Friday, 29 November 2019

जंतर मंतर: वैज्ञानिक उन्नति का आयाम

   जंतर मंतर को दिल्ली की शान एवं शोभा कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। इस खगोलीय संरचना का वास्तुशिल्प अति दर्शनीय है। 

   भारत की राजधानी के कनॉट प्लेस के निकट स्थित जंंतर मंतर एक शानदार एवं दर्शनीय वेधशाला है। वेधशाला का निर्माण महाराजा जय सिंह ने वर्ष 1724 में कराया था। यह इमारत प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है।

  हालांकि महाराजा जय सिंह ने जयपुर, उज्जैन, मथुरा एवं वाराणसी में वेधशाला का भव्य दिव्य निर्माण कराया था। दिल्ली स्थित जंतर मंतर वेधशाला काफी कुछ विशिष्टता को दर्शाता है।

  दिल्ली का जंतर मंतर वेधशाला वस्तुत: समरकंद की वेधशाला से प्रेरित है। खगोल शास्त्र के अध्ययन एवं अध्यापन को लेकर खास तौर से इस वेधशाला का निर्माण किया गया था। 

   वेधशाला में ग्रहों की गति मापन के लिए जंतर मंतर पर कई उपकरण स्थापित किये गये हैंं। मसलन सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से समय एवं ग्रहों की जानकारी देता है। इसी प्रकार मिरुा यंत्र वर्ष के सबसे छोटे दिन एवं सबसे बड़े दिन की जानकारी देता है। 

   इसी प्रकार राम यंत्र एवं जय प्रकाश यंत्र खगोलीय पिंड़ों की गति के बारे में जानकारी प्रदान करता है। विशेषज्ञों की मानें तो महाराजा जय सिंह को गणतीय गणनाओं में अत्यधिक रूचि थी लिहाजा वेधशालाओं की संरचना की गयी थी। 

   महाराजा जय सिंह ने बाल्यावस्था से ही खगोल विज्ञान एवं ज्योतिष शास्त्र का विधिवत अध्ययन किया।

  जंतर मंतर वेधशाला मेें सम्राट यंत्र, नाड़ी वलय यंत्र, दिगंश यंत्र, भित्ति यंत्र, मिरुा यंत्र आदि इत्यादि संरचित हैं। कनॉट प्लेस में स्थित जंतर मंतर स्थापत्य कला की एक शानदार संरचना है। 

   इसमें 13 खगोलीय यंत्र लगे हैं। महाराजा जय सिंह द्वारा डिजाइन की गयी यह वेधशाला काफी कुछ अद्भुत एवं विलक्षण है।

   मान्यता है कि महाराजा जय सिंह ने खुद अपने हाथों से यंत्रों के मोम के मॉडल तैयार किये थे। 

   इस वेधशाला को तैयार करने में करीब 10 वर्ष का समय लगा था। वर्ष 1734 में यह वेधशाला बन कर तैयार हो सकी थी।

   दिल्ली स्थित जंतर मंतर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी इण्टरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली है। 

   निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी जंतर मंतर की यात्रा कर सकते हैं।
28.623989,77.215942

Thursday, 28 November 2019

रत्नागिरी: अरब सागर की शान एवं शोभा

   रत्नागिरी को पौराणिक एवं ऐतिहासिक धरोहर का शहर कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। अरब सागर की शान एवं शोभा रखने वाला रत्नागिरी अद्भुत एवं विलक्षण है। 

   रत्नागिरी खास तौर से समुद्र तटों, पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्मारकों, लाइट हाउस सहित असंख्य खूबियां रखता है। समुद्र तट के शौकीन पर्यटकों के लिए रत्नागिरी किसी स्वर्ग से कम नहीं है। भारत के महाराष्ट्र राज्य का रत्नागिरी शहर प्राकृतिक सौन्दर्य का विशिष्ट आयाम है।

   शायद यही कारण है कि रत्नागिरी वैश्विक पर्यटकों के विशेष आकर्षण का केन्द्र रहता है। रत्नागिरी समुद्र तटों के साथ ही अल्फांसो आम के लिए दुनिया भर मेें जाना पहचाना जाता है। 
   अल्फांसो आम को भारतीय आम का राजा भी कहा जाता है। मुम्बई से करीब 350 किलोमीटर एवं पुणे से करीब 308 किलोमीटर दूर स्थित रत्नागिरी वस्तुत: अरब सागर का एक शानदार बंदरगाह शहर है। 

  महाराष्ट्र के दक्षिण-पश्चिम इलाके में स्थित रत्नागिरी शहर सहयाद्री पर्वतमालाओं से घिरा है। सहयाद्री पर्वत श्रंखलाओं का प्राकृतिक सौन्दर्य अति दर्शनीय है। खास यह भी है कि रत्नागिरी बाल गंगाधर तिलक की जन्मस्थली है। सहयाद्री की खूबसूरत पहाड़ियां रत्नागिरी की शान एवं शोभा हैं। 

   बीजापुर एवं सतारा शासकों की राजधानी रह चुका रत्नागिरी पौराणिक धरोहरों के लिए भी खास तौर से जाना पहचाना जाता है। रत्नागिरी कोंकण का एक अति महत्वपूर्ण हिस्सा है। 
  पर्यटक रत्नागिरी की यात्रा पर एक खास रोमांच का एहसास करते हैं। पर्यटक रत्नागिरी पर सुन्दर समुद्र तटों, ऐतिहासिक इमारतों एवं शांत मंदिरों की विशिष्टता रखता है। यह आकर्षण पर्यटकों को मुग्ध कर लेता है। 

   रत्नागिरी का मांडवी बीच अति दर्शनीय एवं प्रसिद्ध है। गणेशगुले बीच, भटवे बीच, गणपति बुले बीच आदि इत्यादि रत्नागिरी का खास आकर्षण हैं। समुद्र तटों के अलावा रत्नागिरी किला, थिबाव पैलेस, रत्नागिरी प्रवेश द्वार, गणपति मंदिर, विजय दुर्ग किला, जयगढ़ किला एवं लाइट हाउस बेहद दर्शनीय एवं आकर्षक हैं।
   रत्नागिरी का एक मुख्य आकर्षण अली संग्रहालय है। देवी भगवती का मंदिर भी खास है। इसका वास्तुशिल्प बेहद सुन्दर है। रत्नागिरी की यात्रा का सबसे बेहतरीन समय अक्टूबर से फरवरी एवं नवम्बर से जनवरी की अवधि है। 
   जयगढ़ किला: जयगढ़ किला की संरचना 17वीं शताब्दी में हुई थी। जयगढ़ किला वस्तुत: एक खड़ी पहाड़ी पर बना सुन्दर वास्तुशिल्प है। संगमेश्वर नदी के तट पर स्थित यह शानदार किला अति दर्शनीय है।


    रत्नागिरी किला: रत्नागिरी किला का निर्माण बहमनी काल में हुआ था। इस किला का आकार प्रकार घोड़े की नाल पर आधारित है। इसकी लम्बाई 1300 मीटर एवं चौड़ाई 1000 मीटर है। यह किला तीन दिशाओं में समुद्र से घिरा है। इस किला का एक बुर्ज सिद्धा लाइट हाउस के रूप में कार्य करता है। 
  इस दिव्य भव्य किला में देवी भगवती का शानदार मंदिर है। खास यह कि किला की तीन दिशाओं में समुद्र का खारा जल होने केे बावजूद किला के कुंआ का जल मीठा है।  
   बौद्ध मठ: बौद्ध मठ की विशालता देखते ही बनती है। दो मंजिला इस मठ में एक विशाल आंगन है। बौद्ध भिक्षुओं के प्रवास के लिए कक्षों की बेहतरीन संख्या खास है। मंदिरों के अलावा हजारों की संख्या में स्तूप एवं असंख्य मूर्तियां बौद्ध मठ की शान एवं शोभा हैं। 
    थीवा महल: थीवा महल का निर्माण 1910 में हुआ था। यह महल अपनी विशिष्टताओं के लिए जाना पहचाना जाता है। राजवंश की समाधि भी इस महल में हैं।
  मालगूंड: मालगूंड वस्तुत: प्रसिद्ध मराठी कवि केशवसूत का जन्म स्थान है। वस्तुत: यह एक छोटा सा गांव है। केशवसूत के घर को अब एक स्मारक का स्वरूप दे दिया गया है।
   पावस: पावस एक आध्यात्मिक स्थान है। यह स्थान महाराष्ट्र के आध्यात्मिक गुरु स्वामी स्वरूपानन्द से ताल्लुक रखता है। इस दिव्य-भव्य स्थान को एक आश्रम का स्वरूप दिया गया है। 
   वेलनेश्वर: वेलनेश्वर रत्नागिरी से करीब 170 किलोमीटर दूर स्थित है। एक शानदार समुद्र तट पर स्थित वेलनेश्वर अति दर्शनीय है। नारियल के शानदार वृक्षों से आच्छादित वेलनेश्वर में एक अति प्राचीन शिव मंदिर है। यह मंदिर शैव धर्म से ताल्लुक रखता है।
   गणपतिपुलेे: गणपतिपुले रत्नागिरी से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी का दिव्य भव्य मंदिर है। इसे स्वयंभू मंदिर भी कहते हैं। मान्यता है कि गणेश जी के दर्शन मात्र से इच्छाओं की पूर्ति होती है।
   रत्नागिरी की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट छत्रपति शिवाजी महाराज इण्टरनेशनल एयरपोर्ट मुम्बई है। एयरपोर्ट से रत्नागिरी की दूरी करीब 346 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेेशन रत्नागिरी जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी रत्नागिरी की यात्रा कर सकते हैं।
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Monday, 18 November 2019

कलिंग घाटी: आैषधीय वनस्पतियों का खजाना

   कलिंग घाटी का प्राकृतिक सौन्दर्य निश्चित पर्यावरणीय इन्द्रधनुषी आयाम कहा जाना चाहिए। जी हां, कलिंग घाटी का शानदार एवं सुन्दर परिवेश सदैव सुगंध से लबरेज रहता है। 

   लिहाजा पर्यटक कलिंग घाटी के प्राकृतिक एवं पर्यावरणीय सौन्दर्य पर मुग्ध हो जाते हैं। इसे पौराणिक एवं ऐतिहासिक धरोहर के तौर पर देखा जाता है।
   भारत के ओड़िशा के कंधमाल जिला के फूलबानी-बरहामपुर रोड़ पर स्थित कलिंग घाटी को वैश्विक ख्याति हासिल है। इसे आैषधीय वनस्पतियों का दुर्लभ खजाना भी कह सकते हैं। 
    फूलबानी से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित कलिंग घाटी सिल्वीकल्चर गार्डेन एवं आैषधीय वनस्पतियों के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है। खास यह है कि इस सुन्दर घाटी के निकट ही दशमिल्ला स्थान है। दशमिल्ला में ही सम्राट अशोक ने कलिंग का युद्ध लड़ा था।

    दशमिल्ला कलिंग युद्ध के लिए जाना जाता है। कलिंग घाटी आैषधीय वनस्पतियों के लिए देश दुनिया में विशिष्ट स्थान रखती है। विशेषज्ञों की मानें तो इस दुर्लभ घाटी में दुनिया की दुर्लभ आैषधीय वनस्पतियों की उपलब्धता बड़ी तादाद में है। सिल्वीकल्चर गार्डेन में रबर एवं बांस की विभिन्न प्रजातियां खास तौर से हैं।

   यह घाटी सुगंध से सदैव महकती रहती है। वन्य जीवन का कोलाहल इस शानदार घाटी को गुलजार रखता है। वस्तुत: कलिंग घाटी एशियाई हाथियों का शानदार आशियाना है। झीलों-झरनों का यह इलाका अति दर्शनीय है। कलिंग घाटी एवं आसपास दर्शनीय एवं आकर्षक स्थानों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। 

   प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच रचा बसा पक्काझार झरना कलिंग घाटी का एक खास आकर्षण है। करीब 60 फुट की ऊंचाई से गिरने वाले इस झरना का सौन्दर्य देखते ही बनता है। प्राकृतिक सघन वन क्षेत्र में स्थित यह झरना कलिंग घाटी की शान एवं शोभा माना जाता है। 

   राशिमल पर्वत श्रंखलाओं का यह इलाका राशिकुल्या नदी का उद्गम स्थल भी है। पहाड़ी की चोटी पर एक शानदार प्राचीन गुफा भी है। जिसे रशगंपुंडा के नाम से जाना जाता है। वस्तुत: देखें तो पक्काझार झरना, डुंगी, मंदसुरु कुटी एवं बेलघर आदि इत्यादि कलिंग घाटी के मुख्य आकर्षण हैं।
   डुंगी : डुंगी वस्तुत: कंधमाल का एक मात्र पुरातात्विक क्षेत्र है। फूलबानी से करीब 45 किलोमीटर दूर फूलबानी-बरहामपुर रोड स्थित डुंगी को राष्ट्रीय धरोहर के तौर पर मान्यता हासिल है। विशेषज्ञों की मानें तो 11वीं शताब्दी में यहां एक अति दर्शनीय बौद्ध विहार था। 

   बौद्ध विहार नष्ट हो जाने के बाद डुंगी में एक विशाल शिव मंदिर अस्तित्व में आया। विशेषज्ञों की मानें तो शिव मंदिर निर्माण की अवधि में इस क्षेत्र में बौद्ध विहार के अवशेष मिलेे थे। इन अवशेष का प्रदर्शन शिव मंदिर में किया गया। हालांकि बौद्ध विहार से प्राप्त बुद्ध प्रतिमा को राज्य संग्रहालय भुवनेश्वर ओड़िशा में प्रदर्शित किया गया।

   मंदसरु कुटी: मंदसरु कुटी वस्तुत: एक शानदार एवं अति प्राचीन चर्च है। फूलबानी से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित मंदसरु कुटी वस्तुत: एक अति दर्शनीय गांव है। इस गांव के बाहर एक सुन्दर चर्च है।

    इस चर्च को मंदसरु कुटी के नाम से जाना पहचाना जाता है। चौतरफा पहाड़ियों से घिरा मंदसरु अति दर्शनीय क्षेत्र है। घाटियों-वादियों का यह इलाका वस्तुत: एक शानदार पिकनिक स्पॉट है। पहाड़ों की गूंजती प्रतिध्वनि पर्यटकों को रोमांचित करती है। 
   बेलघर: बेलघर वस्तुत: प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्भुत दर्शन कराता है। कुटिया खोटा जनजातियों की बहुलता वाला यह इलाका अपनी एक अलग संस्कृति एवं रहन-सहन को दर्शाता है। दोस्ताना स्वभाव बेलघर के बाशिंदों की खासियत है। समुद्र तल से करीब 2555 फुट की ऊंचाई पर स्थित बेलघर को रोमांचक यात्राओं के लिए जाना पहचाना जाता है। निकट ही कोटा वन्य जीव अभयारण्य है।

    कलिंग घाटी की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बीजू पटनायक इण्टरनेशनल एयरपोर्ट भुवनेश्वर है। एयरपोर्ट से कलिंग घाटी की दूरी करीब 220 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन बरहामपुर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी कलिंग घाटी की यात्रा कर सकते हैं।
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Thursday, 14 November 2019

उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाएं: अनुपम सौन्दर्य

   उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाएं को प्राचीन काल की स्थापत्य कला की अनुपम धरोहर कहा जाना चाहिए। वस्तुत: यह प्राचीन गुफाएं ऋषि-मुनियों के जीवन, रहन-सहन को रेखांकित करती हैं। 

   भारत के उड़ीसा प्रांत के भुवनेश्वर के निकट स्थित यह प्राचीन गुफाएं राष्ट्रीय धरोहर हैं। भुवनेश्वर के सन्निकट वस्तुत: यह दो पहाड़ियां है। इन पहाड़ियों को उदयगिरि एवं खण्डगिरि के नाम से जाना एवं पहचाना जाता है।

   इन पहाड़ियों को आंशिक तौर पर गुफाओं का स्वरूप दिया गया है। इन गुफाओं का ऐतिहासिक, पौराणिक एवं पुरातात्विक महत्व है। प्राचीन शिलालेख में इसका वर्णन कुमारी पर्वत के तौर पर किया गया है। खास यह कि यह उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाएं एक दूसरे से करीब 200 मीटर की दूरी पर स्थित हैं। 

  विशेषज्ञों की मानें तो उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाएं महाराष्ट्र के आैरंगाबाद स्थित अजंता एवं एलोरा गुफाओं जैसी प्रसिद्ध तो नहीं किन्तु इनका निर्माण अति सुन्दर ढं़ग से किया गया है। लिहाजा उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाएं अति दर्शनीय हैं। 

  मान्यता है कि प्राचीनकालीन इन गुफाओं का निर्माण राजा खारवेल के शासनकाल में किया गया था। खास यह कि यह गुफाएं जैन संतों-साधुओं की निर्वाण यात्रा को भी दर्शाती हैं। इतिहास, वास्तुकला, कलात्मकता एवं धार्मिक दृष्टि से भी इन गुफाओं का विशेष महत्व है।

  उदयगिरि में 18 गुफाएं एवं खण्डगिरि में 15 गुफाएं हैं। इनमें से कुछ गुफाएं प्राकृतिक हैं तो वहीं कुछ गुफाओं का निर्माण जैन मुनियों ने किया था। पत्थर की विशाल चट्टानों को काट कर जैन मंदिरों की संरचना की गयी। यह मंदिर वास्तुकला के अनुपम अलंकरण हैं। शिलालेख में इन गुफाओं को 'लेना" कहा गया है। 

  खास यह कि गुफाओं के प्रवेश द्वार की संरचना दरवाजों जैसी है। खास यह भी है कि रात में गुफाएं चांदनी से रोशन रहती हैं। मान्यता है कि यह असाधारण गुफाएं जैन मुनियों की तप स्थली रहीं हैं। 
  सुगंधित फूलों की सुगंध, पक्षियों का कलरव-कोलाहल, शांत शीतल हवाओं के झोके, शीतल चन्द्रमा का सानिध्य एवं प्राकृतिक सौन्दर्य उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाएं की शान एवं शोभा हैं। 

   सत्य, शांति, प्राकृतिक सौन्दर्य, मोक्ष एवं आत्मज्ञान का यह स्थान सभी दृष्टि से अति महत्वपूर्ण एवं दर्शनीय है। उदयगिरि गुफाएं करीब 135 फुट ऊंची एवं खण्डगिरि गुफाएं करीब 118 फुट ऊंची हैं। प्राचीनकाल की यह गुफाएं वस्तुत: बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म के प्रभाव को दर्शाती एवं रेखांकित करती हैं। 

   वास्तुकला की यह अनुपम कलाकृति अति दर्शनीय हैं। हालांकि यह दोनों गुफाएं अपनी एक अलग विशिष्टता रखती हैं। उदयगिरि गुफाओं का फर्श पत्थर की समतल शिलाओं से आच्छादित है। सीढ़ीनुमा पत्थरों पर चलते-चलते 18 गुफाओं के दर्शन हो जाते हैं।

  रानी गुम्फा को रानी गुफा कहा जाता है। यह दो मंजिला गुफा है। यह गुफा ध्वनि संतुलन की विशिष्टता के लिए खास प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस गुफा का उपयोग प्राचीनकाल में मंत्र उच्चारण एवं रंगमंचीय गतिविधियों के लिए किया जाता था। 

   गुफा में रथ पर सवार सूर्य देव की प्रतिमा विद्यमान है। इस गुफा के निचले हिस्से में एक विशाल कक्ष है। इसमें तीन प्रवेश स्थल वाला विशाल बरामदा है। चतुर्भुज आकार की शिला को काट कर इसकी संरचना की गयी है।
  गुफाओं में बेहद सुन्दर एवंं दर्शनीय नक्काशी है। इनमें तोरण, जीव-जन्तुओं के दृश्य, धार्मिक एवं राजसी परिदृश्य बेेहद आकर्षक हैं। नृत्य एवं संगीत की विशिष्टता भी पर्यटकों को प्रभावित करती है।

   खण्डगिरि गुफाएं भी अपना एक अलग आकर्षण रखती हैं। पहली एवं दूसरी गुफाओं को तातोबा गुम्फा के नाम से जाना एवं पहचाना जाता है। यह गुफा प्रवेश स्थल पर रक्षकों, दो बैलों एवं सिंहों से सुसज्जित हैं। 
  प्रवेश द्वार पर तोरण पर तोते की आकृति है। एक अन्य गुफा अनंत गुफा कहलाती है। इसमें महिलाओं, हाथियों, खिलाड़ियों एवं फूल उठाए हंसों की मूर्तियां दर्शनीय हैं। तेंतुली गुफा भी एक खास आकर्षण है। खण्डगिरि गुफाएं दो मंजिला हैं।

   सामान्य तौर से काट छांट कर संरचित यह गुफा अपना एक अलग आकर्षण रखती हैं। इनमें खास तौर से ध्यान गुफा, नया मुनि गुफा, बाराभुजा गुफा, त्रिशुल गुफा, अम्बिका गुफा, ललतेंदुकेसरी गुफा आदि इत्यादि हैं।
   खण्डगिरि गुफाओं की पिछली दीवारोें पर जैन तीर्थंकरों, भगवान महावीर एवं भगवान पाश्र्वनाथ की नक्काशी वाले मूर्तिशिल्प अति दर्शनीय हैं। एकादशी गुफा भी काफी कुछ खास है। खास यह कि उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाओं की स्थापत्य कला अति विशिष्ट एवं दर्शनीय है।
   उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाओं की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बीजू पटनायक इण्टरनेशनल एयरपोर्ट भुवनेश्वर एयरपोेर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन भुवनेश्वर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी उदयगिरि एवं खण्डगिरि गुफाओं की यात्रा कर सकते हैं।
20.278940,85.731680

Monday, 11 November 2019

कैलाश मंंदिर : अद्भुत स्थापत्य कला

   कैलाश मंदिर की संरचना को अनूठा वास्तुशिल्प कहा जाना चाहिए। जी हां, कैलाश मंदिर की स्थापत्य कला शानदार एवं अद्भुत है।

   लिहाजा इसे एक अति दर्शनीय एवं विलक्षण स्मारक माना जाता है। संसार की इस अनूूठी संरचना की विलक्षणता अति दर्शनीय है। भारत के महाराष्ट्र के आैरंगाबाद स्थित एलोरा गुफा का यह दिव्य-भव्य कैलाश मंदिर बेहद अद्भुत है। राष्ट्रकूट के राजवंश नरेश कृष्ण ने इस शानदार संरचना को आकार प्रकार दिया था। 

   खास यह कि एक विशाल पत्थर को सलीके से काट-छांट कर इस दिव्य-भव्य स्मारक को आकार दिया गया था। खास यह कि किसी भी संरचना को आकार-प्रकार देेनेे के लिए पत्थरों को एक दूसरे के उपर जमाया जाता है लेकिन कैलाश मंदिर के निर्माण में इस खास तकनीकि के बजाय विपरीत दिशा में कार्य किया गया। 


  पर्वत को काट कर खोखला कर मंदिर, गर्भगृह, स्तम्भ, द्वार, नक्काशी आदि बनायी गयी। आैरंगाबाद स्थित लयण श्रंखला का यह शानदार स्मारक अति दर्शनीय एवं ख्याति प्राप्त है। एक समूचे पर्वत को काट कर द्रविड़ शैली में कैलाश मंदिर की संरचना की गयी है। 

  समग्रता में यह शानदार स्मारक 276 फुट लम्बा एवं 154 फुट चौड़ा है। विशेषज्ञों की मानें तो यह विशाल मंदिर पर्वत की केवल एक चट्टान को काट कर संरचित किया गया था। खास यह कि इस संरचना को उपर से नीचे की ओर काट कर किया गया है। इसके निर्माण में खण्ड को काट कर अलग किया गया था।

   इस दिव्य-भव्य संरचना की ऊंचाई करीब 90 फुट है। मंदिर की वाह्य क्षेत्र एवं आंतरिक क्षेत्र सुन्दर एवं आकर्षक मूर्ति शिल्प से आच्छादित है। चौतरफा मूर्ति एवं अलंकरणों की विशिष्टताओं वाला यह स्मारक वैश्विक ख्याति रखता है।

   इस मंदिर में तीन दिशाओं में कोठरियों की शानदार श्रंखला विद्यमान है। सामने खुले मण्डप में नंदी की विशाल छवि विद्यमान है। इसके दोनों ओर विशालकाय हाथी एवं स्तम्भ बने हैं। यह अति दर्शनीय हैं। यह संरचना भारतीय वास्तुशिल्प के कला कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है।

   एलोरा स्थित लयण श्रंखला में स्थित कैलाश मंदिर वस्तुत: भगवान शिव को समर्पित है। द्रविड़ शैली की इस संरचना में भगवान शिव के भव्य दिव्य दर्शन होते हैंं। सातवीं सदी के इस दिव्य-भव्य मंदिर की संरचना को लेकर पुरातत्वविद भी आश्चर्यचकित हैं। 

   एलोरा आैरंगाबाद की 34 गुफाओं में कैलाश मंदिर अद्भुत एवं विलक्षण है। विशेषज्ञों की मानेें तो कैलाश मंदिर की संरचना को आकार देने में करीब 18 वर्ष का समय लगा था। अद्भुत डिजाइन का यह मंदिर वैश्विक ख्याति रखता है।

   महीन डिजाइन के छज्जे, सीढ़ियां, नालियां, टावर, गुप्त आश्रय स्थल, गर्भगृह आदि इत्यादि अत्यधिक दर्शनीय हैं। इसे प्राचीन काल की इंजीनियरिंग का कमाल कह सकते हैं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो अब इस तरह की संरचना तैयार करने में सदियां लग जायेंगी। विशेषज्ञों की मानें तो कैलाश मंदिर को वस्तुत: हिमालय के कैलाश का स्वरूप देने का प्रयास किया गया था। शायद इसी लिए इसे कैलाश मंदिर की ख्याति हासिल है।

   खास यह कि इस विहंगम संरचना में र्इंट एवं पत्थरों के टुकड़ों का कहीं कोई इस्तेमाल नहीं किया गया है। यह संरचना प्राचीन काल की वास्तु कला का अनुपम उदाहरण है। दुनिया इस शानदार संरचना को देख कर मुग्ध है।

   कैलाश मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट आैरंगाबाद एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन आैरंगाबाद जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी कैलाश मंदिर एलोरा की यात्रा कर सकते हैं।
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शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...