Thursday, 12 April 2018

हवा महल : एक शानदार स्मारक

     राजस्थान राजपूताना आन-बान एवं शान के प्रतीक 'हवा महल"  को दुनिया में शीर्ष ख्याति हासिल है। जयपुर स्थित इस स्मारक को गुलाबी शहर जयपुर की शान समझा जाता है। पिरामिड आकार का हवा महल पांच मंजिला खास इमारत है।

   विशेषताओं के कारण हवा महल देश-दुनिया के पर्यटकों के बीच खास लोकप्रिय है। कहावत है कि हवा महल नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा। गुलाबी शहर जयपुर का यह राजसी महल 1798-1799 में बना था। महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने इस खास महल का निर्माण कराया था। 
   हवा महल का डिजाइन किसी बेहतरीन राजमुकुट की भांति किया गया है। हवा महल का डिजाइन लाल चंद उस्ताद ने तैयार किया था। इस अद्वितीय इमारत का डिजाइन भी अद्भुत है।
     पांच मंजिला इस इमारत का उपरी हिस्सा मात्र डेढ़ फुट चौड़ा है लेकिन भूतल पर हवा महल की भव्यता-दिव्यता दिखती है। मधुमक्खियों की छत्ता समान दिखने वाले इस हवा महल में 953 बेहद खूबसूरत एवं आकर्षक खिड़कियां हैं। इन खिड़कियों को बनाने के पीछे मंशा थी कि राज परिवार की महिलायें युवतियां खिड़कियों से रोजमर्रा की आम जिंदगी देख सकें लेकिन आम आदमी राज परिवार को न देख सकें।
     इसके अलावा जालीदार झरोखों एवं खिड़कियों से सदैव शीतल हवा के झोंके महल के अंदर महसूस किये जा सकें। शायद यही कारण है कि तेज धूप एवं भीषण गर्मी में भी हवा महल वातानुकूलित रहता है। चूना, बालू एवं लाल पत्थरों के संयोजन से बना हवा महल जयपुर के व्यापारिक केन्द्र के मुख्य मार्ग पर स्थित है। यह जयपुर के सिटी पैलेस का हिस्सा है।
     प्रात:काल सूर्य की गुलाबी रोशनी में हवा महल का अद्भुत दृश्य दिखता है। हवा महल की पांच मंजिला इमारत की ऊंचाई करीब 50 फुट है। सबसे उपरी तीन मंजिल में लम्बे चौड़े कक्ष बने हैं। महल के सामने का हिस्सा खुला है। जिससे सड़क के आवागमन को आसानी से देखा जा सकता है। बलुआ पत्थरों से बनी छोटी-छोटी खिड़कियां बेहद आकर्षक दिखती हैं। खूबसूरत नक्काशीदार जालियां, कंगूरे एवं गुम्बद हवा महल के मुख्य आकर्षण हैं। 
     इमारत के पीछे एवं आंतरिक हिस्से में आवश्यकताओं के अनुसार कक्ष बने हैं। हवा महल का मुख्य हिस्सा बेहद सुन्दर एवं आकर्षक है तो वहीं पाश्र्व हिस्सा बेहद साधारण दिखता है। हवा महल की सांस्कृतिक एवं वास्तुशिल्प छवि राजपूताना अंदाज को बयां करती है।
      हवा महल वस्तुत राजपूताना शिल्पकला, मुगल शैली एवं परम्परागत शैली का अनूठा मिश्रण है। सुन्दर नक्काशी एवं सुन्दर मेहराब आदि मुगल शैली को बयां करते हैं तो वहीं कक्ष एवं गुंबदों की शैली राजपूताना शिल्प शैली को रेखांकित करते हैं। सिटी पैलेस की ओर से हवा महल में प्रवेश करने पर एक बड़ा सा आंगन है। इस आंगन में एक भव्य-दिव्य संग्रहालय है।
     विशेषज्ञों की मानें तो हवा महल महाराजा जय सिंह का पसंदीदा विश्राम गृह था। कारण हवा महल की आंतरिक साज-सज्जा बेहद सुन्दर एवं आकर्षक थी। हवा महल के सभी कक्षों के सामने फव्वारों की सुन्दर व्यवस्था है। जिससे हर पल-हर क्षण ताजगी का एहसास होता है। 
    हवा महल का रखरखाव एवं मरम्मत का कार्य राजस्थान का पुरातात्विक विभाग करता है। खास यह है कि हवा महल बिना किसी आधार के बना विश्व का सबसे ऊंचा महल है। हवा महल में सामने से प्रवेश के लिए कोई द्वार नहीं है। पिछले हिस्से से ही हवा महल में प्रवेश किया जा सकता है। हवा महल को पैलेस ऑफ विंड्स भी कहा जाता है।
    हवा महल को 953 सुन्दर खिड़कियां शीतल रखती हैं। हवा महल का निर्माण खास तौर से राज घराना या शाही परिवार की महिलाओं एवं युवतियों के लिए किया गया था। हवा महल की खासियत कई फिल्मों में दृश्यांकित हो चुकी है।
      हवा महल की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जयपुर में है। जयपुर रेल मार्ग से भी जुड़ा है। जयपुर रेलवे स्टेशन है। इसके अलावा सड़क मार्ग से जयपुर की यात्रा की जा सकती है।
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Tuesday, 10 April 2018

मैसूर राजमहल: सुन्दर समृद्ध धरोहर

      मैसूर राजमहल भारत का एक अति समृद्ध धरोहर है। कर्नाटक के मैसूर शहर स्थित यह राजमहल देश के चुनिंदा एवं खास पर्यटन स्थलों में से एक है। पुरातात्विक आन-बान एवं शान का प्रतीक यह राजमहल खूबियों से आच्छादित है।

    मैसूर का यह राजसी महल चामुंडी हिल्स पर स्थित है। इसे महाराजा पैलेस, राजमहल एवं अम्बा विलास पैलेस भी कहा जाता है। वाडियार राजघराने का यह राजमहल द्रविड़, पूर्वी एवं रोमन स्थापत्य कला का अद्भुत संगमन है।
     विशिष्टताओं के कारण मैसूूर राजघराने का यह महल पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र है। स्लेटी रंग के पत्थरों से बने इस महल के गुम्बद लाल रंग के पत्थरों से सुसज्जित हैं।
    खास यह कि पहले यह राजमहल चंदन की लकड़ियों का बना था लेकिन पुर्नरुद्धार के बाद इस राजमहल ने एक नया रूप रंग ले लिया। चंदन के राजमहल को अब संग्रहालय के तौर पर परिवर्तित कर दिया गया है। सुन्दरता का शिखर कहे जाने वाले इस राजमहल में एक बड़ा दुर्ग है। इस दुर्ग के गुम्बद सोने के पत्तरों से सुशोभित हैं। सूरज की रोशनी में यह गुम्बद आैर भी निखर आते हैं।
    मैसूर के इस राजमहल में एक गुड़िया घर भी है। इसे गोम्बे थोट्टी भी कहते हैं। इस गुड़िया घर में गुड़िया सहित साज-सज्जा की बेहतरीन सामग्री भी हैं। विशेष यह है कि इसमें लकड़ी का एक हौदा भी है। इस हौदा को सजाने में 84 किलो सोने का इस्तेमाल किया गया है। इस हौदे को हाथियों की पीठ पर सजाया जाता था। जिससे राजा बैठ सकें। गोम्बे थोट्टी के सामने सात तोपें भी विद्यमान हैं। इन तोपों को दशहरा सहित अन्य त्योहारों-पर्व पर दागा जाता है।
    राजमहल में गजद्वार भी है। यह राजमहल का प्रवेश द्वार है। राजमहल के मध्य में कल्याण मंडपम है। यह स्थान खास तौर शादी विवाह या अन्य मांगलिक कार्यों के उपयोग के लिए निर्धारित था। इसकी छत रंगीन कांच के टुकड़ों से संरचित है। फर्श पर चमकदार पत्थर के टुकड़े लगे हैं।
   अन्य राजसी महलों की भांति यहां भी दीवान-ए-आम है। दीवान-ए-आम राजसी चित्रों, पोशाकों एवं हथियारों से सुसज्जित है। लकड़ी के दरवाजों की नक्काशी सुन्दरता को आैर भी बढ़ाते हैं। छतों पर लगे झाड़-फानूस राजमहल की शोभा में चार चांद लगाते हैं। दशहरा पर्व पर 200 किलो सोना से बने सिंहासन को आम जनता के लिए प्रदर्शित किया जाता है। 
    राजमहल परिसर में प्रवेश करते ही सोने से कलश से सजा देव स्थान है। राजमहल के ठीक सामने दिव्य-भव्य उद्यान है। राजमहल के दर-ओ-दीवार एवं स्तम्भ की बारीक एवं सुन्दर नक्काशी देखते ही बनती है। दर-ओ-दीवार पर कृष्णराजा वाडियार, उनके परिवार एवं उत्तराधिकारियों के शानदार जोशीले चित्र शोभायमान हैं। 
    इनमें राजतिलक से लेकर सैन्यबलों के चित्र सहित यशोगाथा का वर्णन है। मध्य के विशाल कक्ष में छत नहीं है। चौतरफा गुंबद हैं। यह गुंबद रंगबिरंगे कांच के टुकड़ों से सजे हैं। लिहाजा सूरज एवं चांद की रोशनी में राजमहल का कोना जगमगा उठता है।
    राजमहल का प्रथम तल पूजा-अर्चना के लिए निर्धारित था। लिहाजा यह देव स्थान है। स्तम्भ श्रंखला से घिरा दरबार हाल है। द्वितीय तल पर यह एक गोलाकार स्थान है। यहां महाराजा एवं महारानी जनता की फरियाद सुनते थे। इसी तल के पिछले भाग में तीन सिंहासन रखे हैं। यह सिंहासन महाराजा, महारानी एवं युवराज के लिए थे। 
    राजमहल की चकाचौंध देश-दुनिया में खास ख्याति रखती है। दशहरा सहित विशेष पर्व पर राजमहल को रोशनी से सजाया जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो राजमहल में रोशनी के लिए 97000 बल्बों का उपयोग किया जाता है।
     रोशनी भी गजब की होती है। इस जगमगाहट को देख कर आंखे चौंधिया जाती हैं। मैसूर राजमहल में एक दर्जन से अधिक मंदिर एवं देव स्थान है। खास यह कि हर मंदिर की बनावट एवं वास्तुशिल्प अलग-अलग है। मैसूर रियासत के इस राजमहल को देखने के लिए दुनिया के पर्यटक आते रहते हैं।
     मैसूर राजमहल अर्थात अम्बा विलास पैलेस की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से मैसूर की दूरी करीब 150 किलोमीटर है। निकटतम एयरपोर्ट करीब 140 किलोमीटर दूर बेंगलुरू में है। मैसूर रेल मार्ग से जुड़ा है। लिहाजा रेल मार्ग से भी मैसूर की यात्रा की जा सकती है। सड़क मार्ग से मैसूर राजमहल की यात्रा की जा सकती है।
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Wednesday, 4 April 2018

ताजमहल : अतुलनीय धरोहर

    उत्तर प्रदेश के आगरा स्थित 'ताजमहल" वस्तुत: वास्तुकला की एक उत्कृष्ट संरचना है। 'ताजमहल" की संरचना में भारतीय, फारसी, तुर्क, इस्लामी तुर्की स्थापत्य शैली का संतुलित समन्वय दिखता है। इसे यूं कहें कि 'ताजमहल" स्थापत्य कला का एक सुन्दर आयाम है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।

    'ताजमहल" दुनिया के आठ चमत्कारों में से एक है। सुन्दर सफेद संगमरमर का यह स्मारक वैश्विक धरोहर है। 'ताजमहल" का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में कराया था।
   वास्तुकला-स्थापत्यकला के वैश्विक घटकों के इस समिश्रण को वर्ष 1983 यूनेस्को ने विश्व धरोहर श्रंखला में स्थान दिया था। 'ताजमहल" को भारत की इस्लामिक कला का रत्न भी घोषित किया जा चुका है।
     'ताजमहल" का दीदार करने के लिए दुनिया के लाखों पर्यटक आते हैं। कारण 'ताजमहल" की वैश्विक स्तर पर चमक है। लिहाजा 'ताजमहल" का आकर्षण पर्यटकों को बरबस आकर्षित करता है। 'ताजमहल" का अंग-प्रत्यंग अवलोकन को बाध्य करता है। जालीदार मेहराब हो या महीन नक्काशी या फिर जड़ाऊ पच्चीकारी हो। चार बाग की तो शान ही निराली है।
      'ताजमहल" के सौन्दर्य को कुछ यूं कहें कि धरती पर साक्षात चांद उतर आया है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में पवित्र नदी यमुना के आंचल के निकट संरचित यह दूधिया स्मारक 'ताजमहल" भारत की शान भी है। अतुलनीय धरोहर 'ताजमहल" का निर्माण करीब 1648 में पूर्ण हुआ था। 
      विशेषज्ञों की मानें तो उस्ताद अहमद लाहौरी को 'ताजमहल" का प्रधान रूपांकनकर्ता माना जाता है। वर्गाकार नींव पर आधारित श्वेत संगमरमर का यह मकबरा बहुकक्षीय है। इस मकबरा का गुम्बद आधार से करीब 35 मीटर है। हालांकि इसका मुख्य गुम्बद 7 मीटर ऊंचा बेलनाकार है।
    'ताजमहल" के गुम्बद के साथ साथ छतरियां एवं गुलदस्तों पर कमलाकार शिखर शोभायमान हैं। सूर्यास्त के समय ताज का दीदार बेहद शानदार होता है। 'ताजमहल" के चारों कोनों की विशाल मीनारों का भी अपना एक अलग आकर्षण है। संरचना ऐसी की कि पर्यटकों को मुग्ध कर दे। वस्तुत: 'ताजमहल" की संरचना वास्तुकलाओं-स्थापत्यकलाओं का एक विलक्षण समन्वयन है।
     'ताजमहल" के आंतरिक कक्ष परम्परागत अलंकरण से अलग है। बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की लैपिडरी कला है। आंतरिक कक्ष में अष्टकोण हैं। किसी भी कोण के प्रवेश द्वार से कक्ष में प्रवेश किया जा सकता है। आंतरिक दीवारें करीब 25 मीटर ऊंची हैं। इससे कक्ष की भव्यता-दिव्यता परिलक्षित होती है। कक्ष के बाहर मेहराबार छज्जा शोभायमान हैं। मुमताज महल की कब्रा आंतरिक कक्ष के मध्य में है।
    परिसर में विशाल चारबाग है। इसे मुगल बाग भी कहते हैं। इस बाग का पाथवे ऊंचा है। यमुना नदी की ओर महताब बाग एवं चांदनी बाग भी हैं। यह क्षेत्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सानिध्य में संरक्षित है। विशेषज्ञों की मानें तो यह क्षेत्र यमुना नदी का हिस्सा था। 'ताजमहल" का मुख्य दरवाजा भी एक स्मारक के तौर पर है। निकट ही लाल बलुआ पत्थरों की दो इमारतें हैं।
      'ताजमहल" के दीदार के लिए प्रत्येक वर्ष 20 से 40 लाख पर्यटक आते हैं। इनमें 2 लाख से अधिक विदेशी पर्यटक होते हैं। गौरतलब है कि विदेश का कोई भी शासकीय अतिथि भारत दौरे पर आता है तो 'ताजमहल" के दीदार के लिए आगरा की यात्रा अवश्य करता है।
    'ताजमहल" स्मारक को देखने आगरा जाने के लिए यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट आगरा में है। रेलवे स्टेशन भी आगरा है। लिहाजा पर्यटक एयरपोर्ट, रेल या सड़क मार्ग से आगरा की यात्रा कर सकते हैं।
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शांति निकेतन: सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर    शांति निकेतन को आध्यात्मिक धरोहर कहा जाना चाहिए। जी हां, शांति निकेतन संस्कृति, परम्परा...