विरुपाक्ष मंदिर: अद्भुत स्थापत्य कला
विरुपाक्ष मंदिर का सौन्दर्य शिल्प अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, कर्नाटक के जिला बलारी स्थित विरुपाक्ष मंदिर की वास्तुकला एवं शिल्पांकन बेहद दर्शनीय है।
ऐसा प्रतीत होता कि जैसे साक्षात भगवान विश्वकर्मा ने स्वत: विरुपाक्ष मंदिर का शिल्पांकन किया हो।
हालांकि विरुपाक्ष मंदिर हम्पी के स्मारक समूह का एक हिस्सा है। फिर भी इसकी दर्शनीयता एवंं विलक्षणता श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को आकर्षित करती है।
विरुपाक्ष मंदिर एक स्मारक भी है आैर एक देव स्थान भी है। अद्भुत एवं विलक्षण होने के कारण ही विरुपाक्ष मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है।
विरुपाक्ष मंदिर भारत के प्रांत कर्नाटक के जिला बलारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर वस्तुत: भगवान शिव को समर्पित है। इसे एक श्रेष्ठ शिव मंदिर के तौर पर देखा जाता है।
मान्यता है कि भगवान विरुपाक्ष शिव का स्वरूप हैं। इस दिव्य-भव्य मंदिर में भगवान विरुपाक्ष एवं उनकी पत्नी देवी पंपा प्रतिष्ठापित हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण विजय नगर साम्राज्य के शासक देव राय द्वितीय के एक नायक लक्ष्मण दांदेशा ने कराया था।
करीब 7वीं शताब्दी में निर्मित विरुपाक्ष मंदिर एक कार्यशील मंदिर की भांति प्रसिद्ध है। हम्पी गांव में स्थित यह मंदिर हिन्दुओं के एक तीर्थ एवं धार्मिक स्थल के तौर पर मान्य है।
इसे एक शानदार धार्मिक पर्यटन स्थल भी कह सकते हैं। दक्षिण भारत में इसे एक धार्मिक तीर्थ यात्रा के तौर पर देखा जाता है।
विशेषज्ञों की मानें तो विरुपाक्ष के रूप में शिव स्थापित हैं। इसे देवी पम्पा का स्थान माना जाता है। लिहाजा इसे स्थानीयता में पम्पा मंदिर या पंपापटी मंदिर भी कहा जाता है।
खास यह कि विरुपाक्ष मंदिर धार्मिक एवं देव स्थान होने के साथ-साथ सामाजिक स्वरूप भी रखता है। शादी-विवाह एवं सामाजिक जश्न भी होते हैं।
पर्व एवं त्योहार तो विरुपाक्ष मंदिर की एक शानदार परम्परा है। विरुपाक्ष मंदिर वस्तुत: हम्पी का मुख्य आकर्षण है। इसकी ख्याति धार्मिक तीर्थ, स्मारक एवं पर्यटन के तौर पर समान रूप से है।
हम्पी के बाजार क्षेत्र में स्थित विरुपाक्ष मंदिर शहर के अति प्राचीन स्मारक है। हालांकि परिसर में कई अन्य छोटे-छोटे मंदिर भी हैं। मंदिर का शिखर करीब 50 फुट ऊंचा है। यह नौ स्तरों पर बना है।
मंदिर की पूर्व दिशा में विशाल नंदी विद्यमान हैं। दक्षिण दिशा में विशालकाय गणेश विद्यमान हैं। भगवान नरसिंह की करीब 6.7 मीटर ऊंची प्रतिमा यहां प्राण प्रतिष्ठित है।
विरुपाक्ष मंदिर में प्रवेश द्वार गोपुरम हेमकुटा पहाड़ियों एवं आसपास विशाल चट्टानों से घिरा है। खास यह कि चट्टानों का संतुलन हैरान करने वाला है।
किवदंती है कि भगवान विष्णु ने इस स्थान को अपने प्रवास हेतु चयनित किया था। हालांकि भगवान को यह स्थान कुछ अतिरिक्त बड़ा प्रतीत हुआ।
लिहाजा भगवान प्रवास का विचार त्याग कर वापस लौट गये। बाद में यह स्थान शिव का स्थान हो गया।
वस्तुत: विरुपाक्ष मंदिर में भी भूमिगत शिव मंदिर है। कारण मंदिर का एक बड़ा हिस्सा पानी के अंदर समाहित है। इस लिए कोई भी जल क्षेत्र में समाहित शिव मंदिर में नहीं जा सकता।
इस क्षेत्र में तापमान बहुत कम रहता है। इन सहित अन्य विशिष्टताओं के कारण विरुपाक्ष मंदिर को भारत के श्रेष्ठतम ऐतिहासिक मंदिरों में माना जाता है।
बंगलुरू से करीब 350 किलोमीटर दूर स्थित यह शानदार एवं सुन्दर मंदिर वास्तुकला एवं सौन्दर्य शिल्प की शानदार संरचना है।
तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित विरुपाक्ष मंदिर हेमकूट पहाड़ी की तलहटी पर है। विरुपाक्ष मंदिर की वास्तुकला अति दर्शनीय है। यहां की वास्तुकला वस्तुत: द्रविड़ स्थापत्य शैली पर आधारित है।
खास यह कि इसमें द्रविड़ के साथ साथ कांचीपुरम की शैली का संयोजन है। महाशिवरात्रि सहित अन्य धार्मिक उत्सव विरुपाक्ष मंदिर अति हर्ष के साथ यहां मनाये जाते हैं।
विरुपाक्ष मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट हुबली एयरपोर्ट है। हुबली एयरपोर्ट से विरुपाक्ष मंदिर की दूरी करीब 144 किलोमीटर है।
पर्यटक समब्रो एयरपोर्ट बेलगाम से भी विरुपाक्ष मंदिर की यात्रा कर सकते हैं। यहां से मंदिर की दूरी करीब 216 किलोमीटर है।
विरुपाक्ष मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन होस्पेट जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी विरुपाक्ष मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
15.138080,76.923760
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