बोध गया : बौद्ध महातीर्थ
बोध गया को विश्व के श्रेष्ठतम स्थानों में से एक कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। बोध गया को बौद्ध समुदाय का महातीर्थ माना जाता है।
निश्चय ही बोध गया अद्भुत है। शायद इसी कारण यूनेस्को ने बोध गया को विश्व धरोहर स्थल के अलंकरण से अलंकृत किया है। बिहार की राजधानी पटना से करीब 100 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व दिशा में स्थित यह शहर विश्व में अपनी एक अलग एवं विशिष्ट ख्याति रखता है। बौद्धों के लिए यह एक अति महत्वपूर्ण धार्मिक केन्द्र है। इसी स्थान पर महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था।
पवित्र बोधी वृक्ष भी यहीं है। इसी स्थान पर राजकुमार सिद्धार्थ ज्ञान प्राप्त कर महात्मा बुद्ध बन गये थे। सम्राट अशोक के शासनकाल में इस दिव्य-भव्य मंदिर की स्थापना हुई थी।
बोध गया में महाबोधि मंदिर परिसर में लगभग 50 मीटर लम्बा महाबोधि मंदिर स्थापित है। इसी परिसर में महात्मा बुद्ध के ज्ञान के 6 अन्य पवित्र स्थल शामिल हैं। यह स्थान कई प्राचीन स्तूप से घिरा है।
इन सभी कारकों के कारण ही बोध गया को बौद्ध अनुयायियों का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। बिहार के इस बोध गया शहर को खास तौर से मंदिरों का शहर माना जाता है। खास यह है कि बोध गया देश दुनिया का शीर्षस्थ पर्यटन स्थल बन गया है। दुनिया के सभी धर्मों के लोग आस्था एवं विश्वास लेकर बोध गया आते हैं।
बोध गया के इस दिव्य-भव्य परिसर में बुद्धम-शरणम-गच्छामि की हल्की संगीत सुर लहरी प्रवाहित होती रहती है। यह संगीत सुर लहरी एक सुखद शांति का एहसास कराती है। देश दुनिया के विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदाय के लोग आध्यात्मिक शांति की तलाश में यहां आते हैं। बोध गया के निकट ही गया शहर है। गया शहर में भी मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला है।
खास यह कि बोध गया घूमने का बेहतरीन समय बुद्ध जयंती का अवसर होता है क्योंकि बुद्ध जयंती पर बोध गया में उत्सव जैसा माहौल होता है। महाबोधि मंदिर को लाखों कैंडिल की सहायता से सजाया जाता है। सांझ होते ही महाबोधि मंदिर परिसर रोशनी से जगमगा उठता है। यह इन्द्रधनुषी दृश्य अद्भुत होता है। सुन्दरता का यह दृश्यावलोकन पर्यटकों के मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ता है। यह अनोखा अनुभव हमेशा याद रहने वाला होता है।
महाबोधि मंदिर की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्थापित स्तूप के समान है। इस मंदिर में भगवान गौतम बुद्ध की दिव्य-भव्य मूर्ति स्थापित है। मूर्ति पद्मासन की मुद्रा में स्थापित है। मूर्ति के आगे बुद्ध के विशाल पद चिह्न बने हैं। बुद्ध के इन पद चिह्न को धर्मचक्र प्रवर्तन माना जाता है। इस मूर्ति को अनिमेश लोचन भी कहा जाता है। किवदंती है कि मूर्ति ज्ञान प्राप्ति स्थल पर ही स्थापित है। मंदिर के चौतरफा पत्थर की नक्काशीदार रेलिंग है।
इस रेलिंग को बोध गया में सबसे प्राचीन अवशेष माना जाता है। परिसर में दक्षिण पूर्व दिशा में एक अति समृद्ध पार्क है। इस पार्क में बौद्ध भिक्षु ध्यान साधना करते हैं। मंदिर के पीछे पीपल का वृक्ष है। इसे बोधि वृक्ष कहा जाता है। महात्मा बुद्ध को इस वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
बताते हैं कि वर्तमान वृक्ष पांचवीं पीढ़ी का वृक्ष है। सुबह एवं शाम मंदिर की आरती एवं घंटा की टंकार से परिवेश अनुगूंजित हो उठता है। मंदिर के उत्तर भाग को चंकामाना नाम से जाना पहचाना जाता है। इस स्थान पर काला पत्थर का कमल का फूल बना है। यह कमल का फूल युद्ध का प्रतीक माना जाता है।
मंदिर के उत्तर पश्चिम में छतविहीन भग्नावशेष हैं। इस स्थल को रत्नाधारा के नाम से जाना पहचाना जाता है। बताते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध ने चौथा सप्ताह इस स्थान पर व्यतीत किया था। दंतकथाओं के मुताबिक बुद्ध के गहन ध्यान की अवधि में उनके शरीर से प्रकाश की एक किरण निकली थी। प्रकाश की इस किरण से ध्वज पताकायें अवलोकित हैं।
बोध गया की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट गया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। एयरपोर्ट से बोध गया की दूरी 7 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन गया जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
24.696134,84.986955
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