Thursday, 19 March 2020

शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर

   शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा एवं विज्ञान का समन्वित स्वरूप है। 

   लिहाजा इसे विश्व का एक अनूठा संस्थान माना जाता है। भारत के पश्चिम बंगाल के जिला बीरभूम में स्थित शांति निकेतन की स्थापना एवं संरचना प्रख्यात साहित्यकार रवीन्द्र नाथ टैगोर ने की थी। 
   कोलकाता से उत्तर दिशा में करीब 180 किलोमीटर दूर स्थित शांति निकेतन वस्तुत: एक शानदार विश्वविद्यालय है। इसकी मान्यता एक अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के तौर पर है। 

   शांति का अर्थ शांत वातावरण होता है जबकि निकेतन से आशय घर से होता है। खास यह कि शांति निकेतन देश दुनिया के विशिष्टजनों के आकर्षण का भी केन्द्र रहा है। कई विख्यात हस्तियां, सत्यजीत रे, गायत्री देवी, नोबल पुरस्कार से अलंकृत अमृत्र्य सेन आदि इत्यादि शांति निकेतन का भ्रमण कर चुके हैं। 

   पर्यटक शांति निकेतन में कला, नृत्य एवं संगीत की प्रवाहमान धारा की सुखद अनुभूति कर सकते हैं। खास यह कि मानसून के मौसम में यहां पौधरोपण का कार्य किया जाता है। 
  लिहाजा शांति निकेतन का परिदृश्य अति शीतल एवं पर्यावरण अति समृद्ध रहता है। इतना ही नहीं, शांति निकेतन परम्परागत बंगाली भोजन के लिए अति प्रसिद्ध है। 

   यहां का विश्व भारती कैम्पस विशाल एवं अति दर्शनीय है। इतना ही नहीं, शांति निकेतन में विशाल पुस्तकालय भी है। खास यह कि शांति निकेतन विशेष संरचनाओं का एक अति समृद्ध समूह क्षेत्र है। शायद इसीलिए शांति निकेतन देश दुनिया के कला प्रेमियों का बेहद पसंदीदा पर्यटन है।

 शांति निकेतन में स्थापित विश्व भारती विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए दुनिया भर से छात्र-छात्राएं आते हैं। कला एवं इतिहास प्रेमियों के लिए शांति निकेतन किसी स्वर्ग की भांति है।
   शांति निकेतन के मुख्य आकर्षण में टैगोर हाउस, अमर कुटीर, कला भवन, छातीमताला, रवीन्द्र भारती म्युजियम आदि इत्यादि बहुत कुछ है। 

   टैगोर हाउस: टैगोर हाउस वस्तुत: शांति निकेतन का मुख्य आकर्षण है। टैगोर हाउस में रवीन्द्र नाथ टैगोर अपना अधिकतर समय व्यतीत करते थे। इस शानदार भवन का निर्माण रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता ने बंगाली शैली में कराया था।
   यह भवन परिसर अति दर्शनीय है। इस भवन में कई कमरे एवं विभिन्न कलाकृतियां दर्शित हैं। कला एवं इतिहास प्रेमियों के लिए टैगोर हाउस किसी ्वर्ग की भांति है। 

   अमर कुटीर: अमर कुटीर शांति निकेतन के खास दर्शनीय स्थलों में एक है। अमर कुटीर में पारम्परिक शैली के हस्त उत्पादों का संग्रह दिखता है। पर्यटक यहां हस्त उत्पाद खरीद भी सकते हैं। 
   रंग-बिरंगे हथकरघा उत्पाद, कपड़े से बने साज सज्जा का सामान आदि इत्यादि उपलब्ध रहता है। वस्तुत: अमर कुटीर एक अति समृद्ध संग्रहालय है। इस संग्रहालय में शिल्प कलाओं का प्रदर्शन है। पर्यटक यहां बंगाली संस्कृति के दर्शन भी कर सकते हैं।
   कला भवन: कला भवन की गणना शांति निकेतन के खास भवनों में होती है। यह भवन वस्तुत: सांस्कृतिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करता है। इस भवन में कला के छात्रों को कलात्मकता की शिक्षा दी जाती है। कला भवन बेहद अद्भुत प्रतीत होता है। प्रवेश द्वार से ही कला भवन के कलात्मक होने का अहसास होने लगता है। 
   छातीमताला: छातीमताला भी शांति निकेतन का एक अन्य आकर्षण है। यह स्थल मुख्य रूप से कला एवं ध्यान के लिए बनाया गया था।

   शांति निकेतन आने वाले पर्यटक छातीमताला की सैर करना नहीं भूलते। हरा भरा परिवेश पर्यटकों को अद्भुत शांति प्रदान करता है। टैगोर से जुड़ा यह स्थल काफी खास माना जाता है। 
  रवीन्द्रनाथ भारती म्युजियम: रवीन्द्रनाथ भारती म्युजियम खास तौर रवीन्द्रनाथ टैगोर से जुड़ी कला रचनाओं का एक बड़ा संग्रह स्थल है।
   बंगाली एवं टैगोर को समझने के लिए पर्यटक यहां की यात्रा कर सकते हैं। कला प्रेमियों के लिए इस स्थान से बढ़कर कुछ आैर नहीं हो सकता। इसे अमूल्य सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर कहा जा सकता है।
   शांति निकेतन की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अन्तरराष्ट्रीय एयरपोर्ट कोलकाता है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोलकाता रेलवे जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी शांति निकेतन की यात्रा कर सकते हैं।
22.478340,88.353260

Wednesday, 18 March 2020

मरीन नेशनल पार्क: जीव जंतुओं की अद्भुत दुनिया

   मरीन नेशनल पार्क को दुनिया का अद्भुत एवं अतुलनीय पार्क कहा जाना चाहिए। जी हां, मरीन नेशनल पार्क में जलचर हैं तो वहीं पक्षियों सहित विभिन्न प्रजातियों के जीव जंतुओं की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। 

   इतना ही नहीं, जलीय पौधे मरीन नेशनल पार्क की शान एवं शोभा हैं। भारत के गुजरात के जिला जामनगर के कच्छ की खाड़ी स्थित यह नेेशनल पार्क बेहद आकर्षक है। 

   करीब 458 वर्ग किलोमीटर में फैला मरीन नेशनल पार्क घूमने एवं सैर सपाटा के लिए बेहतरीन है। इसे गुजरात पर्यटन का मुख्य आकर्षण कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   मरीन नेशनल पार्क में सियार, वन बिलार, जंगली बिल्ली, हरा समुद्री कछुआ, शाही ईगल, राजहंस आदि इत्यादि को आसानी से देखा जा सकता है। कछुआ की विभिन्न प्रजातियां भी मरीन नेशनल पार्क की शान एवं शोभा हैं। रंग-बिरंगी विभिन्न आकार-प्रकार की मछलियां भी अति दर्शनीय हैं। 

   इतना ही नहीं, बोरारिलिया पेड़ों की विभिन्न प्रजातियां भी दर्शक यहां देख सकते हैं। पक्षी प्रेमियों के लिए मरीन नेशनल पार्क किसी स्वर्ग की भांति है। विशेषज्ञों की मानें तो मरीन नेशनल पार्क प्रवासी पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियां आसानी से देखी जा सकती हैं।

   कच्छ की खाड़ी के दक्षिणी तट का यह इलाका अति दर्शनीय है। विशेषज्ञों की मानें तो मरीन नेशनल पार्क भारत का पहला समुद्री अभयारण्य है। वर्ष 1982 में स्थापित मरीन नेशनल पार्क गुजरात के वन विभाग के अधीन संचालित है। 

   इस शानदार पार्क में कच्छ सहित आसपास केे 42 द्वीप शामिल हैं। लिहाजा पार्क विभिन्न लोक संस्कृतियों से भी आलोकित है। खास यह कि मरीन नेशनल पार्क में जल के नीचे दुर्लभ एवं रंगीन जीवों का एक अद्भुत संसार दिखता है। 

   जल के नीचे का परिदृश्य किसी स्वप्नलोक सा है। यह जलीय मनोरम जंगल बेहद दर्शनीय है। खास यह कि मरीन नेशनल पार्क को मूंगा एवं अन्य रत्नों के लिए भी जाना एवं पहचाना जाता है।

   विशेषज्ञों की मानें तो मरीन नेशनल पार्क का मूंगा देश दुनिया में अपनी एक खास पहचान रखता है। इस अभयारण्य में विशेष प्रजाति के बारहसिंघा भी पाए जाते हैं। हालांकि बारहसिंघा विश्व में कम ही पाये जाते हैं। 
   मरीन नेशनल पार्क की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सरदार वल्लभ भाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट जामनगर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जामनगर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी मरीन नेशनल पार्क की यात्रा कर सकते हैं।
22.470140,70.057710

Monday, 16 March 2020

उदयपुर: स्थापत्य कला का सौन्दर्य

   उदयपुर को स्थापत्य कला का एक शानदार एवं अतुलनीय शहर कहा जाना चाहिए। जी हां, उदयपुर का शिल्प शास्त्र इन्द्रधनुषी है। 

   लिहाजा उदयपुर पर्यटन के मानचित्र पर वैश्विक ख्याति रखता है। शायद यही कारण है कि उदयपुर की विलक्षण एवं अद्भुत छवि निहारने वैश्विक पर्यटक खिंचे चले आते हैं। 
  भारत के प्रांत राजस्थान के अति दर्शनीय शहर उदयपुर का अपना एक पौराणिक अस्तित्व है तो वहीं सौन्दर्य शास्त्र की एक शानदार परिभाषा भी है। 

   उदयपुर का अपना एक इतिहास, संस्कृति एवं सभ्यता है। इतना ही नहीं, उदयपुर अपने विशिष्ट सौन्दर्य के लिए दुनिया में विशेष ख्याति रखता है। मान्यता है कि उदयपुर को वर्ष 1559 में महाराणा उदय सिंह अस्तित्व में लाये थे। 

  खास यह कि उदयपुर झीलों के विशेष सौन्दर्य के लिए जाना एवं पहचाना जाता है। उदयपुर सिसोदिया राजवंश शासित मेवाड़ की राजधानी रहा है। सांस्कृतिक महत्व वाला शहर उदयपुर अपनी आगोश में आकर्षण की एक लम्बी श्रंखला रखता है। 

   इनमें खास तौर से पिछोला झील, जग निवास द्वीप, जग मंदिर, सिटी पैलेस, शिल्प ग्राम, सज्जनगढ़, फतेह सागर, मोती मगरी, बाहुबली हिल्स एवं सहेलियों की बाड़ी आदि इत्यादि बहुत कुछ दर्शनीय है।
   पिछोला झील: पिछोला झील का अपना एक पौराणिक महत्व होने के साथ सौन्दर्य शास्त्र भी है। खास यह कि इस झील का निर्माण एक बंजारा परिवार ने किया था। 

   महाराणा उदय सिंह ने शहर को अस्तित्व देने के साथ ही झील का विकास किया था। इस विशाल झील में दो द्वीप हैं। इन द्वीप में जग निवास महल एवं जग मंदिर बने हुए हैं। यह दोनो महल राजस्थानी शिल्पांकन का अनुपम उदाहरण है।

   जग निवास महल: जग निवास महल ने अब एक आलीशान होटल का स्वरूप ले लिया है। कोर्टयार्ड, कमल का तालाब, आम के वृक्ष, स्वीमिंग पूल आदि इत्यादि यहां के खास आकर्षण हैं। 
   जग मंदिर: जग मंदिर वस्तुत: पिछोला झील का एक शानदार महल है। इस महल का निर्माण महाराजा करण सिंह ने करवाया था। किन्तु महाराजा जगत सिंह ने विस्तार देने के साथ ही खूबसूरती भी दी। इसे गोल्डन महल भी कहा जाता है। इसकी दुर्लभ सुन्दरता पर्यटकों को मुग्ध कर लेती है। 

   सिटी पैलेस: सिटी पैलेस वस्तुत: उदयपुर की शान एवं शोभा है। विशेषज्ञों की मानें तो सिटी पैलेस उदयपुर का सबसे बड़ा एवं सुन्दर महल है। इस महल का निर्माण महाराणा शहर के संस्थापक महाराणा उदय सिंह ने कराया था।
   शिल्प ग्राम: शिल्प ग्राम वस्तुत: कलात्मक प्रदर्शन का एक शानदार स्थल है। पर्यटक शिल्प ग्राम में शास्त्रीय संगीत से लेकर लोक संगीत आदि इत्यादि का आनन्द ले सकते हैं। 
   सज्जनगढ़: सज्जनगढ़ वस्तुत: एक शानदार एवं अति दर्शनीय महल है। शहर के दक्षिणी इलाके में स्थित अरावली पर्वत माला के शिखर पर सज्जनगढ़ महल है। इसका निर्माण महाराजा सज्जन सिंह ने कराया था। गर्मियों में यहां की शीतलता तन एवं मन को प्रसन्न कर देती है। 
   सांझ होते ही सज्जनगढ़ महल रोशनी से जगमगा उठता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे धरती पर स्वर्ग उतर आया हो। सज्जनगढ़ से उदयपुर की शानदार झीलों का दर्शन हो सकता है। खास यह कि पहाड़ की तलहटी पर एक शानदार अभयारण्य भी है। 

   फतेह सागर: फतेह सागर उदयपुर का एक खास आकर्षण है। महाराजा जय सिंह ने झील का निर्माण कराया था। बाद में महाराणा फतेह सिंह ने इसको सुन्दर स्वरूप प्रदान किया। इस झील के बीच में एक सुन्दर बगीचा है। पर्यटक यहां नौकायन का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। 
   मोती मगरी: मोती मगरी वस्तुत: उदयपुर का एक शानदार स्मारक है। मोती मगरी में महाराणा प्रताप की दिव्य भव्य प्रतिमा स्थापित है। मोती मगरी फतेह सागर के पास एक पहाड़ी पर स्थित है। यहां के सुन्दर बाग बगीचे बेहद सुन्दर एवं दर्शनीय हैं। विशेषकर जापानी रॉक गार्डेन देखते ही बनता है।
   उदयपुर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट उदयपुर एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन उदयपुर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी उदयपुर की यात्रा कर सकते हैं।
24.576111,73.700500

Sunday, 15 March 2020

करौली : लाल पत्थरों का अतुलनीय सौन्दर्य

    करौली को अतुलनीय शहर कहा जाना चाहिए। जी हां, करौली वस्तुत: लाल पत्थरों का चमकता शहर है। लिहाजा इसे अद्भुत एवं अतुलनीय शहर कहा जाना चाहिए। 

   भारत के अति दर्शनीय प्रदेश राजस्थान के शहर करौली को पर्यटकों का बेहद पसंदीदा शहर माना जाता है। खास यह कि करौली के रमणीक स्थल, धार्मिक स्थल एवं महातीर्थ, महल-हवेलियां, किला एवं स्मारक आदि इत्यादि पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

   मध्य प्रदेश की सीमा से लगा राजस्थान का यह शहर बेहद दर्शनीय है। इसे लाल पत्थरों का चमकता शहर भी कहा जाता है। खास यह कि इस शहर की एक सीमा रणथम्भौर से जुड़ती है। लिहाजा पर्यटक करौली से रणथम्भौर के शेरों की दहाड़ भी सुन सकते हैं।

   लिहाजा पर्यटक करौली की यात्रा के दौरान रोमांच का खास एहसास कर सकते हैं। लाल पत्थरों की इमारतें करौली को काफी कुछ खास बना देती हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि लाल पत्थर करौली की प्राकृतिक सम्पदा है। प्राकृतिक सम्पदा का यह लाल पत्थर ही शहर की खास चमक बन गया। 

   इतना ही नहीं, करौली का लाल पत्थर सम्पूर्ण भारत को सप्लाई किया जाता है। करौली के दर्शनीय स्थल पर्यटकों को मुग्ध कर लेते हैं। खास तौर से करौली की छतरियां एवं हवेलियां वास्तुशिल्प का मुख्य आकर्षण हैं। ऐतिहासिक किलों एवं मंदिरों के लिए प्रसिद्ध करौली बेहद दर्शनीय पर्यटन है। करौली का एक आकर्षण चंबल भी है। 

   हालांकि करौली एवं उसके आसपास आकर्षक स्थलों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। इनमें खास तौर सेे सिटी पैलेस, भंवर विलास महल, तिमनगढ़ किला, देवगिरी किला, उत्गीर किला, कैला देवी मंदिर, मदन मोहन मंदिर, मेंहदीपुर बालाजी मंदिर, महावीर मंदिर आदि इत्यादि हैं।
   भंवर विलास महल: भंवर विलास महल एक राजसी महल है। पर्यटक अभी भी भंवर विलास महल में राजसी ठाठ का एहसास कर सकते हैं। आंतरिक क्षेत्र अभी भी प्राचीन साज सज्जा से आलोकित है। इस शानदार महल का निर्माण 1938 में महाराजा गणेश पाल देव बहादुर ने कराया था। इसका निर्माण शाही निवास के तौर पर किया गया था।

   सिटी पैलेस: सिटी पैलेस का निर्माण 14वीं शताब्दी में राजा अर्जुनपाल के द्वारा कराया गया था। हालांकि इसके स्वरूप में निखार लाने का श्रेय राजा गोपाल सिंह को दिया गया। इस शानदार महल की नक्काशी, जाली-झरोखे, भित्तिचित्र आदि इत्यादि अति दर्शनीय एवं लुभावने हैं।
   खूबसूरत रंग एवं शैली इस महल को काफी कुछ विशिष्ट बना देते हैं। लाल पत्थरों के साथ सफेद पत्थरों का संयोजन बेहद दर्शनीय है। इस महल के शीर्ष से भद्रावती नदी का सौन्दर्य देखते ही बनता है। इतना ही नहीं, यहां से करौली शहर का नयनाभिराम दृश्य भी दिखता है। 
   तिमनगढ़ किला: तिमनगढ़ किला करौली से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित है। राजा तिमनपाल का यह किला 11वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया था। यह एक पौराणिक स्मारक है।

   देवगिरी किला: देवगिरी किला करौली से करीब 70 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। चंबल नदी की सुन्दर घाटियों के बीच स्थित यह किला अपनी शान एवं शोभा के लिए जाना एवं पहचाना जाता है।
   देवगिरी किला करौली राजवंश की धरोहर है। करौली राजवंश आपातकाल में इस किला का उपयोग सैन्य रक्षक दुुर्ग के रूप में करते थे। 
   कैला देवी मंदिर: कैला देवी मंदिर शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। त्रिकुट पर्वत की पहाड़ियों के बीच कालीसिल नदी के किनारे बना यह मंदिर वास्तुशिल्प का अतुलनीय उदाहरण है। मान्यता है कि यह मंदिर नौ शक्तिपीठों में से एक है। 
   मदन मोहन मंदिर: मदन मोहन मंदिर का सौन्दर्य शास्त्र अद्भुत है। भगवान श्री कृष्ण को समर्पित यह मंदिर बेहद भाग्यशाली माना जाता है। मध्ययुगीन मंदिर भगवान श्री कृष्ण एवं उनकी संगिनी राधा रानी के लिए जाना एवं पहचाना जाता है। इसकी स्थापत्य कला अति सुन्दर एवं लुभावनी है। खास यह कि मदन मोहन मंदिर सिटी पैलेस से जुड़ा हुआ है। 
   महावीर मंदिर: महावीर मंदिर वास्तुशिल्प की अतुलनीय संंरचना है। इसका निर्माण 19 वीं सदी में किया गया था। महावीर जी का यह मंंदिर वस्तुत: जैन तीर्थ है। इस मंदिर की इमारत जैन शैली पर आधारित है। खास यह कि इस मंदिर की ख्याति देश दुनिया में है।
   करौली राजस्थान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सांगानेर एयरपोर्ट जयपुर है। जयपुर से करौली की दूरी करीब 160 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन हिण्डौन सिटी रेलवे जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी करौली की यात्रा कर सकते हैं।
26.495400,77.016400

Friday, 13 March 2020

सिंधुदुर्ग किला: अद्भुत स्थापत्यकला

   सिंधुदुर्ग किला को अरब सागर का एक अति दर्शनीय द्वीप कहा जाना चाहिए। जी हां, सिंधुदुर्ग किला अरब सागर की गोद में रचा-बसा एक शानदार किला है। 

   समुद्र की गोद में संरचित यह किला किसी द्वीप की भांति दिखता है। भारत के प्रांत महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिला स्थित सिंधुदुर्ग किला स्थापत्य कला की एक सुन्दर संरचना है। समुद्र में तैरता द्वीप नुमा यह किला अति सुन्दर प्रतीत होता है।

   महाराष्ट्र के मालवन में स्थित सिंधुदुर्ग किला अपनी विशिष्टताओं के लिए देश दुनिया में जाना एवं पहचाना जाता है। 
  सिंधुदुर्ग शब्द की उत्पत्ति हिन्दी एवं संस्कृत से मिल कर हुयी है। सिंधु का अर्थ समुद्र से होता है जबकि दुर्ग का शाब्दिक अर्थ किला से है। लिहाजा इसे समुद्र का किला कह सकते हैं।

  विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1664 में इस दिव्य-भव्य किला का निर्माण महाराजा छत्रपति शिवाजी ने कराया था। विशेषज्ञों की मानें तो सिंधुदुर्ग किला महाराजा छत्रपति शिवाजी द्वारा बनवाए गये किलों में से एक है। 

   समुद्र तट से कुछ दूर स्थित सिंधुदुर्ग किला का महत्व एक नौसैनिक किला के तौर पर भी है। दक्षिण महाराष्ट्र में कोंकण क्षेत्र में स्थित सिंधुदुर्ग किला बेहद अद्भुत एवं विलक्षण है। यह किला प्राचीन वास्तुकला का सुन्दर उदाहरण है।

   दक्षिण मुम्बई से करीब 450 किलोमीटर दूर स्थित सिंधुदुर्ग किला एक विशाल पथरीली चट्टान पर संरचित है। नौका की सवारी कर इस दिव्य भव्य किला तक पहुंचा जा सकता है।

   खास यह कि इस किला के नाम पर ही महाराष्ट्र के इस जिला का नाम आधारित है। चौतरफा अरब सागर से घिरा यह किला प्राचीन काल में मराठा शासकों का मुख्यालय हुआ करता था।
  सिंधुदुर्ग किला में मराठा शासक युद्ध की तैयारी किया करते थे। खास तौर से देखें तो सिंधुदुर्ग किला मराठा शासकों का सुरक्षा गृह भी हुआ करता था। 

  सिंधुदुर्ग किला तीन वर्ष की अवधि में बन कर तैयार हुआ था। संरचना में 100 से अधिक वास्तुकारों ने योगदान दिया था। करीब 3000 श्रमिकों ने अनवरत तीन वर्ष तक कार्य किया था। इसके बाद सिंधुदुर्ग किला अपने दिव्य भव्य स्वरूप में सामने आया। 

   करीब 48 एकड़ भूमि पर बेहद मजबूती के साथ खड़ा यह किला अब वैश्विक आकर्षण का केन्द्र है। करीब 29 फुट ऊंचाई वाला यह किला करीब दो मील तक फैला है। सिंधुदुर्ग किला की नींव अत्यधिक मजबूत है। किला की नींव में करीब 4000 लोहे के टीलों का इस्तेमाल किया गया। 

   सिंधुदुर्ग किला एवं आसपास आकर्षण की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। सिंधुदुर्ग किला में नारियल के सुन्दर पेड़ों की एक शानदार श्रंखला विद्यमान है। किला के नारियल पेड़ों में फल भी होते हैं। 
  खास यह कि सिंधुदुर्ग किला के नारियल पेड़ों में शाखाओं की विशिष्टता दिखती है। किला के आंतरिक क्षेत्र में बेहतरीन कुएं भी हैं।

   खास यह कि सिंधुदुर्ग किला के सुन्दर जलाशय कभी नहीं सूखते। हालांकि गरमी के दिनों में आसपास के इलाकों के गांव के कुआं आदि सूख जाते हैं। 
   सिंधुदुर्ग किला की स्थापत्य कला में वास्तुकारों की कार्यकुशलता भी दिखती है। पानी के नीचे स्थित मार्ग भी कार्यकुशलता का एक विस्मयकारी आयाम है। यह मार्ग किला के अंदर स्थित एक मंदिर में स्थित है।

   हालांकि यह क्षेत्र एक जलाशय की भांति प्रतीत होता है। यह मार्ग सिंधुदुर्ग किला के नीचे करीब तीन किलोमीटर तक जाता है। इस मार्ग का समुद्र में करीब 12 किलोमीटर तक अस्तित्व है। इस विलक्षण सिंधुदुर्ग किला में बहुत कुछ रहस्यमय है। सिंधुदुर्ग किला में कई शानदार मंदिर भी हैं। 

   इनमें खास तौर से देवी भवानी मंदिर, हनुमान मंदिर, जरिमारी मंदिर आदि इत्यादि हैं। सिंधुदुर्ग किला के मंदिर भी विशिष्टता के लिए दुनिया भर में जाने पहचाने जाते हैं। यहां भगवान शिव को समर्पित दिव्य भव्य मंदिर है। 
   मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान शिव के हस्त चिह्न एवं पद चिह्न विद्यमान हैं। पर्यटक सिंधुदुर्ग किला में वाटर गेम्स का भी आनन्द ले सकते हैं। सिंधुदुर्ग किला का हर आयाम अनूठा एवं अद्वितीय है।
   सिंधुदुर्ग किला की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट डम्बोलिन एयरपोर्ट गोवा है। एयरपोर्ट से सिंधुदुर्ग किला की दूरी करीब 98 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कनकवल्ली रेलवे स्टेशन है। कनकवल्ली रेलवे स्टेशन से सिंधुदुर्ग किला की दूरी करीब 25 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी सिंधुदुर्ग किला की यात्रा कर सकते हैं।
16.056800,73.470900

शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...