Friday, 27 July 2018

बोध गया : बौद्ध महातीर्थ

    बोध गया को विश्व के श्रेष्ठतम स्थानों में से एक कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। बोध गया को बौद्ध समुदाय का महातीर्थ माना जाता है। 

   निश्चय ही बोध गया अद्भुत है। शायद इसी कारण यूनेस्को ने बोध गया को विश्व धरोहर स्थल के अलंकरण से अलंकृत किया है। बिहार की राजधानी पटना से करीब 100 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व दिशा में स्थित यह शहर विश्व में अपनी एक अलग एवं विशिष्ट ख्याति रखता है। बौद्धों के लिए यह एक अति महत्वपूर्ण धार्मिक केन्द्र है। इसी स्थान पर महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था।

   पवित्र बोधी वृक्ष भी यहीं है। इसी स्थान पर राजकुमार सिद्धार्थ ज्ञान प्राप्त कर महात्मा बुद्ध बन गये थे। सम्राट अशोक के शासनकाल में इस दिव्य-भव्य मंदिर की स्थापना हुई थी। 
  बोध गया में महाबोधि मंदिर परिसर में लगभग 50 मीटर लम्बा महाबोधि मंदिर स्थापित है। इसी परिसर में महात्मा बुद्ध के ज्ञान के 6 अन्य पवित्र स्थल शामिल हैं। यह स्थान कई प्राचीन स्तूप से घिरा है।

    इन सभी कारकों के कारण ही बोध गया को बौद्ध अनुयायियों का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। बिहार के इस बोध गया शहर को खास तौर से मंदिरों का शहर माना जाता है। खास यह है कि बोध गया देश दुनिया का शीर्षस्थ पर्यटन स्थल बन गया है। दुनिया के सभी धर्मों के लोग आस्था एवं विश्वास लेकर बोध गया आते हैं। 

    बोध गया के इस दिव्य-भव्य परिसर में बुद्धम-शरणम-गच्छामि की हल्की संगीत सुर लहरी प्रवाहित होती रहती है। यह संगीत सुर लहरी एक सुखद शांति का एहसास कराती है। देश दुनिया के विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदाय के लोग आध्यात्मिक शांति की तलाश में यहां आते हैं। बोध गया के निकट ही गया शहर है। गया शहर में भी मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला है।

    खास यह कि बोध गया घूमने का बेहतरीन समय बुद्ध जयंती का अवसर होता है क्योंकि बुद्ध जयंती पर बोध गया में उत्सव जैसा माहौल होता है। महाबोधि मंदिर को लाखों कैंडिल की सहायता से सजाया जाता है। सांझ होते ही महाबोधि मंदिर परिसर रोशनी से जगमगा उठता है। यह इन्द्रधनुषी दृश्य अद्भुत होता है। सुन्दरता का यह दृश्यावलोकन पर्यटकों के मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ता है। यह अनोखा अनुभव हमेशा याद रहने वाला होता है। 

    महाबोधि मंदिर की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्थापित स्तूप के समान है। इस मंदिर में भगवान गौतम बुद्ध की दिव्य-भव्य मूर्ति स्थापित है। मूर्ति पद्मासन की मुद्रा में स्थापित है। मूर्ति के आगे बुद्ध के विशाल पद चिह्न बने हैं। बुद्ध के इन पद चिह्न को धर्मचक्र प्रवर्तन माना जाता है। इस मूर्ति को अनिमेश लोचन भी कहा जाता है। किवदंती है कि मूर्ति ज्ञान प्राप्ति स्थल पर ही स्थापित है। मंदिर के चौतरफा पत्थर की नक्काशीदार रेलिंग है।

    इस रेलिंग को बोध गया में सबसे प्राचीन अवशेष माना जाता है। परिसर में दक्षिण पूर्व दिशा में एक अति समृद्ध पार्क है। इस पार्क में बौद्ध भिक्षु ध्यान साधना करते हैं। मंदिर के पीछे पीपल का वृक्ष है। इसे बोधि वृक्ष कहा जाता है। महात्मा बुद्ध को इस वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
    बताते हैं कि वर्तमान वृक्ष पांचवीं पीढ़ी का वृक्ष है। सुबह एवं शाम मंदिर की आरती एवं घंटा की टंकार से परिवेश अनुगूंजित हो उठता है। मंदिर के उत्तर भाग को चंकामाना नाम से जाना पहचाना जाता है। इस स्थान पर काला पत्थर का कमल का फूल बना है। यह कमल का फूल युद्ध का प्रतीक माना जाता है। 
     मंदिर के उत्तर पश्चिम में छतविहीन भग्नावशेष हैं। इस स्थल को रत्नाधारा के नाम से जाना पहचाना जाता है। बताते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध ने चौथा सप्ताह इस स्थान पर व्यतीत किया था। दंतकथाओं के मुताबिक बुद्ध के गहन ध्यान की अवधि में उनके शरीर से प्रकाश की एक किरण निकली थी। प्रकाश की इस किरण से ध्वज पताकायें अवलोकित हैं।
    बोध गया की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट गया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। एयरपोर्ट से बोध गया की दूरी 7 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन गया जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
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Friday, 20 July 2018

हम्पी : सुन्दर वास्तुकला

   यूं ही कोई शहर विश्व धरोहर नहीं बन जाता बल्कि इसके लिए उसमें अकूत खूबियां होनी चाहिए। जी हां, कर्नाटक के बेल्लारी जिला का शहर हम्पी अकूत खूबियों वाला है।

     कर्नाटक के इस शहर हम्पी को विलक्षण कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। मंदिरों एवं ऐतिहासिक स्मारकों के इस शहर को यूनेस्को ने विश्व विरासत-धरोहर स्थल सूची में शामिल किया है। हम्पी मध्यकालीन हिन्दू साम्राज्य की अवधि में विजय नगर की राजधानी था। 

   तुंगभद्रा नदी के तट पर रचा-बसा हम्पी को पम्पा के नाम से भी जाना जाता है। समृद्धता के शिखर वाला यह शहर अब खण्डहरों के अवशेष तक सीमित रह गया है। विहंगम हम्पी अपनी विशालता से आज भी अतीत के गौरवशाली यशोगान को बयां करता है। 
      चट्टानों एवं विशाल शिलाखण्ड की लम्बी श्रंखलाओं वाला यह शहर अपनी आगोश में पांच सौ से अधिक स्मारक रखता है। इनमें खास तौर से मंदिर, महल, तहखाने, जलाशय, पुराने बाजार, शाही मण्डप, चबूतरे-चौपाल, राजकोष अन्य शाही इमारतों की लम्बी श्रंखला विद्यमान हैं। हम्पी की सामान्यत: हर इमारत वास्तुकला का सुन्दर आयाम है। फिर भी कुछ इमारतों की वास्तुकला एवं हस्तशिल्प नि:संदेह विलक्षण है। 

   बिठाला मंदिर भी यहां के शानदार एवं सुन्दर स्मारकों में शीर्ष पर विद्यमान है। खास यह कि बिठाला मंदिर का मुख्य सभा कक्ष 56 विशेष स्तम्भों पर आधारित है। 
   इन स्तम्भों को थपथपाने से संगीत की स्वर लहरियां अनुगूंजित होती हैं। सभा कक्ष के पूर्व में विशाल शिला रथ है। खास यह कि पत्थर के पहियों वाला यह रथ चलायमान है। कर्नाटक के इस विलक्षण शहर हम्पी में असंख्य आश्चर्य है। किवदंतियां है कि यहां राजा-रानियों को सोना-चांदी, आनाज, रुपये-पैसों से तौला जाता था। बाद में इसे गरीबों को दान कर दिया जाता था।

    रानियों के लिए बड़े-बड़े स्नानागार में मेहराबदार गलियारे, झरोखेदार झज्जे, कमल आकार के फव्वारे आदि की सजावट है। इनके अलावा कमल महल व जनानखाना भी ऐसे ही विशेष हैं।
    खास यह है कि हम्पी एवं उसके आसपास ऐतिहासिक, पौराणिक एवं आध्यात्मिक स्मारकों की एक लम्बी श्रंखला है। हम्पी वस्तुत: पर्वत श्रंखलाओं से घिरा सुन्दर स्थान है। हम्पी में कई प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर हैं। कुछ मंदिर ऐसे हैं जिनमें आज भी पूजा-अर्चना होती है। 
  इतिहासकारों ने इसे किष्किंधा भी कहा है। पत्थरों के इस शहर की खूबसूरती का अंदाज ही कुछ अलग है। हम्पी का पुरातात्विक संग्रहालय भी दर्शनीय है। 
    बडवीलिंग : बडवीलिंग हम्पी में सबसे बड़े आकार का शिवलिंग है। शिवलिंग में तीन आंख का चित्रण है। इनको शिवजी की तीसरी आंख माना जाता है।
   मल्यावंता रघुनाथस्वामी मंदिर : मल्यावंता रघुनाथ स्वामी मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुकला का सुन्दर आयाम है। यह मंदिर भूमि से काफी नीचे बना है। इसका वास्तुशिल्प विलक्षण है। समुद्री जीव तंत्र का सजीव चित्रण यहां की दर-ओ-दीवार पर है।
    हजारा राम मंदिर : हजारा राम मंदिर का धर्म शास्त्र में काफी महत्व है। खास यह कि यह मंदिर 1000 से अधिक लकड़ियों की खोदाई, शिलालेख एवं रामायण काल की प्राचीनता के लिए जाना जाता है। हालांकि अब यह एक खण्डहर मंदिर के तौर पर जाना जाता है।
    विरुपाक्ष मंदिर ; विरुपाक्ष मंदिर को पम्पवाठी मंदिर के नाम से भी जाना-पहचाना जाता है। यह प्राचीन मंदिर हम्पी के बाजार में स्थित है। यह मंदिर विजय नगर साम्राज्य की स्थापना से पहले का है। इस भव्य-दिव्य मंदिर का प्रवेश द्वार 160 फुट ऊंचा है। भगवान शिव के इस मंदिर में भुवनेश्वरी एवं पम्पा की मूर्तियां स्थापित हैं। खास यह कि यहां कई भूमिगत शिव मंदिर हैं।
    हम्पी की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट हुबली है। हुबली से हम्पी की दूरी करीब 216 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कारीगनुरू है। कारीगनुरू से हम्पी की दूरी करीब 10 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
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Sunday, 8 July 2018

इण्डिया गेट : अमर शहीदों को समर्पित

    इण्डिया गेट को देश के अमर शहीदों की शौर्यगाथा स्मारक कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। वस्तुत: इण्डिया गेट अखिल भारतीय युद्ध स्मारक है।

   स्मारक युद्ध के अमर शहीद जवानों को श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है। नई दिल्ली के राजपथ पर स्थित इण्डिया गेट 43 मीटर ऊंचा स्मारक है। इस शहीद स्मारक में भव्य द्वार है। मध्य में अमर शहीदों की स्मृति में ज्योति प्रज्जवलित है।
   इस स्थल को पूर्व में किंग्सवे कहा जाता था। इसका डिजाइन सर एडवर्ड लुटियंस ने तैयार किया था। अमर शहीदों को समर्पित यह स्मारक पेरिस के आर्क डे ट्रायम्फ की डिजाइन पर आधारित है।

    इण्डिया गेट का निर्माण अंग्रेज शासकों ने 90000 भारतीय सैनिकों की स्मृति में कराया था। विशेषज्ञों की मानें तो यह उन भारतीय सैनिकों की स्मृति है जो ब्रिाटिश सेना में भर्ती होकर प्रथम विश्व युद्ध एवं अफगान युद्ध में शहीद हुये थे।
    खास यह है कि 13300 अमर शहीद सैनिकों के नाम इण्डिया गेट स्मारक पर उत्कीर्ण हैं। लाल एवं पीला बलुआ पत्थरों से बना यह स्मारक दर्शनीय है। खास यह कि इण्डिया गेट पर अमर जवान ज्योति प्रज्जवलित है। यह अनवरत जलती रहती है।

    इण्डिया गेट के मेहराब के नीचे अमर जवान ज्योति स्थापित है। सैनिकों की स्मृति में यहां एक राइफल के उपर सैनिक की टोपी सजा दी गयी है। इस राइफल के चारों कोनों पर ज्योति जलती है। इस अमर जवान ज्योति पर प्रति वर्ष देश के प्रधानमंत्री, तीनों सेनाध्यक्ष पुष्प चक्र चढ़ा कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 
   इण्डिया गेट की दीवारों पर हजारों अमर शहीद जवानों के नाम अंकित हैं। खास यह कि सांझ होते ही इस दर्शनीय स्मारक का अवलोकन करने बड़ी संख्या में भीड़ उमड़ती है। नित्य वर्ष गणतंत्र दिवस की परेड राजपथ से इण्डिया गेट होकर गुजरती है। इण्डिया गेट निर्माण की आधारशिला 1921 में ड्यूक ऑफ कनॉट ने रखी थी। 

   स्मारक को पूर्ण होने में 10 वर्ष का समय लगा। करीब दस साल बाद तत्कालीन वायसराय लार्ड इर्विन ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया था। विशेषज्ञों की मानें तो स्मारक के निर्माण में भरतपुर के लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया।
   खास तौर से देखें तो कोने के मेहराब पर ब्रिटानिया सूर्य अंकित हैं। इण्डिया गेट पर बड़े अक्षरों में इण्डिया अंकित है। सांझ होते ही इण्डिया गेट दूधिया रोशनी से जगमगा उठता है। इण्डिया गेट के चारों ओर भव्य-दिव्य पार्क हैं। इन पार्कों में फव्वारों की अच्छी श्रंखला है। इनकी रोशनी भी दर्शनीयता में चार चांद लगा देती है।
    इण्डिया गेट की यात्रा करने के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट नई दिल्ली है। निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली एवं दिल्ली हैं। इनके अलावा सड़क मार्ग से भी यात्रा की जा सकती है।
28.612912,77.229510

Wednesday, 4 July 2018

देवगिरि किला : शानदार वास्तुशिल्प

   देवगिरि किला को श्रेष्ठतम पौराणिक धरोहर कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। कारण असंख्य आक्रमण होने के बावजूद अभी तक किला अभेद्य रहा। 

    महाराष्ट्र के दौलताबाद स्थित इस विलक्षण किला की खूबियों की एक लम्बी श्रंखला है। वास्तु शिल्प की इस सुन्दर कलाकृति को दौलताबाद किला के तौर पर भी ख्याति हासिल है।
     विशेषज्ञों की मानें तो इस अभेद्य किला का निर्माण 11 वीं सदी में किया गया था। करीब दो सौ वर्षों तक ंिहन्दू शासकों ने यहां से शासन किया। भीलम राजा इस विलक्षण किला को अस्तित्व में लाये थे। राजा भीलम एक कुशल एवं शक्तिशाली शासक था। राजा भीलम ने होयसल, चोल एवं चालुक्य राज्यों पर आक्रमण कर विजय श्री हासिल की थी।

    देवगिरि किला की अभेद्य संरचना के कारण इसे भारत का सर्वाधिक सुरक्षित किला माना गया। कई शासकों एवं राजाओं ने इस किला पर आक्रमण किये लेकिन आक्रमणकारी असफल रहे। लिहाजा अभेद्य किला की संज्ञा से नवाजा गया। किला अविजित होने का श्रेय इसकी संरचना को जाता है।
     आैरंगाबाद से करीब 15 किलोमीटर दूर पहाड़ की चोटी पर स्थित इस किला में कई खूबियां हैं। दौलताबाद की दुर्जेय पहाड़ी पर स्थित यह किला एक राष्ट्रीय धरोहर या स्मारक है। करीब 190 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह किला शंख के आकार का है। किला की बाहरी दीवार एवं किला की आधार के बीच तीन भव्य दिवारों की श्रंखला है। इन पर असंख्य बुर्ज बने हैं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो प्राचीन देवगिरि नगरी इसी परकोटे पर बसी थी। सुरक्षा की दृष्टि से किला के आंतरिक क्षेत्र में कई सुरंग हैं। चट्टानों को काट कर बनायी गयीं यह सुरंग बेहद खतरनाक हैं। इस अंधेरा युक्त मार्ग को सुरंग के बजाय अंधेरी की संज्ञा दी गयी थी। इस अंधेरी में कई गड्ढ़े भी हैं जिससे दुश्मन धोखा कर गिर जायें। किला के प्रवेश द्वार पर आग की अंगीठियां भी हैं। जिससे आग की तपिश से दुश्मन को किला में प्रवेश से रोका जा सके। चांद मीनार, चीनी महल एवं बारादरी इस किला के मुख्य स्मारक हैं। 

   खास तौर से चांद मीनार की ऊंचाई 63 मीटर है। तीन मंजिला इस किला में एक भारी भरकम तोप है। इस तोप की मारक क्षमता 3.50 किलोमीटर है। इस तोप को चारों दिशा में घुमा कर चलाया जा सकता है। बताया जाता है कि चार मीनार का निर्माण अलाउद्दीन बहमनी शाह ने दौलताबाद फतह करने के उपलक्ष्य में बनवाया था।
     यह मीनार मुगल वास्तुकला की सुन्दरतम कृतियों में से एक है। मीनार के पीछे जामा मस्जिद है। जामा मस्जिद वास्तु शिल्प का सुन्दर आयाम है। इसी के निकट चीनी महल है। विशेषज्ञों की मानें तो राजा भीलम ने 1187 में स्वतंत्र राज्य स्थापित कर देवगिरि को राजधानी घोषित किया था। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने 1294 में किला पर चढ़ाई की थी। 
     विशेषज्ञों की मानें तो किला फतह के बाद 1327 में मोहम्मद बिन तुगलक ने देवगिरि को अपनी राजधानी बनाया। इसके बाद देवगिरि का नाम बदल कर दौलताबाद कर दिया। बाद में इसे मुगल साम्राज्य में शामिल कर लिया गया था। किला मुगल शासक आैरंगजेब की मृत्यु होने तक मुगल साम्राज्य के अधीन रहा। मुगल शासकों ने दौलताबाद को मुगल साम्राज्य की राजधानी बनाना चाहा लेकिन यह सब हो नहीं सका।
      देवगिरि किला की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट आैरंगाबाद है। आैरंगाबाद देश के सभी प्रमुख हवाई अड्ड़ों से जुड़ा है। निकटतम रेलवे स्टेशन आैरंगाबाद है। आैरंगाबाद से दौलताबाद की दूरी करीब 15 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी दौलताबाद किला की यात्रा कर सकते हैं।
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