Thursday, 28 June 2018

पिंक सिटी जयपुर : लाजवाब सुन्दरता

   राजस्थान के जयपुर को दुनिया के खूबसूरत शहर का दर्जा हासिल है। पिंक सिटी जयपुर का कोना-कोना वास्तु शास्त्र की सुन्दरता से आलोकित है। जयपुर शहर में दाखिल होते ही सुन्दरता का एहसास होने लगता है। सुन्दर नक्काशी, मोहक वास्तुशिल्प एवं गुलाबी-लाल पत्थरों से गठित सरंचनाओं की श्रंखला निश्चय ही मुग्ध कर देती हैं।

    राजस्थान की राजधानी गुलाबी शहर जयपुर को 1727 में राजा सवाई जय सिंह ने बसाया था। देश के प्राचीन एवं सुन्दर शहर के वास्तुशिल्पी विद्याधर भट्टाचार्य थे। 
     इस शाही एवं गुलाबी शहर में प्रवेश करते ही प्रतीत होता है कि जैसे राजा-रजवाड़ों के शहर में दाखिल हुये हों। हवेलियों, किलों एवं स्मारकों के इस शहर में सौन्दर्य की इन्द्रधनुषी छटा दिखती है। जयगढ़ का किला हो या तारामण्डल या फिर गुड़ियाघर सभी आकर्षण का केन्द्र हैं। सुन्दरता एवं प्राचीनता के साथ साथ यहां की बोली बानी लुभावनी है। 

   जयपुर में सुन्दर एवं आकर्षक स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है। खास तौर से सिटी पैलेस, जंतर मंतर, हवा महल, गोविन्द देव जी मंदिर, सरगासूली, रामनिवास बाग, गुड़ियाघर, तारामण्डल, गलताजी, जैन मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, स्टैच्यू सर्किल, पुराना शहर, जयगढ़ किला, सांगानेर, रामगढ़ झील, माधोगढ़ आदि बहुत कुछ हैं। 

   सिटी पैलेस : सिटी पैलेस को शहर की शान कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। राजस्थानी एवं मुगल शैली की समिश्रित यह सरंचना अति सुन्दर है। राजघराने का यह पूर्व शाही निवास शहर के मध्य में स्थित है। 
    संगमरमर के स्तम्भों पर टिके नक्काशीदार मेहराब, सोना एवं रंगीन पत्थरों की फूलों वाली आकृतियों से अलंकृत संरचना अति आकर्षक प्रतीत होती है। 
    पैलेस का संग्रहालय अति समृद्धता वाला है। राजस्थानी परिधानों, मुगलों एवं राजपूतों के हथियारों का अद्भुत संग्रह है। विभिन्न रंगों एवं तराशी मूठ वाली तलवारों का विलक्षण संग्रह यहां प्रदर्शित है। मीनाकारी एवं जड़ाऊ जवाहरातों से अलंकृत तलवारे बेहद लुभावनी प्रतीत होती है। महल में कलादीर्घा भी है। कलादीर्घा में लघुचित्रों, कालीनों, शाही साज-ओ-सामान एवं दुर्लभ खगोल विज्ञान की संरचनाओं उत्कृष्ट संग्रह है। 

   जंतर मंतर : जंतर मंतर सिटी पैलेस से कुछ ही दूरी पर स्थित है। यह पत्थर की वेधशाला है। राजा जय सिंह की 5 वेधशालाओं में यह सबसे विशाल है। इसके विलक्षण यंत्र, आकार एवं विन्यास वैज्ञानिक तौर तरीके से तैयार किये गये हैं।
    इनमें सबसे प्रभावशाली यंत्र रामयंत्र है। इसका उपयोग ऊंचाई मापन के लिए किया जाता है। तारों की गणना करने वाले कई उपकरण यहां हैं।
     हवा महल : हवा महल जयपुर की पहचान है। छत्तेदार बलुआ पत्थर की खिड़कियों से सुसज्जित यह महल शाही परिवार की महिलाओं के लिए था। इस महल की संरचना ऐसी है कि भवन के अंदर से बाहर देखा जा सकता है लेकिन बाहर से अंदर नहीं देखा जा सकता।
     गोविन्द देवजी का मंदिर : गोविन्द देवजी का मंदिर मुख्यत: भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। बिना शिखर का यह मंदिर जयपुर में खास तौर से प्रसिद्ध है। विशेषज्ञों की मानें तो गोविन्द जी की यह प्रतिमा वृंदावन के मंदिर में स्थापित थी। इसे सवाई जय सिंह ने अपने परिवार के देवता के रूप में यहां पुर्नस्थापित किया था।
    सरगासूली : सरगासूली त्रिपोलिया बाजार के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। गगनचुम्बी सरगासूली का निर्माण 1749 में सवाई ईश्वरी सिंह ने विजय स्मारक के तौर पर बनवाया था।
    राम निवास बाग : राम निवास बाग एक बहुआयामी उद्यान है। इसमें चिड़ियाघर, दरबा, पौधघर, वनस्पति संग्रहालय आदि बहुत कुछ है। सवाई राम सिंह ने इसे 1865 में बनवाया था। यह भारतीय वास्तुशिल्प शैली का परिष्कृत उदाहरण है। इसमें उत्कृष्ट मूर्तियों, चित्रों, सुसज्जित बर्तन, प्राकृतिक विज्ञान, इजिप्ट की ममी एवं फारस की कालीनों की एक लम्बी श्रंखला है।
     गुड़िया घर : गुडिया घर पुलिस स्मारक के निकट स्थित है। इसमें सुन्दर एवं बेहतरीन गुड़ियों की एक लम्बी श्रंखला प्रदर्शित हैं।
      बी एम बिड़ला तारामण्डल : बी एम बिड़ला तारामण्डल अनेक अत्याधुनिक संसाधनों से युक्त है। इसमें कम्प्युटरीकृत प्रक्षेपण व्यवस्था से श्रव्य एवं दृश्य शिक्षा एवं मनोरंजन के साधन की अनोखी व्यवस्था है।
     गलताजी : गलताजी एक अति प्राचीन तीर्थस्थल है। बाग-बगीचों एवं पर्वत श्रंखलाओं से आच्छादित यह क्षेत्र बेहद आकर्षक है। मंदिर, मण्डप, पवित्र कुण्ड आदि की उपस्थित परिसर को आकर्षक बना देती है। उच्चतम शिखर पर बना सूर्य देव का मंदिर मुख्य आकर्षण है।
      इसी तरह जयपुर शहर की आन-बान-शान माने जाने वाली संरचनाओं की एक लम्बी श्रंखला है। इनमें खास तौर से जैन मंदिर, मोती डंूगरी एवं लक्ष्मी नारायण मंदिर, स्टैच्यूू सर्किल, गैटोर, आमेर, शीतला माता मंदिर, जयगढ़ दुर्ग, सांगानेर, बगरू, रामगढ़ झील, सामोद, बैराठ, सांभर झील, जयसिंह पुरा खोर एवं माधोगढ़ आदि हैं।
     गुलाबी शहर जयपुर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जयपुर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन जयपुर जंक्शन है। इसके अलावा पर्यटक सड़क मार्ग से भी जयपुर की यात्रा कर सकते हैं। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से जयपुर की दूरी करीब 260 किलोमीटर है।
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Friday, 22 June 2018

अहमदाबाद : वैश्विक धरोहर शहर

     गुजरात के अहमदाबाद शहर की अपनी एक अलग पहचान है क्योंकि अहमदाबाद अब वैश्विक धरोहर का दर्जा हासिल कर चुका है।

   समुद्र तल से करीब 175 फुट की ऊंचाई पर बसा यह शहर पर्यटन की दृष्टि से कुछ खास भी है। मुख्यत: यहां दो सुन्दर झीलें हैं। 
   इनके अलावा साबरमती आश्रम, हाथीसिंह जैन मंदिर, जामा मंदिर, रानी सिपरी मस्जिद एवं साबरमती तट आदि बहुत कुछ है। खास यह भी है कि अहमदाबाद देश का सातवां प्रमुख एवं शीर्ष शहर है। साबरमती नदी के किनारे बसा यह शहर 600 वर्ष से भी अधिक पुराना है। 

    इस शहर की बुनियाद 1411 में पड़ी थी। शहर का नाम सुल्तान अहमद शाह पर पड़ा था। गुजरात की राजधानी गांधी नगर होने से पहले प्रदेश की राजधानी अहमदाबाद थी।
   अहमदाबाद को कर्णावती के नाम से भी जाना जाता था। इसी शहर में महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम की स्थापना की थी। स्वाधीनता संघर्ष के असंख्य आंदोलन यहां से प्रारम्म हुये। ऊन की बुनाई के लिए खास तौर से अहमदाबाद की प्रसिद्धि है। विशेष यह है कि अहमदाबाद व्यापारिक एवं वाणिज्यिक शहर के तौर पर देश दुनिया में जाना पहचाना जाता है। 
   खास यह है कि अहमदाबाद की अधिसंख्यक आबादी सूती वस्त्र उद्योग एवं अन्य लघु उद्योग पर आश्रित है। खास यह है कि अहमदाबाद एक ऐसा शहर है, जहां आधुनिक एवं पौराणिक बहुत कुछ है। स्वच्छता में अहमदाबाद देश में अव्वल है। 
    यूनेस्को ने अहमदाबाद को वल्र्ड हेरिटेज सिटी का दर्जा दिया है। शायद यह एक बड़ी बात है कि देश के किसी शहर को वल्र्ड हेरिटेज सिटी का खिताब मिला हो। अहमदाबाद को यह गौरव हासिल है। 

  कांकरिया झील : कांकरिया झील का निर्माण कुतबुद्दीन ने कराया था। हालात यह है कि यह झील अहमदाबाद की सुन्दरता का आइना है। यूं कहें कि कांकरिया झील अहमदाबाद की शान है।
    स्थानीयता की दृष्टि से देखें तो कांकरिया झील एक सुन्दर पिकनिक स्पॉट है। इस झील के चारों ओर सुन्दर बगीचा है। झील के मध्य में एक सुन्दर द्वीप महल है।विशेषज्ञों की मानें तो मुगलकाल में नूरजहां व जहांगीर अक्सर घूमने आया करते थे।
     हाथीसिंह जैन मंदिर : हाथीसिंह जैन मंदिर की खासियत इसकी सुन्दर एवं शानदार नक्काशी है। सफेद संगमरमर से बना यह मंदिर सुन्दरता का आयाम है। हाथीसिंह जैन मंदिर अहमदाबाद के प्रमुख मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण 19 वीं शताब्दी में रिचजन मर्चेंट्स ने किया था। इस मंदिर को उन्होंने जैन धर्म के 15 वें गुरु धर्मनाथ को समर्पित किया था।
   जामा मस्जिद : जामा मस्जिद का निर्माण ईसवी 1423 में किया गया था। पश्चिम भारत की यह अति खूबसूरत मस्जिद है। मस्जिद खूबसूरत कारीगरी का शानदार उदाहरण है। इसकी सुन्दरता का कोई जोड़ नहीं है।
    रानी सिपरी मस्जिद : रानी सिपरी मस्जिद शहर की एक अन्य खूवसूरत मस्जिद है। इस सुन्दर मस्जिद का निर्माण महमूद शाह बेगड़ा की रानी ने 1514 ईसवी में कराया था। विशेषज्ञों की मानें तो रानी की मृत्यु होने के बाद उनके शव को यहीं दफनाया गया था।
       साबरमती आश्रम : साबरमती आश्रम की स्थापना महात्मा गांधी ने की थी। महात्मा गांधी ने इसी आश्रम से दांडी यात्रा प्रारम्भ की थी। दांडी यात्रा स्वाधीनता आंदोलन का एक हिस्सा था। यह एक सत्याग्रह था। इसके अलावा मुख्य तौर पर यहां से स्वाधीनता आंदोलन की नींव रखी गयी।
    केलिको संग्रहालय : केलिको संग्रहालय में प्राचीनकाल एवं आधुनिककाल की बुनाई की कारीगरी को बेहतरीन ढ़ंग से प्रदर्शित किया गया है। खास यह कि इस संग्रहालय में प्राचीन बुनाई एवं सिलाई मशीनें प्रदर्शित हैं। संग्रहित एवं प्रदर्शित वस्तुएं मुख्यत: 17 वीं शताब्दी से पूर्व की हैं। इसके अलावा यहां बुनाई से संबंधित पुस्तकालय भी है।
     इस हेरिटेज सिटी अहमदाबाद की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सरदार बल्लभभाई पटेल एयरपोर्ट अहमदाबाद है। अहमदाबाद में रेलवे स्टेशन भी है। सड़क मार्ग से भी अहमदाबाद की यात्रा की जा सकती है।
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Tuesday, 19 June 2018

आमेर दुर्ग : राजपूताना शैली का वास्तुशिल्प

  आमेर दुर्ग को वास्तुशिल्प का इन्द्रधनुषी आयाम कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। कलात्मक आयाम लिये यह दुर्ग अपनी खास शैली एवं सुन्दरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 

    राजस्थान की राजधानी जयपुर के आमेर क्षेत्र की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित आमेर दुर्ग देश दुनिया के पर्यटकों की खास पसंद है। दुर्ग या महल की खास कलात्मक एवं विशुद्ध हिन्दू वास्तु शैली पर्यटकों को आकर्षित करती है। 
  खास तौर से राजपूताना शैली का वास्तुशिल्प आकर्षित करता है। कालांतर में इस क्षेत्र में कछवाह राजपूत मान सिंह प्रथम ने राज किया था। लाल बलुआ पत्थरों एवं संगमरमर से बना यह किला भव्य दुर्ग पहाड़ी का आकर्षण है।

      इस दुर्ग में दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, शीश महल, जय मंदिर एवं सुख निवास आदि हैं। सुख निवास जलधाराओं की शीतलता से बेहद आनन्ददायक रहता है।
    यह महल कछवाह राजपूत महाराजाओं एवं उनके परिवार का निवास हुआ करता था। मुख्य द्वार के निकट आराध्या चैतंय पंथ की देवी का मंदिर है। दुर्ग में एक सुरंग मार्ग भी है। आमेर दुर्ग अरावली पर्वतमाला के एक चील आकार के पर्वत पर बना है।

    मुख्यत: यह महल चार हिस्सों में है। इन चार हिस्सों में प्रत्येक के प्रवेश द्वार एवं प्रांगण हैं। जलेब चौक प्रथम प्रांगण है। प्रांगण में युद्ध विजय हासिल करने वाली सेना का जुलूस निकलता था। यह विजय जुलूस राजसी परिवार की महिलायें भी झरोखों से देखती थीं।
    इसी प्रांगण के बगल में अस्तबल एवं सैनिकों के आवास थे। गणेश पोल द्वार से एक शानदार रास्ता राजमहल की ओर जाता है।
   शिला देवी मंदिर : शिला देवी मंदिर राजपूताना परिवार की आराध्य देवी हैं। खास यह है कि शिला देवी मंदिर का प्रवेश द्वार चांदी के आवरण से अच्छादित है। निकट ही शिरोमणि का वैष्णव मंदिर है। इस मंदिर का तोरण संगमरमर का बना है।

    जादुई पुष्प : जादुई पुष्प यहां के मुख्य आकर्षण में से एक है। शीशमहल के स्तम्भों में संगमरमर से फूलों की आकृतियां उकेरी गयीं हैं। विशेष आकर्षण में तितली के जोड़े, कमल, नाग का फन, हाथी की सूंड, सिंह की पूंछ आदि हैं। खास यह कि यह इलाका कलात्मकता का सुन्दर आयाम है।
   चौक बारादरी : चौक बारादरी महल का पुरातन हिस्सा है। विशेषज्ञों की मानें तो इस महल को बनाने में 25 वर्ष का समय लगा था। महल अलंकरण, भित्ति चित्रों एवं रंगीन टाइल्स से सुसज्जित है। इस महल का निकास मार्ग आमेर शहर को भी जाता है। यह रास्ता शहर के विभिन्न मंदिरों को हवेलियों एवं कोठियों की ओर खुलता है।
    उद्यान : उद्यान खास तौर से तीसरे प्रांगण क्षेत्र में स्थित है। उद्यान के निकट ही एक ऊंचे चबूतरा पर जय मंदिर है। इसी के पश्चिम में सुख निवास है। इसका निर्माण राजा जय सिंह ने कराया था। इनकी शैली मुगल उद्यानों की चारबाग शैली की भांति है। सितारों के आकार के जलाशय हैं। इनमें सुन्दर फव्वारों की श्रंखला है। संगमरमर की सुन्दर सजावट आकर्षक बना देती है।
       त्रिपोलिया द्वार : त्रिपोलिया द्वार तीन दरवाजों वाला स्थान है। त्रिपोलिया द्वार की खासियत यह है कि यह तीन ओर खुलता है। इसका एक द्वार जलेब चौक को खुलता है। एक द्वार मान सिंह महल की ओर खुलता है। एक द्वार राजसी महल की ओर खुलता है।
     विश्व धरोहर : विश्व धरोहर में किला को शामिल किया गया है। विशेषज्ञों की मानें तो राजस्थान सरकार ने वर्ष 2011 में आमेर दुर्ग को विश्व धरोहर में शामिल करने के लिए यूनेस्को को प्रस्ताव भेजा था। वर्ष 2013 में आमेर दुर्ग को विश्व धरोहर में शामिल कर लिया गया।
     आमेर दुर्ग की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जयपुर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जयपुर है। इसके अलावा पर्यटक सड़क मार्ग से भी आमेर दुर्ग की यात्रा कर सकते हैं।
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Monday, 11 June 2018

महाबलीपुरम : स्थापत्य कला का अनुपम सौन्दर्य

     महाबलीपुरम को मंदिरों का शहर कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। या फिर इसे स्थापत्य कला एवं सौन्दर्य शास्त्र की गाथा कहें। कुछ भी हो तमिलनाडु का शहर महाबलीपुरम चहुंओर कलात्मकता से परिपूरित है। भव्यता-दिव्यता का कहीं कोई जोड़ नहीं। 

    जी हां, महाबलीपुरम में धर्म-आध्यात्म, स्थापत्य कला-वास्तुशिल्प एवं कला के विविध आयाम निरूपित हैं। शायद यही कारण है कि महाबलीपुरम देश दुनिया के पर्यटकों का मुख्य आकर्षण है। 
   महाबलीपुरम को मामल्लापुरम भी कहते हैं। खास यह है कि सागर तट की सुन्दरता महाबलीपुरम में चार चांद लगा देती है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से करीब 55 किलोमीटर दूर स्थित महाबलीपुरम बंगाल की खाड़ी के तट पर है। सातवीं शताब्दी का यह शहर कभी पल्लव राजाओं की राजधानी था।
     विशेषज्ञों की मानें तो यह शहर द्रविड़ वास्तुकला की दृष्टि से श्रेष्ठ रहा है। महाबलीपुरम एवं उसके आसपास आकर्षक स्थलों की बड़ी श्रंखला है। इनमें खास तौर से अर्जुंस पेनेंस, शोर टेम्पल, पाण्डव रथ, कृष्ण मण्डपम, गुफायें, मूर्ति संग्रहालय, मुट्टुकाडु, कोवलोंग आदि हैं।   
     अर्जुंस पेनेंस : अर्जुंस पेनेंस शानदार नक्काशी के लिए ख्याति रखता है। यह स्थान 27 मीटर लम्बा एवं 9 मीटर चौड़ा है। यह व्हेल मछली के आकार का एक विशाल शिलाखण्ड है। इस शिलाखण्ड पर मनुष्य, पशु-पक्षियों सहित विभिन्न प्रकार की आकृतियां रूपांकित हैं। इसे देश का शानदार शिलाखण्ड होने का गौरब हासिल है।
    शोर टेम्पल : शोर टेम्पल को दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में श्रेष्ठतम माना जाता है। यह मंदिर महाबलीपुरम के तट पर स्थित है। आठवीं शताब्दी का यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का शानदार उदाहरण माना जाता है। खास यह कि यहां दो शिव मंदिर हैं। मध्य में भगवान विष्णु का मंदिर है। सागर की लहरें मंदिर तक टकराती हैं। सागर की लहरों को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे लहरें प्रभु के चरण पखारने का उपक्रम है।
      पाण्डव रथ : पाण्डव रथ महाबलीपुरम का मुख्य स्थल है। यह स्थान शहर के दक्षिणी इलाका में स्थित है। आकार प्रकार को देख कर इसे पंच पाण्डव रथ कहा जाता है। खास यह है कि पांच में से चार रथों को एक विशाल चट्टान पर रूपांकित किया गया है। इनमें द्रोपदी अर्जुन रथ वर्गाकार है। धर्मराज रथ सबसे ऊंचा है।
     कृष्ण मण्डपम : कृष्ण मण्डपम महाबलीपुरम का एक शानदार मंदिर है। शिलाखण्ड काट कर भव्य-दिव्य मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर की दर-ओ-दीवर पर ग्रामीण हलचल का अंकन है। श्री कृष्ण जी का भी अंकन किया गया है। जिसमें वह गोवर्धन पर्वत को उंगली पर धारण किये हुये हैं।
    क्रोकोडाइल बैंक : क्रोकोडाइल बैंक की भी अपनी एक अलग मान्यता है। महाबलीपुरम से करीब 14 किलोमीटर दूर चेन्नई रोड पर स्थित है। विशेषज्ञों की मानें तो इसे 1976 में अमेरिका के रोमुलस विटेकर ने स्थापित किया था। स्थापना के डेढ़ दशक की अवधि में क्रोकोडाइल की संख्या डेढ़ हजार से अधिक हो गयी। प्रारम्भ में इसमें 15 क्रोकोडाइल थे। निकट ही सांपों का फार्म भी है।
     वाराह गुफायें : वाराह गुफायें खास तौर से भगवान वाराह अवतार को रेखांकित करती हैं। यह गुफायें भगवान विष्णु के वाराह एवं वामन अवतार को समर्पित हैं। सातवीं शताब्दी की महिसासुर मर्दिनी गुफा भी नक्काशी के लिए खास प्रख्यात है।
     मूर्ति संग्रहालय : मूर्ति संग्रहालय में स्थानीय कलाकारों की 3000 से अधिक संरचनायें संग्रहित हैं। इनमें खास तौर से मूर्ति शिल्प दर्शनीय हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित मूर्तियां लकड़ी, पीतल एवं कंक्रीट की है।
      कोवलोंग : कोवलोंग महाबलीपुरम से करीब 19 किलोमीटर दूर खूबसूरत स्थान है। मुख्यत: यह किला का अवशेष स्थल है। किला का अवशेष स्थल होने के बावजूद सुन्दरता भी अद्वितीय है। पर्यटक यहां तैराकी, नौकायन, जलक्रीड़ा का शौक पूरा कर सकते हैं।
     नृत्य पर्व : नृत्य पर्व महाबलीपुरम का मुख्य पर्व है। सामान्यत: यह नृत्य पर्व जनवरी-फरवरी माह में आयोजित किया जाता है। देश के शीर्षस्थ कलाकार शोर मंदिर परिसर में कला का शानदार प्रदर्शन करते हैं। वाद्ययंत्रो का कर्णप्रिय संगीत एवं समुद्र की लहरों का प्राकृतिक संगीत मदहोश करने वाला होता है। श्रोता-दर्शन नृत्य-संगीत के इस आयोजन में सुधबुध खो देते है।
      महाबलीपुरम की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट चेन्नई है। चेन्नई एयरपोर्ट से महाबलीपुरम की दूरी करीब 60 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन चेंगलपट्टू है। चेंगलपट्टू रेलवे स्टेशन से महाबलीपुर की दूरी करीब 29 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से भी महाबलीपुरम की यात्रा की जा सकती है।
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शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...