Wednesday, 29 May 2019

जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान: प्राकृतिक धरोहर

   जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान को वन्य जीव प्रेमियों के लिए धरोहर कहा जााना चाहिए। वस्तुत: जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान को बंगाल बाघ का संरक्षण क्षेत्र कहा जाना चाहिए। 

   जी हां, बाघ संरक्षण को ध्यान में रख कर इसे हैली नेशनल पार्क के रूप में स्थापित किया गया था। भारत के राज्य उत्तराखण्ड के नैनीताल का यह राष्ट्रीय उद्यान भारत का प्राचीन राष्ट्रीय उद्यान है।

    विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1936 में इसे बाघ रक्षा क्षेत्र के तौर पर विशेष घोषित किया गया था। ब्रिाटिश अफसरों ने इसकी स्थापना में विशेष भूमिका का निर्वाह किया था। लिहाजा इसे ब्रिटिश हुक्मरानों के नाम से ही राष्ट्रीय उद्यान के तौर पर जाना पहचाना जाता है। 

   बाघ संरक्षण परियोजना के तहत आने वाला जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान देश का पहला उद्यान है। खास यह कि इसे गौरवशाली पशु विहार के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है। 
  रामगंगा की पातालीदून घाटी में करीब 1318 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान विविधिताओं का इन्द्रधनुषी आयाम है। 

   इसमें बाघ संरक्षित क्षेत्र करीब 821.99 वर्ग किलोमीटर है। विशेषज्ञों की मानें तो जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान उप हिमालयीय क्षेत्र का शानदार एवं सुन्दर प्राकृतिक उपहार है।
  इसकी दर्शनीयता अति सुन्दर है। पौधों की 500 से अधिक प्रजातियां यहां पुष्पित एवं पल्लवित हैं। विशेषज्ञों की मानें तो पर्यटकों एवं वन्य जीवों का यह एक आदर्श पार्क है। 

   पर्यटकों को जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान में बंगाल बाघ के अलावा शेर, हाथी, गैंडा, भालू, जंगली सुअर, हिरन, चीतल, सांभर, पांडा, कांकड, नीलगाय, घुरल एवं चीता आदि इत्यादि की दर्शनीयता होती है। खास यह कि इस विशाल राष्ट्रीय उद्यान में अजगर की विभिन्न प्रजातियां संरक्षित हैं। 

   खास तौर से शानदार झीलें एवं झरने जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान की शोभा एवं शान हैं। यहां के घास के मखमली मैदान पर्यटकों को आकर्षित करते हैं तो वहीं दलदली क्षेत्र पशुओं एवं वन्य जीवों को आश्रय देता है। 

   इतना ही नहीं, जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान में खतरनाक एवं खूंखार पशु एवं जीव भी बड़ी तादाद में पाये जाते हैै। पक्षियों की 600 से अधिक विलुप्त प्रजातियां जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान की शान में चार चांद लगा देती हैं। 

   रंग विरंगी पक्षियों की प्रजातियों से जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान की आभा इन्द्रधनुष सा निखर उठती है। वैश्विक पर्यटकों के बीच जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान बेहद पसंदीदा है। 
  विदेश से आने वाले पर्यटक भारत की यात्रा पर आते हैं तो जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा एवं भ्रमण अवश्य करते हैं।

   विशेषज्ञों की मानें तो ब्रिाटिश अफसर वन्य जीवों के शौकीन थे। लिहाजा इस राष्ट्रीय उद्यान को अस्तित्व में लाये थे।
  विशेषज्ञों की मानें तो मौजूदा ब्रिटिश गवर्नर मालकम हैली के नाम पर इसका नाम हेली नेशनल पार्क रखा गया था। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद इसे रामगंगा नेशनल पार्क के नाम से जाना पहचाना जाने लगा।


   विशेषज्ञों की मानें तो कुमांऊ में आदमखोर शेरों के आतंक से भयावह स्थिति हो गयी थी। आदमखोर शेरों से निजात पाने के लिए विश्व के प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट को बुलाया गया। जिम कार्बेट ने आदमखोर शेरों को मार दिया। इसके बाद शिकारी जिम कार्बेट का नाम विश्व में एक बार फिर तेजी से फैल गया। 

  जिम कार्बेट का पूरा नाम जेम्स एडवर्ड कार्बेट था। इसके बाद इसका नाम बदल कर जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान रखा गया।  भारत सरकार ने जिम कार्बेट की लोकप्रियता को समझा आैर 1957 में इसका नाम जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान रख दिया गया। 
  खास यह कि नैनीताल में जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान संग्रहालय भी है। जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान प्राकृतिक सम्पदाओं से अति समृद्ध है। जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटकों के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। इसमें एक शानदार अतिथि गृह भी है। इस अतिथि गृह में एक साथ 200 पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था है। भोजन का भी उत्तम प्रबंध रहता है।

  जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पंतनगर एयरपोर्ट है। पंतनगर एयरपोर्ट से जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान की दूरी करीब 65 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
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Tuesday, 21 May 2019

हेमिस राष्ट्रीय उद्यान: अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य

   हेेमिस राष्ट्रीय उद्यान को विशिष्ट कहा जाना चाहिए। इस उद्यान का प्राकृतिक सौन्दर्य निराला है। खास तौर से हिम तेंदुआ सहित सहित कई विलुप्त वन्य जीवों का यह संरक्षण क्षेत्र है।

   भारत के जम्मू एवं कश्मीर प्रांत के लेह-लद्दाख का हेमिस राष्ट्रीय उद्यान विशिष्टताओं से परिपूरित है। लिहाजा इसे भारत की राष्ट्रीय धरोहर भी माना जाता है। समुद्र तल से करीब 3300 से 6000 मीटर की ऊंचाई वाला यह इलाका किसी स्वर्ग से कम नहीं है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो हिमालय के उत्तरी क्षेत्र का यह एकमात्र सुन्दर एवं शानदार राष्ट्रीय उद्यान है। इस राष्ट्रीय उद्यान में वन्य जीवों की असंख्य विलुप्त प्रजातियां संरक्षित एवं पल्लवित हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना वर्ष 1981 में हुई थी। 

   सिंधु नदी के शिखर पर विद्यमान यह राष्ट्रीय उद्यान करीब 600 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला था लेकिन इसके विशिष्ट महत्व को देखते हुये वर्ष 1990 में इसका क्षेत्रफल 3350 वर्ग किलोेमीटर बढ़ाया गया। जिससे हेमिस राष्ट्रीय उद्यान का दायरा बढ़ कर अब करीब 4000 वर्ग किलोमीटर हो गया है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो हेमिस राष्ट्रीय उद्यान दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है। इस विहंगम उद्यान को हेमिस हाई आल्टीट्यूट राष्ट्रीय उद्यान के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। इस राष्ट्रीय उद्यान का नामकरण हेेमिस मठ पर आधारित है।

   यह प्रसिद्ध बौद्ध मठ 400 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। हेमिस मठ एवं आसपास का इलाका शीतल, शांत एवं शानदार हिल स्टेशन भी है। पर्यटक यहां पर्यटन का भरपूर आनन्द ले सकते हैं।

  खास यह कि हेमिस राष्ट्रीय उद्यान में चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य की शानदार आभा प्रस्फुटित होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे हेमिस कोई स्वर्ग लोक हो।
  खास यह कि चौतरफा मखमली घास के शानदार मैदान हैं तो वहीं सीना तानेे खड़े हिम शिखर प्राकृतिक सौन्दर्य में चार चांद लगाते हैं। 

  नदियों, झीलों एवं झरनों का प्रवाह एक खास रोमांच पैदा करता है। वन्य जीवों का स्वच्छंद विचरण पर्यटकों में एक खास रोमांच पैदा करता है।
  इस राष्ट्रीय उद्यान में हिरन, हिम तेंदुआ, लंगूर, भेडिया, हिम छिपकली, हिम भालू, लैमरगियर गिद्ध एवं हिमालयन गिद्ध आदि इत्यादि स्वच्छंद विचरण करते दिखते हैं।

  खास तौर से पक्षियों की विलुप्त प्रजातियों से वन क्षेत्र अनुगूंजित होता रहता है। विशेषज्ञों की मानें तो इस विलक्षण राष्ट्रीय उद्यान में 100 से अधिक पक्षियों की विलुप्त प्रजातियां सरंक्षित हैं।

  विशेषज्ञों की मानें तो इस उद्यान में 200 से अधिक हिम तेंदुआ होने का आंकलन है। खास यह कि हेमिस राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में कई छोटे-छोटे गांव भी हैं। 

   लिहाजा पर्यटक इन गांवों में भ्रमण केे दौरान प्रवास कर सकते हैं। हेमिस यात्रा का सबसे बेहतरीन समय मई से अक्टूबर की अवधि है। 
  हेमिस राष्ट्रीय उद्यान प्राकृतिक सम्पदाओं से भी अत्यधिक सम्पन्न है। चौतरफा पाइन के सघन वन क्षेत्र हेमिस की शान एवं शोभा हैं।

   आैषधीय वनस्पतियों से आच्छादित सघन वन क्षेत्र पर्यटकों को खास ऊर्जा प्रदान करते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो विलुप्त आैषधीय वनस्पतियां भी यहां संरक्षित हैं। 
  आैषधीय वनस्पतियों से आच्छादित सघन वन क्षेत्र पर्यटकों को भरपूर ताजगी एवं भरपूर आक्सीजन प्रदान करते हैं।

   हेमिस राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट कुशोक बकुला रिम्पोची एयरपोर्ट लेह है। निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू तवी जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी हेमिस राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर सकते हैं।
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Sunday, 19 May 2019

झांसी का किला: सुन्दर स्थापत्य कला

   झांसी का किला कोे एक शानदार राष्ट्रीय स्मारक कहा जाना चाहिए। जी हां, देश मे स्वाधीनता आंदोलन में झांसी का किला की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

  इस ऐतिहासिक स्मारक की शानदार एवं सुन्दर संरचना देश विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करती है। भारत के उत्तर प्रदेश के शहर झांसी में स्थित झांसी का किला अद्भुत एवं अद्वितीय है। झांसी में बंगरा पर्वत पर स्थित यह किला वास्तुकला का बेजोड़ उदाहरण है। 

  झांसी का किला वस्तुत: रानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है। इस विशाल दुर्ग का निर्माण ओरछा के बुंदेल राजा बीर सिंह जूदेव ने कराया था।
  खास यह कि करीब 25 वर्षों तक बुंदेल राजाओं ने यहां शासन किया था। इस विशाल दुर्ग पर समय-समय पर मुगल, मराठा एवं ब्रिाटिश हुकूमत का शासन रहा।

  विशेषज्ञों की मानें तो झांसी का किला में कई बार परिवर्तन किये गये। करीब 15 एकड़ में फैले इस विशाल किला में काफी कुछ अद्भुत एवं अद्वितीय है। 
  यह सभी स्थितियां इसे विलक्षण एवं अद्भुत बनाती हैं। झांसी का किला अपनी विरासत एवं विहंगमता के लिए वैश्विक स्तर पर खास प्रसिद्ध है।

  इस दिव्य-भव्य किला में 22 बुर्ज एवं विशाल रक्षा खांई हैं। खास यह कि नगर दीवार की ओर दस द्वार थे। इन दस द्वार को खंदेरो द्वार, दतिया, उन्नाव, झरना, लक्ष्मी, सागर, ओरछा, सैनवर एवं चांद दरवाजा के नाम से जाना पहचाना जाता है।
   झांसी का किला का आंतरिक क्षेत्र भी काफी खास है। आंतरिक क्षेत्र में बारादरी, पंचमहल, शंकरगढ़़, रानी का नियमित पूजा स्थल, शिव मंदिर एवं गणेश मंदिर आदि इत्यादि हैं। 

   खास तौर से गणेश मंदिर मराठा साम्राज्य एवं कलात्मकता का शानदार उदाहरण है। इसकी शानदार संरचना एवं पौराणिक महत्व को देखते हुए वर्ष 1938 में झांसी का किला को केन्द्रीय संरक्षण में ले लिया गया था।
  मराठा स्थापत्य कला का अद्भुत आकर्षण खास तौर से यहां दिखता है। कूदान स्थल, कड़क बिजली तोप झांसी का किला का विशेष आकर्षण है।

   इस दिव्य-भव्य किला में फांसी घर विशेष है। फांसी घर का उपयोग राजा गंगाधर के शासनकाल तक उपयोग किया जाता रहा। 
  इसके बाद रानी ने इसका उपयोग बंद करा दिया था। झांसी का किला के सबसे ऊंचे स्थल पर राष्ट्रीय ध्वज स्थल है। इस स्थल पर हमेशा तिरंगा लहराता रहता है।

  खास यह कि झांसी का किला से शहर झांसी का विशाल स्वरूप दर्शनीय है। किला का रखरखाव एवं अनुरक्षण भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन है। खास यह कि इस शानदार किला को शंकरगढ़ एवं बलवंत नगर केे नाम से भी जाना पहचाना जाता रहा है।

  करीब 22.7 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला झांसी का किला प्रारम्भ में चंदेल राजाओं के नियंत्रण में रहा। झांसी का खास महत्व ओरछा के राजा बीर सिंह देव के शासनकाल में बढ़ा।
  इस शासनकाल में झांंसी में अनेक प्रसिद्ध इमारतों का निर्माण हुआ। झांसी का किला में आकर्षक स्थानों की एक शानदार श्रंखला विद्यमान है। 

  इनमें खास तौर से रानी झांसी गार्डेन, शिव मंदिर, गुलाम गौस खान, मोती बाई एवं खुदा बक्श की मजार दर्शनीय हैं। यह किला प्राचीन वैभव, पराक्रम का शानदार उदाहरण एवं स्थापत्य कला की विलक्षण संरचना है। 
  रानी महल: रानी महल की साज सज्जा अति दर्शनीय है। खास तौर से महल को रंगों एवं चित्रकला से सजाया संवारा गया है। यहां मूर्तियों का विशाल संग्रह देखा जा सकता है। 

   झांसी संग्रहालय: झांसी संग्रहालय स्वाधीनता आंदोलन की पौराणिकता को दर्शाता है। इसे एक ऐतिहासिक धरोहर भी कहा जा सकता है। खास यह कि संग्रहालय बुंदेलखण्ड की शानदार झलक प्रस्तुत करता है। इसमें चंदेल शासनकाल के हथियारों, मूर्तियों, परिधानों एवं तस्वीरों का संग्रह है। 
   महालक्ष्मी मंदिर: महालक्ष्मी मंदिर राज परिवार का मुख्य आस्था स्थल है। खास यह कि राज परिवार के सदस्य पहलेे गणेश मंदिर जाते थे। इसके बाद महालक्ष्मी मंदिर जाते थे। 18 वीं शताब्दी में बना महालक्ष्मी मंदिर वस्तुत: लक्ष्मी देवी को समर्पित है। महालक्ष्मी देवी को झांसी की कुल देवी माना जाता है। झांसी के बाशिंदों के मुख्य आराध्य गणेश जी हैं।
   गंगाधर राव की छतरी: गंगाधर राव की छतरी वस्तुत: लक्ष्मी ताल में गंगाधर राव की समाधि स्थल है। वर्ष 1853 में राव की मृत्यु के बाद महारानी लक्ष्मीबाई ने उनकी स्मृति में इस स्मारक का निर्माण कराया था।
   गणेश मंदिर: गणेश मंदिर वस्तुत: गणेश जी को समर्पित है। इसी मंंदिर में महाराजा गंगाधर राव एवं वीरागंना रानी लक्ष्मी बाई का विवाह हुआ था। मान्यता है कि मंदिर की निरन्तर 21 दिन 21 परिक्रमा करने से श्रद्धालुओं को अप्रत्यक्ष लाभ होता है।
   झांसी का किला की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट ग्वालियर एयरपोर्ट है। ग्वालियर एयरपोर्ट से झांसी का किला की दूरी करीब 100 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन झांसी जंक्शन है। पर्यटक झांसी का किला की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
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Sunday, 5 May 2019

ओरछा किला: अद्भुत एवं विलक्षण

   ओरछा किला के वास्तुशिल्प को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, ओेरछा किला का सौन्दर्य अति दर्शनीय है। 

   भारत के मध्य प्रदेश का शहर ओरछा खास तौर से इस अद्भुत संरचना के लिए प्रसिद्ध है। यूं कहें कि ओरछा किला ओरछा शहर की शान एवं पहचान है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। वस्तुत: ओरछा किला मध्य प्रदेश के जिला निवाड़़ी में स्थित एक अति पौराणिक संरचना है।

  इस भव्य-दिव्य किला का निर्माण सोलहवीं सदी में राजा रुद्र प्रताप सिंह ने प्रारम्भ किया था। ओरछा वस्तुत: वेतवा नदी एवं जामनी नदी के संगम पर स्थित यह एक छोटा शहर है।
   यहां ग्रेनाइट से एक भव्य-दिव्य पुल भी बना है। निवाड़ी से करीब 27 किलोमीटर दूर स्थित शहर ओरछा वस्तुत; पौराणिकता के लिए जाना पहचाना जाता है।

   झांसी से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित ओरछा वास्तुशिल्प की शानदार संरचनाओं का शहर है। ओरछा किला की दिव्यता-भव्यता अति दर्शनीय है। किला परिसर में भवनों, मंदिरों एवं आलीशान संरचनाओं की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो इस शानदार शहर को स्मारकों का शहर भी कहा जा सकता है। अति सुन्दर एवं दर्शनीय राज महल एवं राम मंदिर की स्थापना राजा मधुरकर सिंह ने की थी। जहांगीर महल एवं सावन भादों महल का निर्माण राजा वीर सिंह देव ने किया था।

   मान्यता है कि राम राजा मंदिर ईश्वरी चमत्कार की देन है। भगवान राम को समर्पित चतुर्भुज मंदिर का निर्माण किया गया लेकिन चतुर्भुज मंदिर में मूर्ति स्थापना से भगवान श्री राम की प्रतिमा को राम राजा महल में रख दिया गया लेेकिन मंदिर बनने के बाद भगवान श्री राम की प्रतिमा को स्थापित करने के लिए उठाया गया तो प्रतिमा हिली तक नहीं। 

   लिहाजा राजा महल को राम राजा महल के तौर पर परिवर्तित कर दिया गया। ओरछा किला में आकर्षक एवं सुन्दर स्थानों की एक शानदार श्रंखला विद्यमान है। इतना ही नहीं, ओरछा शहर में पौराणिक स्मारकों की एक शानदार श्रंखला है।
   राजा महल: राजा महल वस्तुत: राजाओं एवं रानियों का निवास था। राजवंश ने वर्ष 1783 तक यहां निवास किया था। हालांकि इस महल को अति साधारण स्वरूप दिया गया था लेकिन फिर भी इसकी दिव्यता-भव्यता अति दर्शनीय है। 

  खास यह कि इसका एक हिस्सा धर्म एवं आध्यात्म को समर्पित है। महल के कक्षों में देवी-देवताओं एवं पौराणिकता से सुसज्जित किया गया है। महल की ऊपरी मंजिल एवं छतों को कांच से सुसज्जित किया गया है। 
  खास यह कि सूर्य की तपिश केे बावजूद महल के कक्ष शीतल रहते हैं। खास यह कि इस शानदार महल में कई गुप्त मार्ग भी हैं। 

   जहांगीर महल: जहांगीर महल वस्तुत: मुगल शासक जहांगीर एवं बुंदेेलों की मित्रता की शानदार निशानी है। इसे ओरछा की शान एवं आकर्षण भी माना जाता है। इस महल केे प्रवेश द्वार पर दो हाथी बने हैं।
   तीन मंजिला इस इमारत का निर्माण मुगल शासक जहांगीर के स्वागत एवं शान में राजा वीर सिंह देव ने कराया था। वास्तु की दृष्टि से यह भव्य इमारत अद्वितीय है।

   राज महल: राज महल ओरछा के प्राचीन स्मारक में से एक है। यह महल छतरियों, बेहतरीन आंतरिक भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। महल में धर्मग्रंथों से जुड़ी तस्वीरों की लम्बी श्रंखला विद्यमान हैं। 
   राम राजा मंदिर: राम राजा मंदिर वस्तुत: भगवान श्री राम को समर्पित दिव्य-भव्य मंदिर है। करीब 400 वर्ष पहले ओरछा में भगवान श्री राम का राज्याभिषेक हुआ था। 
  खास यह कि ओरछा में राजा के रूप में भगवान राम को पूजा जाता है। राम राजा मंदिर दुनिया का एक मात्र मंदिर है, जहां भगवान श्री राम को एक राजा के रूप में पूजा जाता है। 

   राय प्रवीण महल: राय प्रवीण महल राजा इन्द्रमणि की खूबसूरत गणिका प्रवीण राय की स्मृति को समर्पित है। प्रवीण राय एक कवियत्री एवं संगीतज्ञ थीं।
   मुगल शासक अकबर ने प्रवीण की सुन्दरता से प्रभावित होकर दिल्ली लाने का आदेश दिया था लेकिन गणिका का राजा इन्द्रमणि के प्रति प्रेम देख कर वापस ओरछा भेज दिया था। यह महल प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित है। 
  लक्ष्मी नारायण मंदिर: लक्ष्मी नारायण मंदिर वस्तुत: ओरछा गावं के पश्चिम में एक पहाड़ पर स्थित है। मंदिर का निर्माण राजा वीर देव सिंह ने कराया था। मंदिर में खास तौर भगवान श्री कृष्ण एवं रानी झांसी की छवियां हैं।
   चतुर्भुज मंंदिर: चतुर्भुज मंदिर वस्तुत: ओरछा की शान है। यह मंदिर चार भुजा धारी भगवान श्री विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1558 से 1573 की अवधि में राजा मधुकर ने कराया था। यह उत्कृष्ठ संरचना यूरोपियन शैली पर आधारित है।
   फूलबाग: फूूलबाग बुंदेल राजाओं का सैरगाह था। फूलों की विभिन्न प्रजातियों से आच्छादित यह बाग-बगीचा ओरछा का मुख्य आकर्षण माना जाता है। वस्तुत: फूलबाग बुंदेल राजाओं का आरामगाह था। फूलबाग में भूमिगत महल एवं आठ स्तम्भ वाला मण्डप भी है।
   ओरछा किला की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट खजुराहो एयरपोर्ट है। खजुराहो एयरपोर्ट से ओरछा किला की दूरी करीब 163 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन ओरछा जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी ओरछा किला की यात्रा कर सकते हैं।
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