रानी की वाव : अद्भुत वास्तुशिल्प
रानी की वाव (बावड़ी) को कलात्मकता का अनुपम आयाम कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, गुजरात के पाटन स्थित रानी की बावड़ी की कलात्मकता देख कर कोई आश्चर्यचकित हो सकता है।
शायद यही कारण है कि यूनेस्को ने रानी की बावड़ी को विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल किया है। इसे रानी की वाव भी कहा जाता है। रानी की बावड़ी वस्तुत: एक सुन्दर एवं आलीशान सीढ़ीदार कुंआ है। इस विश्व विरासत स्थल को देश का श्रेष्ठतम पर्यटन क्षेत्र भी माना जाता है। पर्यटन की दुनिया में रानी की बावड़ी की खास ख्याति है।
विशेषज्ञों की मानें तो वास्तव में यह एक शानदार मंदिर का प्रतिरूप है। मंदिर का आकार-प्रकार विपरीत दिशा में होने के कारण यह एक विलक्षण संरचना दिखती है। रानी की बावड़ी का डिजाइन ऐसा है कि इसमें मंदिर का हर आयाम परिलक्षित होता है।
खास यह कि इसमें 1500 से अधिक देवी-देवताओं की मूर्तियां-प्रतिमायें अंकित हैं। राजसी शासनकाल में पाटन गुजरात की राजधानी था। रानी की बावड़ी का निर्माण 1061 की अवधि में किया गया था। यह एक प्रेमिल स्मृति है। सोलंकी शासन के राजा भीमदेव की रानी उदयामती ने इसका निर्माण कराया था। निर्माण राजा भीमदेव की स्मृति में कराया गया था।
हालांकि इसका निर्माण बाद में करणदेव ने पूर्ण कराया था। सोलंकी राजवंश के संस्थापक मूलराज थे। विशेषज्ञों की मानें तो रानी की बावड़ी का ताल्लुक कभी सरस्वती नदी से था। रानी की बावड़ी करीब 64 मीटर लम्बी, करीब 20 मीटर चौड़ी तथा 27 मीटर गहरी है। रानी की बावड़ी को वास्तुकला का एक शानदार एवं सुन्दर चमत्कार कहा जा सकता है।
रानी की बावड़ी की दीवारों, स्तम्भों एवं अन्य आकार-प्रकार की नक्काशियों में राम, वामन, महिसासुरमर्दिनी, कल्कि, कृष्ण, नरसिंह एवं अन्य भगवान विष्णु के अवतार रूपांकित हैं। बावड़ी में नागकन्या एवं योगिनी जैसी सुन्दर कन्याओं अप्सराओं की कलाकृतियां भी हैं। बावड़ी की कलाकृतियां सुन्दर एवं अद्भुत हैं।
सात मंजिला यह बावड़ी मारु-गुर्जर शैली का शानदार साक्ष्य है। इसे भारतीय भूमिगत वास्तुशिल्प संरचना का अनूठा उदाहरण कहा जा सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो बावड़ी में नीचे एक छोटा सा द्वार भी है। यह द्वार सुरंग का रास्ता है। इसके अंदर करीब 30 किलोमीटर लम्बी सुरंग है। यह बावड़ी सुरंग सिधपुर गांव में निकलती है। राजसी परिवार कभी इस सुरंग का उपयोग गुप्त निकास के तौर पर करता था।
रानी की बावड़ी में आैषधीय वनस्पतियां भी प्रतिरूपित हैं। इनका उपयोग गम्भीर बीमारियों के उपचार में किया जाता था। विशेषज्ञों की मानें तो रानी की बावड़ी बनाने का मुख्य मकसद जल संरक्षण था। राजसी शासनकाल में पाटन एवं उसके आसपास बारिश कम होती थी। लिहाजा खेतीहर उपज का संकट रहता था। इसी परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रख कर रानी उदयामती ने बावड़ी निर्माण कराने की योजना बनायी थी। शायद इसीलिए रानी की बावड़ी का ताल्लुक सरस्वती नदी से रखा गया था।
यूनेस्को के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में जल संरक्षण के लिए रानी की बावड़ी जैसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। खास कर इसका डिजाइन बेहद दुर्लभ है। इसे राजसी परिवार का एक शानदार स्मारक कहा जा सकता है। विशेषताओं एवं दुर्लभ होने के कारण पर्यटकों का आना निरन्तर जारी रहता है।
रानी की बावड़ी की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अहमदाबाद है। अहमदाबाद से रानी की बावड़ी पाटन की दूरी करीब 140 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन पाटन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी रानी की बावड़ी की यात्रा कर सकते हैं।
23.853200,72.131400
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