Sunday, 21 July 2019

डांडेली वन्य जीव अभयारण्य: हाथियों का आशियाना

   डांडेली वन्य जीव अभयारण्य को हाथियों का आशियाना कहा जाना चाहिए। जी हां, खास यह कि इस अभयारण्य में हाथियों की विशेष प्रजातियां भी संरक्षित हैं।

   इसे पक्षियोंं का स्वर्ग भी माना जाता है। भारत के कर्नाटक के उत्तरा कन्नड़ जिला का यह शानदार अभयारण्य अद्भुत एवं विलक्षण है। करीब 866.41 वर्ग किलोमीटर दायरे में फैला डांडेली वन्य जीव अभयारण्य वस्तुत: दुर्लभ आैषधीय वनस्पतियों का उत्पादक क्षेत्र है। 

   खास यह कि वर्ष 2006 में अंशी डांडेली टाइगर रिजर्व भी इसी क्षेत्र में घोेषित किया गया। वर्ष 2015 में डांडेली वन्य जीव अभयारण्य को हाथी परियोजना क्षेत्र घोषित किया गया। विशेषज्ञों की मानें तो मैसूर हाथी रिजर्व के बाद कर्नाटक का यह दूसरा सबसे बड़ा हाथी अभयारण्य है।

   हाथी एवं बाघ के लिए आरक्षित क्षेत्र होने के साथ ही अन्य वन्य जीवों की धमाचौकड़ी डांडेली वन्य जीव अभयारण्य को बेहद रोमांचक बनाये रखती है। डांडेली वन्य जीव अभयारण्य को बर्ड वॉचर्स का स्वर्ग भी कहा जाता है।

   कारण पक्षियों की 200 से अधिक प्रजातियां इस शानदार अभयारण्य की शान एवं शोभा हैं। इनमें दुर्लभ एवं विलुप्त प्रजातियों के पक्षियों की दर्शनीयता भी है। सर्दियों का मौसम तो डांडेली वन्य जीव अभयारण्य की रौनक में चार चांद लगा देता है। अप्रवासी पक्षियों का कलरव एवं कोलाहल पर्यटकों में एक खास रोमांच पैदा करता है। 

   विलुप्त काला तेंदुआ डांडेली वन्य जीव अभयारण्य का मुख्य आकर्षण है। हालांकि इसकी दर्शनीयता अति दुर्लभ रहती है। फिर भी काला तेंदुुआ डांडेली वन्य जीव अभयारण्य की शान एवं शोभा है। हाथी के समुह स्वच्छंद विचरण करते दिख जायेंगे तो वहीं बाघ वंश की दहाड़ रोमांचित करती है।

   भालू, हिरन, पैंगोलिन, विशाल मालाबार गिलहरी, सियार, भौंकने वाला हिरन, मोर, किंग कोबरा, मगरमच्छ, तेंदुआ, सुनहरा कठफोड़वा आदि जीव जंतु इस शानदार अभयारण्य में शोभित एवं संरक्षित हैं। खास यह कि डांडेली वन्य जीव अभयारण्य की प्राकृतिक सुन्दरता तो देखते ही बनती है। यहां के मनोरम दृश्य पर्यटकों को लुभाते एवं रिझाते हैं। इस प्राकृतिक सौन्दर्य में पर्यटक खो जाते हैं। 

   डांडेली वन्य जीव अभयारण्य की शान एवं शोभा सुरम्य नदियां, घाटियां-वादियां पर्यटको के दिलों में उतर जाती हैं। इठलाती झील एवं झरनों की श्रंखला एक यादगार बन जाती है। नदियों के शीतल प्रवाह में पर्यटक जलक्रीड़ा का आनन्द लेना नहीं भूलते। विशेषज्ञों की मानें तो डांडेली वन्य जीव अभयारण्य एक आदर्श हिल स्टेशन भी है।

   आैषधीय वनस्पतियों की उपलब्धता, उत्पादकता एवं अनुसंधान जैसी विशिष्टितायें डांडेली वन्य जीव अभयारण्य की खासियत है। यहां के सदाबहार वन पर्यटकों को खास ऊर्जा से भर देते हैं। 
   पर्यटक खास तौर से आैषधीय वनस्पतियों, पौधों का जीवन दर्शन, जादुई जड़ी बूटियों की उपलब्धता, झाड़ियों की विशाल श्रंखला आदि इत्यादि डांडेली वन्य जीव अभयारण्य को काफी कुछ खास बना देती हैं।
   डांडेली वन्य जीव अभयारण्य एवं आसपास आकर्षक एवं प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित पर्यटन स्थलों की एक शानदार श्रंखला विद्यमान हैं। इनमें खास तौर से कावला गुफायेें, कुल्गी नेचर कैम्प, अंशी राष्ट्रीय उद्यान, सिन्थेरी रॉक, काली नदी, मल्लिकार्जुन मंदिर एवं सुपा बांध आदि इत्यादि हैं।

  कावला गुफायें: कावला गुफायें एक आदर्श एवं ऐतिहासिक स्थान है। डांडेली वन्य जीव अभयारण्य से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित कावला गुफायें की स्थापत्य कला देखते ही बनती है। पर्यटकों को गुफाओं तक पहंुचने के लिए सघन वन क्षेत्र से गुजरना पड़ता है। इन गुफाओं को भगवान शिव का स्थान माना जाता है। 
  कुल्गी नेचर कैंप: कुल्गी नेचर कैंप वस्तुत: एक शानदार संग्रहालय है। कुल्गी नेचर कैंप डांडेली वन्य जीव अभयारण्य से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित है। इसे प्राकृतिक व्याख्या केन्द्र के तौर पर देखा जाता है। इस संग्रहालय का मुख्य आकर्षण किंग कोबरा है। 
  अंशी राष्ट्रीय उद्यान: अंशी राष्ट्रीय उद्यान का मुख्य आकर्षण पर्वत श्रंखला, गहरी घाटियां-वादियां एवं झील झरनें हैं।
  सिन्थेरी रॉक: सिन्थेरी रॉक वस्तुत: यह एक विशाल शिलाखण्ड है। कनेरी नदी के किनारे स्थित इस शिलाखण्ड से प्रकृति के शानदार एवं सुन्दर नजारे दिखते हैं। 
   काली नदी: काली नदी इस इलाके का मुख्य आकर्षण है। उत्तरा कन्नड़ जिला के एक गांव डिग्गी से उत्पन्न नदी की दर्शनीयता अति सुन्दर है। नदी के सफेद जल में रॉफ्टिंग का अपना एक अलग ही आनन्द है। पर्यटक यहां रॉफ्टिंग का भरपूर आनन्द लेते हैं।
   श्री मल्लिकार्जुन मंदिर: श्री मल्लिकार्जुन मंदिर एक पौराणिक एवं धार्मिक स्थल है। यह भगवान शिव का स्थान है। गर्भगृह में नवरंग मंतप एवं कदंब शैली के गुम्बद हैं। यह स्थापत्य कला अति दर्शनीय है।
   सुपा बांध: सुपा बांध स्थल एक अति दर्शनीय एवं आदर्श पिकनिक स्पॉट है। सुपा बांध डांडेली से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। सुपा का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों को रोमांचित कर देता है।
   डांडेली वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट डाबोलिन एयरपोर्ट गोवा है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोंकड़ जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी डांडेली वन्य जीव अभयारण्य की यात्रा कर सकते हैं।
15.263500,74.619100

Tuesday, 16 July 2019

जटायु नेशनल पार्क : चुम्बकीय सौन्दर्य

    जटायु नेशनल पार्क के प्राकृतिक सौन्दर्य को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, इस नेशनल पार्क की सुन्दरता का कोई जोड़ नहीं।

   महाकाव्य रामायण के वीर योद्धा जटायु को समर्पित इस राष्ट्रीय उद्यान का सौन्दर्य पर्यटकों को मुग्ध कर लेता है। इसे जटायु नेचर पार्क के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। 

  भारत के दक्षिणी राज्य केरल का यह शानदार पर्यटन स्थल पर अत्याधुनिक तौर तरीके भी हैं। जिससे पर्यटक प्राचीनकाल की यश गाथा को बेहद सलीके से जान-समझ सकते हैं। डिजिटल म्युजियम एवं 6डी थियेटर जटायु का सम्पूर्ण प्रसंग पर्यटकोें के समक्ष प्रस्तुत करता है। 

   केरल के जिला कोल्लम के चदयामंगलम गांव स्थित यह जटायु नेशनल पार्क पर्यटकों को खास तौर से आकर्षित करता है। किवदंती है कि रामायण का यह पात्र जटायु रावण से युद्ध में घायल हो गया आैर अंतिम सांसे ले रहा था तो किसी ने पूछा कि रावण अति बलशाली था। 

   यह जानते हुए भी कि रावण सेे कतई जीत नहीं सकते फिर भी रावण को ललकारा। आखिर क्यों... ? जटायुु ने अति सुन्दर जवाब दिया था। जटायु ने कहा था कि रावण से जीत नहीं सकता था। युद्ध नहीं करता तो भारत की असंख्य पीढ़ियां जटायु को कायर कहतीं। 

   एक भारतीय आर्य नारी का अपहरण हो रहा था आैर जटायु कायरों की भांति बिल में पड़ा रहता। यह जटायु को मंजूर नहीं था। कायरता का कलंक लेकर जीने से बेहतर रावण से युद्ध कर मरना बेहतर था। लिहाजा जटायु ने रावण को ललकारा आैर युद्ध किया। 

    इस वीर योद्धा की पवित्र पावन स्मृति में जटायु नेशनल पार्क का निर्माण किया गया। मान्यता है कि रावण से युद्ध में घायल होने के उपरांत जटायु यहीं गिरे थे। लिहाजा यह स्थान जटायु की स्मृति का समर्पित है।

   प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित जटायु नेशनल पार्क वस्तुत: केरल के पर्यटन में एक नया अध्याय जुड़ गया। एक नया डेस्टिनेशन जुड़ गया। जटायु नेशनल पार्क को जटायु नेचर पार्क के नाम से ख्याति हासिल है। कारण यह पार्क प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूरित है। चौतरफा प्रकृति का शानदार नजारा दिखता है। 

   खास यह कि इस पार्क में जटायु का दुनिया का सबसे बड़ा एवं खूूबसूरत स्कल्पचर है। करीब 65 एकड़ में फैले इस शानदार पार्क में एक जीवंतता का एहसास होता है। इस पार्क में रोमांच, मनोरंजकता एवं कलात्मकता को अत्यंत खूबसूरती के साथ समायोजित किया गया है। 

   वस्तुत: देखें तो जटायु नेशनल पार्क केरल के पर्यटन में एक नया मील का पत्थर है। इस पार्क का मुख्य आकर्षण जटायु का स्कल्पचर है। इस मूर्ति शिल्प की दर्शनीयता ही मुख्य है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ति शिल्प माना जाता है। 


   इसका निर्माण एक विशाल पर्वत को काट कर किया गया है। जटायु की यह प्रतिमा करीब 200 फुट लम्बी, करीब 150 फुट चौड़ी एवं 70 फुट ऊंची है। इसका निर्माण करने में सात वर्ष से भी अधिक समय लगा था। इसका प्लेटफार्म करीब 15000 वर्ग फुट का है। जटायु नेशनल पार्क में 6डी थियेटर भी है। जिसमें जटायु एवं रावण युद्ध प्रसंग सहित काफी कुछ प्रदर्शित किया जाता है।

   पार्क में एक शानदार एवं अत्याधुनिक तकनीकि पर आधारित डिजिटल म्युजियम भी है। आर्चरी, आयुर्वेद रिजार्ट, रोमांचक खेल, राइफल शूटिंग रेंज, रॉक क्लाइम्बिंग आदि इत्यादि बहुत कुछ है। जटायु नेशनल पार्क में पर्यटक केबिल कार का भी आनन्द ले सकते हैं।
  आयुर्वेद रिजार्ट में आयुर्वेद एवं सिद्धा पद्धति से उपचार भी किया जाता है। इस शानदार रिजार्ट में कई आलीशान क्लब भी हैं। कोल्लम से करीब 28 किलोमीटर दूर स्थित जटायु नेशनल पार्क पर्यटकों को कला, संस्कृति, इतिहास, तकनीकि, प्राकृतिक सौन्दर्य एवं सम्पन्नता एवं रोमांच प्रदान करता है। जटायु नेशनल पार्क एक खास आकर्षण रेन वॉटर हार्वेस्टिंग भी है।

   जटायु नेशनल पार्क की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट तिरूवनंतपुरम एयरपोर्ट है। तिरूवनंतपुरम एयरपोर्ट से जटायु नेशनल पार्क की दूरी करीब 80 किलोमीटर है। पर्यटक कोच्चि एयरपोर्ट से भी जटायु नेशनल पार्क की यात्रा कर सकते हैं। कोच्चि एयरपोर्ट से जटायु नेशनल पार्क की दूरी करीब 150 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोल्लम जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी जटायु नेशनल पार्क की यात्रा कर सकते हैं।
8.886910,76.590469

Wednesday, 10 July 2019

पन्ना राष्ट्रीय उद्यान: जलीय जीवों का रोमांच

   पन्ना राष्ट्रीय उद्यान को जलीय एवं समुद्री जीवों का शानदार घर कहा जाना चाहिए। जी हां, इस विलक्षण उद्यान में पर्यटकों को समुद्री जीव भी रोमांचित करते हैं। 

  भारत के मध्य प्रदेश के जिला छतरपुर एवं पन्ना का पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में झीलों एवं झरनों की प्रचुरता है। केन नदी इस राष्ट्रीय उद्यान का मुख्य आकर्षण है। 

   खास तौर से उद्यान में यूरासियन ईगल, उल्लू, ब्लैक इबिस, मगरमच्छ एवं घड़ियाल आदि खास तौर से पर्यटकों को रोमांचित करते है। करीब 543 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला पन्ना राष्ट्रीय उद्यान वस्तुत: एक रेप्टाइल पार्क है।

  पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना वर्ष 1981 में की गयी थी। हालांकि इसे वर्ष 1994-1995 में बाघ संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। खजुराहो से करीब 57 किलोमीटर दूर स्थित पन्ना राष्ट्रीय उद्यान प्रकृति का एक शानदार उपहार है। बेहतरीन स्थलाकृति वाला यह राष्ट्रीय उद्यान काफी कुछ विशेषताएं रखता है। 

   विंध्य पर्वत श्रंृखला का हिस्सा पन्ना राष्ट्रीय उद्यान मेंं वन्य जीवों की दर्शनीयता खास है। हाथियों के अलावा बाघ, चीता, भेड़िया, लकड़बग्घा, कस्तूरी हिरण, काला हिरण, जंगली बिल्ली, चील, गिद्ध, बाज, चिंकारा आदि इत्यादि संरक्षित हैं। विशेषज्ञों की मानें तो पन्ना राष्ट्रीय उद्यान भारत के सबसे व्यवस्थित राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है।

  व्यवस्था की दृष्टि से इसे वर्ष 2007 में उत्कृष्टता पुरस्कार भी हासिल हो चुका है। राजसी शासनकाल में पन्ना रियासत का यह इलाका राजसी शिकारगाह था। मान्यता है कि पाण्डव बंधुओं ने अज्ञातवास का अधिकांश समय पन्ना में ही व्यतीत किया था। इसका जिक्र महाभारत में भी मिलता है।

  पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा का सबसे बेहतरीन समय अक्टूबर से मई की अवधि खास है। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा का भरपूर आनन्द लेना हो तो पर्यटकों को सर्दियों में प्लान बनाना चाहिए।

  कारण वन्य जीव खास तौर से सर्दियों में धूप का आनन्द लेने के लिए अक्सर अपनी मांद से बाहर निकलते हैं। लिहाजा दर्शनीयता की दृष्टि से सर्दियों का समय सबसे अच्छा माना जाता है। 
  खास यह कि गर्मियों में भी यहां का मौसम सुहावना रहता है। यूं कहें कि गर्मी के तल्ख तेवर का पन्ना राष्ट्रीय उद्यान पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता है।

   पन्ना राष्ट्रीय उद्यान का मुख्य आकर्षण बाघ वंश है। अक्सर बाघिन शावकों संग विचरण करते दिख जायेगी। यह पल बेहद रोमांचक होते हैं। बाघ शावक अति सुन्दर प्रतीत हैं। 

  खास यह कि किंग कोबरा, खतरनाक एवं जहरीले सांप भी इस उद्यान में पलते हैं। वस्तुत: देखें तो पन्ना नायाब हीरों एवं बाघ वंश के लिए जाना पहचाना जाता है। जंगलों के सैर सपाटा के लिए शौकीन पर्यटकों के लिए पन्ना राष्ट्रीय उद्यान बेहतरीन है। 

   खास यह कि वन्य जीव जन्तुओं की विलुप्त प्रजातियां भी पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में संरक्षित हैं। बाघ वंश की विलुप्त प्रजाति भी पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में शान से चहलकदमी करते दिखेंगे। विशेषज्ञों की मानें तो आजादी के बाद इसे वन्य जीव संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था। 

   खास यह कि पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में कई शानदार एवं सुन्दर रिसोर्ट भी हैं। लिहाजा पर्यटक पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के आंतरिक क्षेत्र में रात्रि प्रवास कर पर्यटन का भरपूर का आनन्द ले सकते हैं। रात्रि प्रवास पर्यटकों को कुछ खास रोमांचक एहसास कराता है। पर्यटकों का यह अनुभव यादगार होता है।

   पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट खजुराहो एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की दूरी करीब 57 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन सतना जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी पन्ना राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
24.718031,80.181931

Monday, 8 July 2019

चिन्नार अभयारण्य : रोमांच का एहसास

   चिन्नार अभयारण्य को प्रकृति संग सैर कहा जाना चाहिए। चिन्नार अभयारण्य में वन्य जीवन के कोलाहल के साथ ही प्राकृतिक सुन्दरता का हर आयाम दर्शनीय है। 

   चिन्नार अभयारण्य खास तौर से रोमांच के लिए प्रसिद्ध है। वन्य जीवों में सफेद भैंसा इस अभयारण्य की शान एवं शोभा है। भारत के केरल प्रांत के जिला इडुक्की का यह एक शानदार एवं दर्शनीय अभयारण्य है। मुन्नार हिल स्टेशन के निकट स्थित चिन्नार अभयारण्य केरल-तमिलनाडु सीमा पर स्थित है। 

   इस शानदार एवं सुन्दर अभयारण्य में शेर, चीता, बाघ के अलावा हाथी, सांभर, जंगली सुअर, हिरन, मोर आदि इत्यादि संरक्षित हैं। राजमला-उदुमलपेट रोड पर स्थित यह अभयारण्य एक शानदार पर्यटन स्थल भी है। 

   खास यह कि वन विभाग पर्यटकों के लिए ट्रैकिंग, चिन्नार सफारी एवं वॉटर फॉल्स ट्रैकिंग की सेवायें एवं सुविधायें उपलब्ध कराता है। चिन्नार अभयारण्य को एक शानदार अभयारण्य से कहीं अधिक हिल स्टेशन के तौर पर प्रसिद्धि हासिल है। 

   चाय एवं कॉफी के बागान चिन्नार अभयारण्य की खास शोभा एवं शान हैं। देश दुनिया के पर्यटक चिन्नार अभयारण्य की रोमांचक सैर का आनन्द लेने आते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो चिन्नार अभयारण्य स्टार कछुओं के प्रजनन के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 

   पेरियार नेशनल पार्क के बाद चिन्नार अभयारण्य केरल का सबसे बड़ा एवं सुन्दर अभयारण्य है। पश्चिमी घाट इलाके का यह अभयारण्य आैषधीय वनस्पतियों का खजाना है। आैषधीय वनस्पतियों की प्रचुरता इसे काफी कुछ खास बना देती है। 

   इन आैषधीय वनस्पतियों की सुगंध पर्यटकों के दिल एवं दिमाग को एक विशेष ताजगी प्रदान करती है। जिससे पर्यटक खुद को कहीं अधिक तरोताजा महसूस करते हैं। पक्षियों की असंख्य प्रजातियां इस अभयारण्य में संरक्षित हैं। सर्दियोें में मेहमान पक्षियों का भारी तादाद में यहां आते हैं।

   भोजन एवं प्रजनन के लिए विदेश पक्षियों का बड़ी तादाद में यहां प्रवास करना चिन्नार अभयारण्य की विशेषता है। खास यह कि दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों का भी बड़ी तादाद में यहां प्रवास होता है। इन पक्षियों को सर्दियों में चिन्नार अभयारण्य में अनुकूल परिवेश मिलता है। 

   पर्यटक इस अवधि में दुर्लभ पक्षियों को भी देख सकते हैं। सामान्य दशाओं में इस अभयारण्य में 250 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां संरक्षित हैं। चिन्नार अभयारण्य में सामान्य तौर से वर्ष पर्यन्त पर्यटकों की आवाजाही लगी रहती है।

   फिर भी अक्टूबर से अप्रैल के मध्य चिन्नार अभयारण्य की यात्रा का प्लान पर्यटकों को बनाना चाहिए। कारण इस अवधि में चिन्नार अभयारण्य का मौसम काफी अनुकूल रहता है।

   चिन्नार अभयारण्य की खूबसूरती, मौसम के कारण अत्यधिक निखर आती है। बारिश के बाद चौतरफा हरा-भरा दिखता है। सघन वन क्षेत्र में वॉटर फॉल्स का अपना एक अलग ही आकर्षण दिखता है। थूवनम फॉल्स चिन्नार अभयारण्य का मुख्य आकर्षण है। 

   जीवों को देखने के लिए पर्यटक चिन्नार अभयारण्य में कैम्प भी कर सकते हैं। ट्रैकिंग एवं एडवेंचर जैसी गतिविधियों का पर्यटक आनन्द ले सकते हैं। चिन्नार वॉच टॉवर खास है। प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ ही पर्यटक चिन्नार अभयारण्य पर वन्य जीवों के रोमांच का शानदार अनुभव कर सकते हैं।

   चिन्नार अभयारण्य की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट कोचीन एयरपोर्ट है। निकटतम रेेलवे स्टेशन पोलाची जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी चिन्नार अभयारण्य की यात्रा कर सकते हैं।
10.087500,77.061700

Thursday, 4 July 2019

पेंच राष्ट्रीय उद्यान: प्राकृतिक सुन्दरता

   पेंच राष्ट्रीय उद्यान को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। इस राष्ट्रीय उद्यान की प्राकृतिक सुन्दरता को प्रकृति का शानदार उपहार कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   भारत के मध्य प्रदेश का यह राष्ट्रीय उद्यान अति दर्शनीय एवं रोमांंचक है। मध्य प्रदेश के सिवनी एवं छिंंदवाड़ा का यह शानदार वन्य जीव अभयारण्य काफी कुछ खास है। हालांकि इस शानदार राष्ट्रीय उद्यान का नाम बदलकर अब इन्दिरा प्रियदर्शिनी राष्ट्रीय उद्यान कर दिया गया है।

   इसे मोगली लैण्ड के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। सिवनी एवंं छिंदवाड़ा के मिले जुले इलाके में स्थित पेंच राष्ट्रीय उद्यान का फैलाव करीब 292.83 वर्ग किलोमीटर में है। खास यह कि इस राष्ट्रीय उद्यान का नाम पेंच नदी पर आधारित है। उद्यान के उत्तर दिशा में प्रवाहित नदी यहां की शान एवं शोभा है। 

   मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र की सीमा क्षेत्र के इस राष्ट्रीय उद्यान को देश का सर्वश्रेष्ठ टाइगर रिजर्व होने का गौरव हासिल है। इसे वर्ष 1993 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। 

   खास यह सर्दियों में इस राष्ट्रीय उद्यान की शान एवं शोभा आैर भी अधिक बढ़ जाती है। कारण उद्यान चौतरफा हिमालयी पक्षियों से गुलजार हो जाता है। सर्दियों में हिमालयी पक्षियों की 210 से अधिक प्रजातियां इस सुरम्य उद्यान में बसेरा करती खास यह कि उद्यान दुर्लभ पक्षियों एवं जीव जन्तुओं से आबाद रहता है। 

   यह पक्षी सर्दियों में भोजन एवं प्रजनन के लिए यहां प्रवास करते हैं। खूबसूरत झीलें, ऊंचे सघन पेड़ एवं शानदार झुरमुट पेंच राष्ट्रीय उद्यान को काफी कुछ खास बना देते हैं। पेंच राष्ट्रीय उद्यान में रंगबिरंगे पक्षियों का कलरव, शीतल एवं शांत हवा के झोके, सोंधी सुगंध वाली माटी पर्यटकों को प्रफुल्लित कर देती है। 

    प्रकृति का अनन्त सागर पर्यटकों के रोम-रोम को प्रफुल्लित कर देता है। चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली भैंसा आदि इत्यादि से शोभायमान पेंच राष्ट्रीय उद्यान पर्यटकों के बीच बेहद पसंदीदा है। बाघ वंश खास तौर से पेंच की शान एवं शोभा हैं। विशेषज्ञों की मानें तो सौ से अधिक बाघ वंश इस शानदार राष्ट्रीय उद्यान में की रौनक हैं। 

   खास यह कि देश में विलुप्त हो रहे गिद्ध पेंच राष्ट्रीय उद्यान में बहुलता से पाये जाते हैं। खास तौर से इस उद्यान में लाल धारी वाले एवं सफेद धारी वाले गिद्ध पाये जाते हैं। पेंच राष्ट्रीय उद्यान में राज तोता एवं दूधराज भी मस्ती करते दिखते हैं। विशाल झीलों एवं झरनों वाला यह इलाका अति दर्शनीय है।

   विशेषज्ञों की मानें तो देश के अन्य राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में पेंच राष्ट्रीय उद्यान कहीं बेहतरीन है। सतपुड़ा पहाड़ियों का यह इलाका आैषधीय वनस्पतियों से आच्छादित होने से वन्य जीवों एवं पर्यटकों के लिए किसी प्राणवायु से कम नहीं है। जड़ी बूटियां एवं घास की प्रचुरता इस राष्ट्रीय उद्यान को आैर भी अधिक सुन्दर बनाती हैं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो इस राष्ट्रीय उद्यान में 1200 से अधिक पौधों की प्रजातियां पायी जाती हैं। मछलियों की 50 से अधिक प्रजातियां भी जल कोलाहल को बनाये रखती हैं। 
  इस राष्ट्रीय उद्यान में बाघ, चीता, चीतल, काला हिरन, खरगोश, उड़ने वाली गिलहरी, सांभर, लोमड़ी, जंगली सुअर, साही, सियार, बाराहसिंगा, चारसिंगा एवं नीलगाय पेंच राष्ट्रीय उद्यान में स्वच्छंद विचरण करते दिखते हैं।

 
   बारिश के बाद पेंच राष्ट्रीय उद्यान की सुन्दरता कहीं अधिक बढ़ जाती है। कारण चौतरफा हरितिमा का साम्राज्य दिखता है। ऐसे में फोटोग्राफर्स के लिए पेंच राष्ट्रीय उद्यान किसी स्वर्ग की भांति होता है।

   यह वन्य जीव अभयारण्य खास तौर से जैव विविधिता के लिए जाना पहचाना जाता है।
   पेंच राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सोनेगांव नागपुर एयरपोेर्ट है।

   नागपुर एयरपोर्ट से पेंच राष्ट्रीय उद्यान की दूरी 86 किलोमीटर है। पर्यटक जबलपुर एयरपोर्ट से भी यात्रा कर सकते हैं। जबलपुर एयरपोर्ट से पेंच राष्ट्रीय उद्यान की दूरी करीब 171 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन छिंदवाड़ा जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी पेंच राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
22.053350,78.938140

शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...