Sunday, 30 December 2018

हजरत निजामुद्दीन: आध्यात्मिक स्थल

   हजरत निजामुद्दीन की दरगाह को सूफी संत परम्परा का एक शानदार एवं पवित्र स्थान कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   जी हां, हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर जियारत करने वाले श्रद्धालुओं की हमेशा भीड़ रहती है। हजरत निजामुद्दीन चिश्ती घराने के चौथे सूफी-संत थे।
   खास यह कि हजरत निजामुद्दीन की दुआओं में आज भी देश दुनिया अजीब सी ताकत का एहसास करती है। हजरत निजामुद्दीन ने वैराग्य एवं सहनशीलता की अदभुत मिशाल पेश की थीं। 

   कहावत है कि 1303 में मुगल सेना ने हमला तक रोक दिया था। हजरत निजामुद्दीन सभी धर्मों एवं सम्प्रदाय में लोकप्रिय थे। 
  खास यह कि हजरत निजामुद्दीन की लोकप्रियता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। बालीवुड़ के फिल्म स्टार्स से लेकर हॉलीवुड़ स्टार्स तक हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर शीश नवाने आते हैं।

   हजरत निजामुद्दीन ने 92 वर्ष की आयु में प्राण त्याग दिये थे। इसी के बाद हजरत निजामुद्दीन दरगाह का निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया था।
  भारत की राजधानी दिल्ली के दक्षिणी इलाके में स्थित हजरत निजामुद्दीन की दरगाह सूफी संत काल का एक पवित्र स्थान है। हजरत निजामुद्दीन को हजरत निजामुद्दीन आैलिया के भी नाम से जाना पहचाना जाता है।

   बताते हैं कि हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन आैलिया का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं जिला में हुआ था। हजरत निजामुद्दीन के पिता की मृत्यु हो गयी तो उनकी माता बीबी जुलेखा उनको लेकर दिल्ली आ गयी थीं। उस समय निजामुद्दीन की उम्र पांच वर्ष थी।

 विशेषज्ञों की मानें तो इसका उल्लेख आइना-ए-अकबरी में मिलता है। आइना-ए-अकबरी मुगल सम्राट अकबर के नवरत्न मंत्री ने लिखा था। बताते हैं कि हजरत निजामुद्दीन 20 वर्ष की आयु में अजोधर (अब पाकिस्तान में) चले गये थे। 

   हजरत निजामुद्दीन अजोधर पहुंच कर सूफी संत फरीदुद्दीन गंज-ए-शक्कर के शिष्य बन गये। संत फरीदुद्दीन को बाबा फरीद के नाम से भी जाना जाता था। हजरत निजामुद्दीन ने अजोधन को अपना आशियाना नहीं बनाया। 
  आध्यात्मिक शिक्षा-दीक्षा के बाद हजरत निजामुद्दीन दिल्ली लौट आये। दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन का सूफियाना अंदाज खिलने-दिखने लगा।

   हजरत निजामुद्दीन दिल्ली के कई इलाकों में रहे लेकिन भीड़-भाड़ में उनका मन नहीं लगता था। बाद में गयासपुर में अपना खंकाह बनाया। खंकाह ऐसे स्थान को कहते हैं, जहां विभिन्न समुदाय के बाशिंदों को भोजन की व्यवस्था की जाती है। खंकाह में अमीर-गरीब एवं ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं रहा। 


  खास यह कि हजरत निजामुद्दीन के शिष्यों ने शिखर की आध्यात्मिक ऊंचाई हासिल की थी। अमीर खुसरो को शीर्ष ख्याति हासिल हुई। हजरत निजामुद्दीन के शिष्यों में अमीर खुसरो भी थे।
   अमीर खुसरो विख्यात ख्याल संगीतकार थे। दिल्ली सल्तनत के शाही कवि भी थे। अमीर खुसरो की मृत्यु 1325 में हुई थी। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह में अमीर खुसरो की भी दरगाह है। 

  अमीर खुसरो का मकबरा लाल रंग के पत्थरों से बना है। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह वस्तुत: दुआओं का भण्डार है। दरगाह संगमरमर से बना एक सुन्दर वर्गाकार कक्ष है।
  संगमरमर का गुम्बद आैर उस पर काले रंग की रेखायें अदि दर्शनीय बना देती हैं। मकबरा चारों ओर से मदर ऑफ पर्ल कैनोपी एवं मेहराब से घिरा है। 


   हजरत निजामुद्दीन की दरगाह झिलमिलाती चादरों से ढ़का रहता है। खास यह कि हजरत निजामुद्दीन दरगाह इस्लामिक वास्तुकला की अद्भुत संरचना है। धार्मिक गीत-संगीत एवं इबादत सूफी परम्परा का अटूट हिस्सा है।
   दिल्ली के मथुरा रोड स्थित हजरत निजामुद्दीन की दरगाह इबादत का प्रमुख स्थान है। खास यह कि हजरत निजामुद्दीन की दरगाह फूलों की सुगंध से महकती रहती है।

  खास यह कि हजरत निजामुद्दीन एवं अमीर खुसरो की बरसी पर विशेष उर्स का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर इबादत करने के साथ ही मनौती के लिए लाल धागा भी बांधते हैं। जिससे लोगों की इच्छाओं की पूर्ति होती है।
   खास यह कि सप्ताह के प्रत्येक बृहस्पतिवार को हजरत निजामुद्दीन की दरगाह को सजाया संवारा जाता है। इस दौरान दरगाह रोशनी से जगमगा उठती है।
   दरगाह में जहां आरा बेगम एवं एक मुगल राजकुमारी की कब्रागाह भी है। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह का कई फिल्मों के लिए फिल्मांकन भी किया गया है।

  हजरत निजामुद्दीन की दरगाह की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नई दिल्ली है। 
  निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़़क मार्ग से भी हजरत निजामुद्दीन दरगाह की यात्रा कर सकते हैं।
28.591480,77.250390

Sunday, 16 December 2018

चित्तौड़गढ़ किला: विशिष्ट स्थापत्य कला

   चित्तौड़गढ़ किला की स्थापत्य कला का कोई जोड़ नहीं। राजपूताना वास्तुकला एवं शिल्पकला की यह अनुपम संरचना भारत सहित दुनिया भर में खास ख्याति रखती है। 

    भारत के राजस्थान प्रांत में स्थित चित्तौड़गढ़ किला वस्तुत: राजपूत राजवंश की सम्पदा है। चित्तौड़गढ़ किला वस्तुत: अपनी विशाल संरचना के लिए जाना पहचाना जाता है। करीब 700 एकड़ क्षेत्रफल में फैली इस विहंगम संरचना में असंख्य विशिष्टताएं विद्यमान हैं। 

   समुद्र तल से करीब 180 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह दिव्य-भव्य किला जल संसाधन के लिए खास प्रसिद्ध है। विशेषज्ञों की मानें तो चित्तौड़गढ़ किला में जल संसाधन की उपलब्धता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मान्यता है कि चित्तौड़गढ़ किला में 50000 सैनिकों को 4 वर्ष तक पीने का उपलब्ध कराया जा सकता है।

  पौराणिक कथानक की मानें तो पाण्डव ने एक रात में इस दिव्य-भव्य किला का निर्माण किया था। सुन्दर एवं विशिष्ट वास्तु संरचना सहित असंख्य विशिष्टताएं देख कर यूनेस्को ने चित्तौड़गढ़ किला विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है।
   विशेषज्ञों की मानें तो चित्तौड़गढ़ किला राजपूत राजकुमारों एवं राजपूत राजकुमारियों की वीरता एवं रोमांस के लिए विशेष तौर से जाना पहचाना गया। 

   चित्तौड़गढ़ किला को वस्तुत: राजस्थान का गौरव माना जाता है। विशेषताओं के कारण ही चित्तौड़गढ़ किला की वैश्विक पर्यटन की ख्याति है। यूं भी चित्तौड़गढ़ किला भारत के विशाल दुर्ग श्रंखला की संरचना है।
   इसे विश्व विरासत भी कहा जा सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो चित्तौड़ कभी मेवाड़ की राजधानी था। प्राचीनकाल में चित्तौड़ शूरवीरों का शहर था। 

   चित्तौड़गढ़ किला की संरचना भूमि से करीब 500 फुट ऊंचाई है। इस दिव्य-भव्य किला की संरचना एक विशाल व्हेल मछली के आकार-प्रकार की है। पहाड़ी पर निर्मित यह किला करीब तीन मील लम्बा एवं आधा मील चौड़ा है। चित्तौड़गढ़ किला को वीरभूमि के नाम से भी जाना जाता है। 

   खास यह कि चित्तौड़गढ़ किला के कण-कण में देश प्रेम एवं वीरता का अंश एहसास कराता है। विशेषज्ञों की मानें तो चित्तौड़गढ़ किला भारत के लिए प्रेरणा रुाोत है। यहां की इमारतें एकता का संदेश देती हैं। इस विहंगम संरचना में बहुत कुछ विशिष्ट है।
   बीका खोह: बीका खोह एक विशिष्ट बुर्ज है। यह चित्तौड़गढ़ किला की रक्षा का विशिष्ट बुर्ज है। आक्रमण होने पर इस खोह की रक्षात्मक भूूमिका रहती थी।

   भाक्सी: भाक्सी वस्तुत: एक जलाशय है। इसका निर्माण महाराजा कुम्भा ने 1433 में कराया था। मालवा के सुल्तान महमूद को गिरफ्तार कर यहां रखा गया था।
  इसे बादशाह की भाक्सी कहा जाता है। इसी के सामने चौगान है। यह स्थान घुड़सवारी के लिए उपयोग किया जाता था।
   रानी पद्मिनी महल: रानी पद्मिनी महल चौगान के निकट एक झील के किनारे स्थित है। इस महल के चारों ओर झील है। इसे जनाना महल भी कहते हैं। इसी के किनारे बने एक अन्य परिसर को मर्दाना महल कहते है। यहां एक विशाल दर्पण लगा है। इस दर्पण से जनाना महल की सीढ़ियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति को आसानी से देखा जा सकता है। 
  खातन रानी का महल: खातन रानी का महल भी रानी पद्मिनी महल के निकट है। महाराणा क्षेत्र सिंह ने अपनी उप पत्नी खातन रानी के लिए इस महल का निर्माण कराया था।
  गोरा बादल: गोरा बादल वस्तुत: गुम्बददार दो इमारतें हैैं। इनकी संरचना एवं वास्तुशिल्प विलक्षण है।
  राव रणमल की हवेली: राव रणमल की हवेली वस्तुत: गोरा बादल के निकट स्थित है। राव रणमल की बहन हंसाबाई से महाराणा लाखा का विवाह हुआ था। यह एक स्मृति भवन है। 
  कालिका मंदिर: कालिका मंदिर ऊंची कुर्सी वाला महल है। मूलत: यह सूर्य मंदिर है। गर्भगृह में स्थापित सूर्य की प्रतिमा आज भी दर्शनीय है। बाद में इस मंदिर में कालिका देवी की प्रतिमा स्थापित की गयी। जिससे अब इस स्थान को कालिका मंदिर कहा जाता है।
   सूरज कुण्ड: सूरज कुण्ड वस्तुत: कालिका मंदिर की उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित एक विशाल कुण्ड है। मान्यता है कि महाराणा को सूर्यदेव का आशीर्वाद प्राप्त था। कुण्ड से प्रतिदिन प्रात:काल सफेद घोड़े पर सवार एक सशस्त्र योद्धा निकलता था। यह सवार ही महाराणा को युद्ध में सहायता करता था। 

  गौमुख कुण्ड: गौमुख कुण्ड वस्तुत: चट्टान से बना झरना है। इस झरना का जल शिवलिंग पर गिरता है। इसी के निकट भगवान विष्णु की प्रतिमा है। गौमुख कुण्ड के निकट ही हाथी कुण्ड एवं खातण बावड़ी है।
   समाधिश्वर महादेव मंदिर: समाधिश्वर महादेव मंदिर का निर्माण मालवा के प्रसिद्ध राजा भोज ने कराया था। इसे त्रिभुवन नारायण का शिवालय एवं भोज का मंदिर भी कहा जाता है। यहां दिव्य-भव्य शिवलिंग है।
  जौहर स्थल: जौहर स्थल चौतरफा दीवारों से घिरा परिसर है। इसमें प्रवेश के दो द्वार बने हैं। जिसे सती द्वार कहा जाता है। इसे रावल समर सिंह ने बनवाया था।
   चित्तौड़गढ़ किला में अद्भुत, वीरगाथाओं एवं धार्मिक स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है। इनमें खास तौर से देखें तो जैमल की हवेलियां, विजय स्तम्भ, जटाशंकर महादेव, कुम्भ श्याम मंदिर, मीराबाई का मंदिर, सतबीस देवलां, महाराणा कुम्भा महल, फतह प्रकाश, मोती बाजार, श्रंगार चौकी, महाराणा का देवड़ा, तुलजा भवानी का मंदिर, बनवीर की दीवार, नवलखा भण्डार, भामाशाह की हवेली, आल्हा काबरा की हवेली आदि इत्यादि संरचनाएं विशिष्ट एवं दर्शनीय हैं।
   चित्तौड़गढ़ किला की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट उदयपुर है। उदयपुर एयरपोर्ट की चित्तौड़गढ़ किला से दूरी करीब 70 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन चित्तौड़गढ़ में ही है। पर्यटक चित्तौड़गढ़ किला की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
25.319469,74.633308

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