची का स्तूप बौद्ध धर्म का एक अति सुन्दर एवं प्राचीन स्मारक है। यह स्तूप मध्य प्रदेश के रायसेन जिला के सांची में स्थित है।

   इसे बौद्ध धर्म का तीर्थ भी कहा जा सकता है। बेतवा नदी के किनारे स्थित यह सुन्दर वास्तुशिल्प तीसरी शताब्दी एवं सातवीं शताब्दी के मध्यकाल का है। सांची रायसेन जिला की एक नगर पंचायत है लेकिन बौद्ध धर्म के इस स्मारक ने इसे अति महत्वपूर्ण बना दिया।

   विशेषज्ञों की मानें तो शंुग वंश ने इस स्तूप को दोगना विस्तार कराया था। इसमें पाषाण शिलाओं का उपयोग किया गया। इसके गुम्बद को चपटा कर तीन छतरियों का निर्माण किया गया। यह छतरियां वर्गाकार मुंडेर के भीतर बनी हैं। इसके शिखर पर बौद्ध धर्म का प्रतीक विधि का चक्र स्थापित है। उत्तरी तोरण के उपर नक्काशीदार सजावट है। 

   इनमें महात्मा गौतम बुद्ध के जीवन की घटनाएं, दैनिक जीवन शैली आदि इत्यादि बहुत कुछ रूपांकित किया गया है। यह रेखांकन महात्मा गौतम बुद्ध के जीवन को अति सरलता से रेखांकित करता है।

   रेखांकन से बुद्ध का जीवन एवं उनकी वाणी, उनका संदेश भंली-भांति समझा जा सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो सांची सहित आसपास के अन्य स्तूप को सजाने-संवारने के लिए स्थानीय बाशिंदों ने दान भी दिया था। जिससे आध्यात्म की प्राप्ति हो सके। सांची सहित अन्य स्तूप को कोई सीधा राजसी आश्रय हासिल नहीं था।

   दान की भी विलक्षण परम्परा एवं रीति-नीति रही। दानकर्ता महात्मा गौतम बुद्ध के जीवन का कोई प्रसंग चयनित कर लेता था। उस चयन का रूपांकन कराने के बाद उसमें अपना नाम अंकित करा देता था। 
   इन पाषाण नक्काशियों में महात्मा गौतम बुद्ध को मानव आकृति में नहीं दर्शाया गया। पिता के घर का त्याग से लेकर उपदेश तक बहुत कुछ रेखांकित किया गया है। कहीं बोधि वृक्ष के नीचे चबूतरा है तो कहीं बुद्धत्व की प्राप्ति के क्षण-पल दर्शाये गये हैं। 

   सांची की दीवारों के बार्डर पर बने चित्रों में यूनानी पहनावा भी दर्शनीय है। समुद्र तल से करीब 434 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह स्तूप देश दुनिया में शिखर की ख्याति रखता है। खास यह कि सांची के स्तूपों की कलात्मकता विश्व विख्यात है। 

  स्तूप की ऊंचाई करीब 42 फुट है। ब्रिाटिश अफसर जनरल टेलर ने सांची के स्तूप की खोज की थी। जनरल ने वर्ष 1818 में सांची के इस स्तूप का उल्लेख अभिलेखों में दर्ज किया था।

   विशेषज्ञों की मानें तो जॉन मार्शल की देख रेख में स्तूपों का सुधार एवं विस्तार किया गया था। मौजूदा समय में सांची का स्तूप स्थल पर पचास से अधिक छोटे-बड़े स्मारक हैं। इनमें तीन स्तूप एवं कई मंदिर खास तौर से भव्यता-दिव्यता रखते हैं। विशिष्टताओं के कारण सांची के इस स्मारक को यूनेस्को ने वर्ष 1989 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। 

  सांची का स्तूप एक भव्य-दिव्य स्मारक है। चारों ओर हरियाली स्मारक को आैर भी आकर्षक बना देती है। सांची का स्तूप अपनी विशिष्टताओं के कारण बेहद आकर्षक है। यहां एक वृहद बौद्ध संग्रहालय भी है। 
  सांची से करीब 5 मील दूर सोनारी में भी 8 स्तूप हैं। भोजपुर के पास 37 बौद्ध स्तूप हैं। विशेषज्ञों की मानें तो सांची से पहले बौद्ध विहार भी थे। यहां एक सुन्दर सरोवर भी है। इसकी सीढ़ियां महात्मा गौतम बुद्ध के काल की मानी जाती है।

 
   सांची का स्तूप की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भोपाल है। भोपाल से सांची की दूरी करीब 52 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन सांची है। विदिशा रेलवे स्टेशन से भी पर्यटक सांची की यात्रा कर सकते हैं। पर्यटक सड़क मार्ग से भी सांची का स्तूप की यात्रा कर सकते हैं।
23.487700,77.736000

Thursday, 13 September 2018

रानी की वाव : अद्भुत वास्तुशिल्प

   रानी की वाव (बावड़ी) को कलात्मकता का अनुपम आयाम कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, गुजरात के पाटन स्थित रानी की बावड़ी की कलात्मकता देख कर कोई आश्चर्यचकित हो सकता है।

    शायद यही कारण है कि यूनेस्को ने रानी की बावड़ी को विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल किया है। इसे रानी की वाव भी कहा जाता है। रानी की बावड़ी वस्तुत: एक सुन्दर एवं आलीशान सीढ़ीदार कुंआ है। इस विश्व विरासत स्थल को देश का श्रेष्ठतम पर्यटन क्षेत्र भी माना जाता है। पर्यटन की दुनिया में रानी की बावड़ी की खास ख्याति है।

    विशेषज्ञों की मानें तो वास्तव में यह एक शानदार मंदिर का प्रतिरूप है। मंदिर का आकार-प्रकार विपरीत दिशा में होने के कारण यह एक विलक्षण संरचना दिखती है। रानी की बावड़ी का डिजाइन ऐसा है कि इसमें मंदिर का हर आयाम परिलक्षित होता है।

   खास यह कि इसमें 1500 से अधिक देवी-देवताओं की मूर्तियां-प्रतिमायें अंकित हैं। राजसी शासनकाल में पाटन गुजरात की राजधानी था। रानी की बावड़ी का निर्माण 1061 की अवधि में किया गया था। यह एक प्रेमिल स्मृति है। सोलंकी शासन के राजा भीमदेव की रानी उदयामती ने इसका निर्माण कराया था। निर्माण राजा भीमदेव की स्मृति में कराया गया था। 

  हालांकि इसका निर्माण बाद में करणदेव ने पूर्ण कराया था। सोलंकी राजवंश के संस्थापक मूलराज थे। विशेषज्ञों की मानें तो रानी की बावड़ी का ताल्लुक कभी सरस्वती नदी से था। रानी की बावड़ी करीब 64 मीटर लम्बी, करीब 20 मीटर चौड़ी तथा 27 मीटर गहरी है। रानी की बावड़ी को वास्तुकला का एक शानदार एवं सुन्दर चमत्कार कहा जा सकता है। 

   रानी की बावड़ी की दीवारों, स्तम्भों एवं अन्य आकार-प्रकार की नक्काशियों में राम, वामन, महिसासुरमर्दिनी, कल्कि, कृष्ण, नरसिंह एवं अन्य भगवान विष्णु के अवतार रूपांकित हैं। बावड़ी में नागकन्या एवं योगिनी जैसी सुन्दर कन्याओं अप्सराओं की कलाकृतियां भी हैं। बावड़ी की कलाकृतियां सुन्दर एवं अद्भुत हैं। 

   सात मंजिला यह बावड़ी मारु-गुर्जर शैली का शानदार साक्ष्य है। इसे भारतीय भूमिगत वास्तुशिल्प संरचना का अनूठा उदाहरण कहा जा सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो बावड़ी में नीचे एक छोटा सा द्वार भी है। यह द्वार सुरंग का रास्ता है। इसके अंदर करीब 30 किलोमीटर लम्बी सुरंग है। यह बावड़ी सुरंग सिधपुर गांव में निकलती है। राजसी परिवार कभी इस सुरंग का उपयोग गुप्त निकास के तौर पर करता था।

  रानी की बावड़ी में आैषधीय वनस्पतियां भी प्रतिरूपित हैं। इनका उपयोग गम्भीर बीमारियों के उपचार में किया जाता था। विशेषज्ञों की मानें तो रानी की बावड़ी बनाने का मुख्य मकसद जल संरक्षण था। राजसी शासनकाल में पाटन एवं उसके आसपास बारिश कम होती थी। लिहाजा खेतीहर उपज का संकट रहता था। इसी परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रख कर रानी उदयामती ने बावड़ी निर्माण कराने की योजना बनायी थी। शायद इसीलिए रानी की बावड़ी का ताल्लुक सरस्वती नदी से रखा गया था।

   यूनेस्को के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में जल संरक्षण के लिए रानी की बावड़ी जैसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। खास कर इसका डिजाइन बेहद दुर्लभ है। इसे राजसी परिवार का एक शानदार स्मारक कहा जा सकता है। विशेषताओं एवं दुर्लभ होने के कारण पर्यटकों का आना निरन्तर जारी रहता है।
   रानी की बावड़ी की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अहमदाबाद है। अहमदाबाद से रानी की बावड़ी पाटन की दूरी करीब 140 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन पाटन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी रानी की बावड़ी की यात्रा कर सकते हैं।
23.853200,72.131400

Sunday, 2 September 2018

बड़ा इमामबाड़ा: सुन्दर संरचना

    लखनऊ स्थित बड़ा इमामबाड़ा को कला एवं रहस्य की दुनिया का सुन्दर आयाम कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।

   उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित बड़ा इमामबाड़ा को भूल-भुलैया भी कहते हैं। इस पौराणिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर का निर्माण आसफउद्दौला ने वर्ष 1784 में कराया था। बड़ा इमामबाड़ा की कलात्मकता देखते ही बनती है। यूं कहें कि इसकी कलात्मकता का कहीं कोई जोड़ नहीं।

   विशेषज्ञों की मानें तो आसफउद्दौला ने इस दिव्य-भव्य इमारत का निर्माण अकाल राहत परियोजना के तहत कराया था। इस बेशकीमती इमारत को बनाने में भी बेशकीमती खर्च किया गया था। इसका विशाल गुम्बदनुमा हाल करीब 50 मीटर लम्बा एवं करीब 15 मीटर चौड़ा है। इसे बनाने में उस जमाने में करीब 10 लाख रुपए की धनराशि खर्च की गयी थी।

   विशेषज्ञों की मानें तो नवाब वंशज इस बेशकीमती इमारत की साज सज्जा पर सालाना 5 लाख रुपए या इससे अधिक धनराशि खर्च करते थे। खास यह कि इस बड़ा इमामबाड़ा में एक असफी मस्जिद भी है। 

   हालांकि गैर मुस्लिम को इस मस्जिद में प्रवेश की इजाजत नहीं है। मस्जिद के परिसर आंगन में दो ऊंची मीनारें हैं। दिव्यता-भव्यता एवं कलात्मकता के कारण बड़ा इमामबाड़ा को विश्व में ख्याति हासिल है। इस विश्व प्रसिद्ध इमारत में भूल-भुलैया भी है। इस भूल-भुलैया में एक गहरा कुंआ भी है।
  भूल-भुलैया में बिना गाइड नहीं जाना चाहिए। कारण रास्ता भूलने की प्रबल संभावना रहती है। लखनऊ को वस्तुत: नवाबों का शहर कहा जाता है। नवाबों ने ही इस खूबसूरत संरचना को अस्तित्व दिया था। जिसने देश विदेश में शिखर की ख्याति हासिल की है। बड़ा इमामबाड़ा मुगल-इस्लामिक वास्तुकला को प्रदर्शित करता है। 

   इमारत की शानदार एवं सुन्दर नक्काशी देख कर पर्यटक दंग रह जाते हैं। इसके वास्तुशिल्पी किफायतउल्लाह थे। किफायतउल्लाह ताजमहल के शिल्पकार के निकटतम संबंधी थे। विशेषज्ञों की मानें तो इस इमारत का निर्माण इस लिए किया गया था कि बेरोजगारों को रोजगार मिल सके। 

   बड़ा इमामबाड़ा एक अजीब कलाकृति है। यह कलाकृति सम्मोहित करने की क्षमता रखती है। दिलचस्प यह कि कक्षों के निर्माण में साफ तौर से इस्लामिक प्रभाव दिखता है। इमामबाड़ा वस्तुत: एक विहंगम आंगन की भांति है। इसके आगे एक विशाल हाल है। खास यह कि करीब 15 मीटर ऊंचाई वाले हाल में कोई स्तम्भ नहीं है। 

   यह विशाल हाल लकड़ी, लोहा एवं पत्थर की बीम से बना है। बिना किसी सहारे के खड़ी विश्व की यह सबसे बड़ी संरचना है। इस विशाल बड़ा इमामबाड़ा में तीन विशाल कक्ष हैं। इनकी दीवारों के मध्य लम्बे-चौड़े गलियारे हैं। यह गलियारे करीब 20 फुट चौड़े हैं। यह घनी एवं गहरी संरचना ही भूल-भुलैया कहलाती है। खास यह कि यहां 1000 से अधिक छोटे-छोटे रास्ते हैं। सामान्यत: यह सभी रास्ते एक जैसे दिखते हैं।

    लिहाजा पर्यटक इन रास्तों में भूल जाते हैं कि किधर जाना है। हालांकि यह सभी रास्ते अलग-अलग निकलते हैं। भूल-भुलैया की बावड़ी अर्थात कुंआ भी अति सुन्दर है। सीढ़ीदार कुंआ भी पूर्व नवाबी युग की धरोहर है।
   विशेषज्ञों की मानें तो शाही हमाम नामक यह बावड़ी गोमती नदी से ताल्लुक रखती है। विलक्षणता के कारण बड़ा इमामबाड़ा की दर्शनीयता के लिए देश विदेश के पर्यटकों का आना जाना निरन्तर लगा रहता है।
    बड़ा इमामबाड़ा की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अमौसी लखनऊ है। निकटतम रेलवे स्टेशन लखनऊ जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी बड़ा इमामबाड़ा की यात्रा कर सकते हैं।
26.842680,80.925941

शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...