हजरत निजामुद्दीन: आध्यात्मिक स्थल
हजरत निजामुद्दीन की दरगाह को सूफी संत परम्परा का एक शानदार एवं पवित्र स्थान कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।
जी हां, हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर जियारत करने वाले श्रद्धालुओं की हमेशा भीड़ रहती है। हजरत निजामुद्दीन चिश्ती घराने के चौथे सूफी-संत थे।
खास यह कि हजरत निजामुद्दीन की दुआओं में आज भी देश दुनिया अजीब सी ताकत का एहसास करती है। हजरत निजामुद्दीन ने वैराग्य एवं सहनशीलता की अदभुत मिशाल पेश की थीं।
कहावत है कि 1303 में मुगल सेना ने हमला तक रोक दिया था। हजरत निजामुद्दीन सभी धर्मों एवं सम्प्रदाय में लोकप्रिय थे।
खास यह कि हजरत निजामुद्दीन की लोकप्रियता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। बालीवुड़ के फिल्म स्टार्स से लेकर हॉलीवुड़ स्टार्स तक हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर शीश नवाने आते हैं।
हजरत निजामुद्दीन ने 92 वर्ष की आयु में प्राण त्याग दिये थे। इसी के बाद हजरत निजामुद्दीन दरगाह का निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया था।
भारत की राजधानी दिल्ली के दक्षिणी इलाके में स्थित हजरत निजामुद्दीन की दरगाह सूफी संत काल का एक पवित्र स्थान है। हजरत निजामुद्दीन को हजरत निजामुद्दीन आैलिया के भी नाम से जाना पहचाना जाता है।
बताते हैं कि हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन आैलिया का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं जिला में हुआ था। हजरत निजामुद्दीन के पिता की मृत्यु हो गयी तो उनकी माता बीबी जुलेखा उनको लेकर दिल्ली आ गयी थीं। उस समय निजामुद्दीन की उम्र पांच वर्ष थी।
विशेषज्ञों की मानें तो इसका उल्लेख आइना-ए-अकबरी में मिलता है। आइना-ए-अकबरी मुगल सम्राट अकबर के नवरत्न मंत्री ने लिखा था। बताते हैं कि हजरत निजामुद्दीन 20 वर्ष की आयु में अजोधर (अब पाकिस्तान में) चले गये थे।
हजरत निजामुद्दीन अजोधर पहुंच कर सूफी संत फरीदुद्दीन गंज-ए-शक्कर के शिष्य बन गये। संत फरीदुद्दीन को बाबा फरीद के नाम से भी जाना जाता था। हजरत निजामुद्दीन ने अजोधन को अपना आशियाना नहीं बनाया।
आध्यात्मिक शिक्षा-दीक्षा के बाद हजरत निजामुद्दीन दिल्ली लौट आये। दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन का सूफियाना अंदाज खिलने-दिखने लगा।
हजरत निजामुद्दीन दिल्ली के कई इलाकों में रहे लेकिन भीड़-भाड़ में उनका मन नहीं लगता था। बाद में गयासपुर में अपना खंकाह बनाया। खंकाह ऐसे स्थान को कहते हैं, जहां विभिन्न समुदाय के बाशिंदों को भोजन की व्यवस्था की जाती है। खंकाह में अमीर-गरीब एवं ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं रहा।
खास यह कि हजरत निजामुद्दीन के शिष्यों ने शिखर की आध्यात्मिक ऊंचाई हासिल की थी। अमीर खुसरो को शीर्ष ख्याति हासिल हुई। हजरत निजामुद्दीन के शिष्यों में अमीर खुसरो भी थे।
अमीर खुसरो विख्यात ख्याल संगीतकार थे। दिल्ली सल्तनत के शाही कवि भी थे। अमीर खुसरो की मृत्यु 1325 में हुई थी। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह में अमीर खुसरो की भी दरगाह है।
अमीर खुसरो का मकबरा लाल रंग के पत्थरों से बना है। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह वस्तुत: दुआओं का भण्डार है। दरगाह संगमरमर से बना एक सुन्दर वर्गाकार कक्ष है।
संगमरमर का गुम्बद आैर उस पर काले रंग की रेखायें अदि दर्शनीय बना देती हैं। मकबरा चारों ओर से मदर ऑफ पर्ल कैनोपी एवं मेहराब से घिरा है।
हजरत निजामुद्दीन की दरगाह झिलमिलाती चादरों से ढ़का रहता है। खास यह कि हजरत निजामुद्दीन दरगाह इस्लामिक वास्तुकला की अद्भुत संरचना है। धार्मिक गीत-संगीत एवं इबादत सूफी परम्परा का अटूट हिस्सा है।
दिल्ली के मथुरा रोड स्थित हजरत निजामुद्दीन की दरगाह इबादत का प्रमुख स्थान है। खास यह कि हजरत निजामुद्दीन की दरगाह फूलों की सुगंध से महकती रहती है।
खास यह कि हजरत निजामुद्दीन एवं अमीर खुसरो की बरसी पर विशेष उर्स का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर इबादत करने के साथ ही मनौती के लिए लाल धागा भी बांधते हैं। जिससे लोगों की इच्छाओं की पूर्ति होती है।
खास यह कि सप्ताह के प्रत्येक बृहस्पतिवार को हजरत निजामुद्दीन की दरगाह को सजाया संवारा जाता है। इस दौरान दरगाह रोशनी से जगमगा उठती है।
दरगाह में जहां आरा बेगम एवं एक मुगल राजकुमारी की कब्रागाह भी है। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह का कई फिल्मों के लिए फिल्मांकन भी किया गया है।
हजरत निजामुद्दीन की दरगाह की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नई दिल्ली है।
निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़़क मार्ग से भी हजरत निजामुद्दीन दरगाह की यात्रा कर सकते हैं।
28.591480,77.250390
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