Sunday, 11 February 2018

कुलधरा : विलक्षण गांव, फिर बस नहीं सका

    देश-दुनिया में अद्भुत विलक्षण संरचनाओं की कहीं कोई कमी नहीं। श्राप ने हिन्दुस्तान के एक गांव की दशा-दिशा बदल दी तो गांव पुरातत्व विभाग की सम्पत्ति बन गया तो वहीं विलक्षणता से देश-दुनिया के विशेषज्ञ आश्चर्यचकित हैं।

    जी हां, आश्चर्य यह कि आखिर कुछ ही पलों में पांच हजार से अधिक परिवारों की आबादी कहां लुप्त हो गयी। राजस्थान के जैसलमेर से करीब बीस किलोमीटर की दूरी पर गांव कुलधरा है। इस विलक्षण गांव से रात में अचानक आबादी गायब-लुप्त हो गयी। आखिर इस गांव की आबादी कहां गयी, किसी को कुछ भी पता नहीं। 
  राजस्थान के कुलधरा गांव में आज भी छह सौ से अधिक घर-घरौंदे अस्तित्व में दिखते हैं लेकिन सब कुछ विरान है। विशेषज्ञों की मानें तो सालों साल  से यह गांव विरान पड़ा है। मूलत: यह गांव राजस्थान के पालीवाल ब्राह्मण परिवारों का है। कभी आर्थिक सम्पन्नता से भरपूर अब मरघट जैसी दशा में है।
     विशेषज्ञों की मानें तो कुलीन ब्राह्मण परिवारों ने जैसलमेर आैर आसपास के इलाकों में चौरासी गांव विकसित किये। यह विकास पांच सौ वर्ष में किया गया। जैसलमेर रियासत के दीवान सालिम सिंह के अत्याचार-उत्पीड़न के विरोध में बाशिंदों ने गांव से पलायन किया। पालीवाल परिवारों पर कर एवं लगान की बेइंतहां बढ़ोत्तरी की गयी। जिससे खेती व व्यापार सब कुछ चौपट हो गया। पालीवाल समुदाय दीवान के अत्याचारों से अति दुखी था। 
    हद तो तब हो गयी, जब दीवान ने पालीवाल समुदाय की एक युवती को हासिल करना चाहा। बस इसके बाद समुदाय ने विरोध कर दिया। पालीवाल समुदाय ने तय किया कि सम्मान व इज्जत पर चोट बर्दास्त नहीं। अन्तोगत्वा, गांव कुलधरा के बाशिंदों ने रात में अचानक गांव खाली कर दिया। साथ ही श्राप भी दिया कि अब इस गांव में कोई बस नहीं पायेगा। गांव छोड़ने से पहले कोठारी गांव में पंचायत की। निर्णय के मुताबिक पालीवाल समुदाय ने गांव खाली कर दिया।
   आश्चर्य यह कि कुलधरा गांव का बाशिंदा पालीवाल समुदाय आखिर कहां गया क्योंकि गांव से पलायन के बाद समुदाय का कहीं कोई अता-पता नहीं चला। विशेषज्ञों की मानें तो इन गांव को भले ही सात सौ-आठ सौ साल पहले बसाया गया हो लेकिन गांव का निर्माण वैज्ञानिक तौर-तरीके से किया गया था क्योंकि राजस्थान में जहां एक ओर रेगिस्तान की तपिश महसूस की जाती है वहीं इस गांव के घरों में शीतलता का अनुभव होता है।
   घरों के भीतर पानी के कुण्ड-कुंआ, ताक-चाक आैर सीढ़ियां बेहतरीन हैं। घरों की बनावट ऐसी कि हवा चले तो बांसुरी की तान सुनाई दे। घरों में शीतलता का अनुभव। राजस्थान के रेगिस्तान में खेती का होना, पालीवाल समुदाय की समृद्धि का रहस्य रहा।
       आखिर रेगिस्तान में खेती कैसे होती थी ? विशेषज्ञों की मानें तो पालीवाल समुदाय के अचानक पलायन के बाद आसपास के बाशिंदों ने गांव में बसने की कोशिश की लेकिन कोई कामयाब नहीं हो सका। श्राप का दुष्प्रभाव आज भी दिखता है। कुलघरा गांव एक अवशेष के तौर पर आज भी देखा जा सकता है। विलक्षणता को देखने देश-विदेश के पर्यटक बड़ी संख्या में आते है। यह गांव अब पुरातात्विक विभाग संरक्षित है।
26.808632,70.803076

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